May Day: मुसीबतों के बोझ तले दबा श्रमिक कैसे मनाता मई दिवस

– एल. एस. हरदेनिया

आज मई दिवस (May Day) है. श्रमजीवियों के अधिकारों का दिवस. इस दिन दुनिया के सबसे बड़े पूंजीवादी देश के मजदूरों ने यह महसूस किया था कि हमारे भी कुछ अधिकार हैं और उन अधिकारों की प्राप्ति के लिए हम संघर्ष कर सकते हैं. उस समय विभिन्न उद्योगों में श्रमिकों को 16 घंटे तक काम करना पड़ता था. इसी दरम्यान अनेक उद्योगों के श्रमिकों के वेतन में 10 प्रतिशत और उसके कुछ दिन बाद 5 प्रतिशत की कटौती कर दी गई. इससे श्रमिकों में भारी असंतोष फैल गया.

असंतोष के चलते श्रमिकों ने हड़ताल कर दी. शिकागो नामक शहर में हड़ताल इतनी सफल हुई कि अनेक उद्योगपतियों ने समाचार पत्रों में बड़े-बड़े विज्ञापन छपवाए. विज्ञापनों के माध्यम से ऐसे लोगों से आफर बुलवाए गए जो हड़ताल को तुड़वा सकें. विज्ञापनों का शीर्षक था ‘Wanted strike Breakers’. अनेक लोगों ने एप्लाई किया. अनेक लोग आए भी परंतु कुछ ही दिनों में उन्होंने यह घृणित कार्य करने से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा कि हम अपनी रोजी-रोटी कमाने के लिए दूसरे की रोजी-रोटी नहीं छीन सकते. पुलिस ने ऐसे लोगों को गिरफ्तार कर लिया. हड़ताल कई दिनों तक चली और मजबूर होकर अनेक उद्योगों ने हड़ताली श्रमिकों की मांगें मान लीं. इसके बाद भी कई श्रमिक काम  पर नहीं लौटे. उनकी मांग थी कि हड़ताल में भाग न लेने वाले श्रमिकों को बर्खास्त किया जाए.

यह भी पढ़ें:  Survey: महज 17 प्रतिशत श्रमिकों को पता है मुफ्त राशन योजना के बारे में

उस समय से लेकर वर्ष 1 मई को मई दिवस मनाया जाता है. परंतु पिछले वर्ष कोरोना के कारण पूरी दुनिया में मई दिवस मनाया नहीं जा सका था. इस वर्ष भी यही स्थिति है. इस वर्ष तो कोरोना ने और गंभीर रूप ले लिया है. इस समय हम भले ही मई दिवस नहीं मना पा रहे हैं परंतु इस वास्तविकता से इंकार नहीं किया जा सकता कि दुनिया के सभी देशों के मजदूरों पर सिर्फ एक कारण (कोरोना) के चलते इतनी बड़ी मुसीबत कभी नहीं आई. मजदूरों को ही इस मुसीबत का सबसे अधिक सामना करना पड़ रहा है.

इसका मुख्य कारण यह है कि मजदूर का पेट प्रतिदिन प्राप्त होने वाली मजदूरी से ही भरता है. वैसे बैंक, बीमा और बड़े उद्योगों में काम करने वाले स्थायी कर्मचारियों को एक तयशुदा तारीख पर वेतन मिलता है परंतु उनसे कई गुना बड़ी संख्या ऐसे मजदूरों की भी हैं जो प्रतिदिन कमाई गई और प्राप्त होने वाली मजदूरी से अपना और अपने परिवारों का पेट भरते हैं. ऐसे लोगों में आटो एवं टैक्सियां चलाने वाले, ठेलों पर रखकर सब्जी और फल बेचने वाले, घरेलू कामकाज करने वाली महिलाएं, हम्माल, कुली, छोटे दुकानदार, नाई, रेस्टोरेंटों एवं ढाबों में काम करने वाले वेटर और रसोईए, कारखानों में काम करने वाले दैनिक वेतनभोगी मजदूर, खेतिहर मजदूर आदि शामिल हैं.

यह भी पढ़ें:  गरीबों को राशन नहीं, बस हर तरफ भाषण है!

यह सूची बहुत बड़ी है. पिछले वर्ष लाकडाउन के चलते करोड़ों लोग अपने कार्यस्थल वाले शहरों को छोड़कर अपने घर गए थे. वह दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा पलायन था. यदि दुबारा लाकडाउन हुआ और लंबा चला तो इसी स्थिति की पुनरावृत्ति होगी. इस तरह की अफरा-तफरी में मई दिवस कौन मनाएगा.

यदि हम कोरोना की गिरफ्त में नहीं होते तो मई दिवस पूरे जोशो-खरोश से मनाया जाता. क्योंकि पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने ऐसे कानून बनाए हैं जिनसे मजदूरों के कई अधिकार छिन गए हैं. श्रमिक संसार का कोई वर्ग ऐसा नहीं है जिसके अधिकारों पर कुठाराघात न हुआ हो. श्रमिक आक्रोषित है, परेशान है. वह मई दिवस पर पूरे जोश से अपना आक्रोश प्रकट करता. परंतु वह मौन है, सिर्फ इसलिए कि इस समय हमारा देश और पूरी दुनिया एक बहुत बड़ी मुसीबत की गिरफ्त में है. ज्योंही इस मुसीबत से मुक्ति मिलेगी तो श्रमिक वर्ग का आक्रोश विस्फोट के रूप में उभरेगा.