Citizenship Amendment Act

Citizenship Amendment Act: लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र सरकार तय कर सकती है सीएए के नियम

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संशोधित नागरिकता कानून Citizenship Amendment Act (CAA) को लेकर बड़ा फैसला

केंद्र सरकार अगले कुछ दिनों में संशोधित नागरिकता कानून (Citizenship Amendment Act) पर बड़ा फैसला लेने जा रही है। राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के बाद केंद्र सरकार चार साल से अटके पड़े संशोधित नागरिकता कानून पर नियम बना सकती है। 2019 में देश भर में हुए ​प्रदशर्नों और उसके बाद आए कोरोना संकट के कारण यह नियम पारित नहीं हो सके थे और बाद में सरकार ने इन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया। अब आगामी लोकसभा चुनाव से पहले इसे नोटिफाइड करने की तैयारी है। गृह मंत्रालय के अधिकारी ने हाल ही में बताया है कि इस कानून के नियमों को जल्द ही लागू किया जा सकता है। संभावना है कि फरवरी के पहले सप्ताह में ही सीएए के नियम लागू हो जाएंगे।

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के अनुसार जब सरकारी अधिकारी से पूछा गया कि क्या सीएए नियमों को कुछ महीनों में होने वाले लोकसभा चुनावों की घोषणा से पहले अधिसूचित किया जाएगा तो उन्होंने जवाब दिया कि हां, उससे बहुत पहले। अधिकारी ने कहा, “हम जल्द ही सीएए के नियम जारी करने जा रहे हैं। नियम जारी होने के बाद कानून लागू किया जा सकता है और पात्र लोगों को भारतीय नागरिकता दी जा सकती है। कानून में चार साल से ज्यादा की देरी हो चुकी है और कानून लागू होने के लिए नियम जरूरी हैं।”

नागरिकता संशोधन का मसला 2019 में भाजपा के घोषणा पत्र के बाद से ही लगातार चर्चा में रहा है। इस मामले में बड़ा सवाल यह है कि इसे लागू करने से पहले केंद्र सरकार की चुनौती और मंशा क्या है?

कानून को लेकर क्या हैं संसदीय नियम?
संसदीय नियमावली के अनुसार, किसी भी कानून के नियम राष्ट्रपति की सहमति के छह महीने के भीतर तैयार हो जाने चाहिए। ऐसा न होने पर लोकसभा और राज्यसभा में अधीनस्थ विधान समितियों से और समय मांगने का भी प्रावधान है। नियम बनाने के लिए साल 2020 के बाद गृह मंत्रालय नियमित अंतराल पर कई संसदीय समितियों से एक्सटेंशन लेता रहा है।

क्या हैं चुनौतियां?
सीएए काननू से जुड़ा बिल 2019 दिसंबर में संसद से पास हुआ था। इसका मकसद था कि जो लोग 31 दिसंबर, 2014 से पहले पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से धार्मिक प्रताड़ना की वजह से भारत आए थे, उनमें मुस्लिमों को छोड़कर बाकी को नागरिकता देने का प्रावधान किया गया था। तब इसका विरोध हुआ था। विरोध के पीछे वजह यह थी कि कानून को धार्मिक आधार पर क्यों लाया गया? यह सवाल आज भी कायम है? इसलिए इस कानून को लागू करने में सरकार के सामने चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। संविधान में धार्मिक आधार पर कोई कानून लागू नहीं हो सकता है। इसी सवाल का जवाब देने की चुनौती सरकार के सामने रहेगी।

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नियम बनाना क्यों है जरूरी
कोई भी एक्ट या विधेयक तब तक लागू नहीं हो सकता, जब तक की इसके लिए नियम नहीं बन जाते। चार साल बाद भी सीएए विधेयक संसद के दोनों सदनों से पारित होने के बाद भी इसीलिए सरकार नोटिफाई नहीं कर पाई है। मूल मुद्दा यह है कि 31 दिसंबर 2014 से पहले जो लोग धार्मिक प्रताड़ना की वजह से तीन पड़ोसी देशों से भारत आए हैं उन्हें नागरिकता देना है। इसमें गैर मुस्लिमों को प्राथमिकता के आधार पर इन्हें नागरिकता देने का रास्ता साफ हो जाएगा।

क्या है तैयारी?
सीएए कानून के मुताबिक, पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से जो लोग 31 दिसंबर, 2014 से पहले भारत आए। वह देश की नागरिकता लेने के लिए इसमें अप्लाई कर सकेंगे। इनमें हिंदू, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध और पारसी को शामिल किया गया है। नागरिकता देने के लिए सरकार ने एक पोर्टल भी लगभग तैयार कर लिया है। ताकि सबकुछ डिजिटल और आसानी से हो सके। कुछ चीजों को 26 जनवरी से पहले भी सामने लाने की कोशिश की जा रही है।

केंद्र सरकार की मंशा है कि इसके बारे में एक बार फिर लोगों तक जानकारी पहुंचाई जाए। सरकार और अधिकारियों का मानना है कि विधेयक पारित होने के बाद संवाद ठीक से नहीं हो पाया था, इसलिए विरोध हुआ था। यह कानून भारत के नागरिकों के लिए है ही नहीं, इसलिए जो फिलहाल भारत के नागरिक हैं, उन पर इसका कोई असर नहीं होगा।

लोकसभा चुनावी से क्या है संबंध
पहली बार 2015 में यह कानून सामने आया था। तब कानून में पड़ोसी मुल्कों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात थी। उसमें किसी धर्म का जिक्र नहीं था। लेकिन 2019 के बिल में इसमें धर्म जोड़ा गया। सरकार का तर्क था कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि जिन देशों के लिए कानून है वहां मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं। लेकिन इसके विरोधी इसमें धर्म के जिक्र को गलत मानते हैं। साथ ही इससे NRC के भी जुड़ने की आशंका ने विवाद और बढ़ा दिया। लेकिन अभी सरकार सिर्फ सीएए की बात कर रही है। आम चुनाव से पहले यह मुद्दा सामने आने के बाद पश्चिम बंगाल, असम जैसे राज्यों पर इसका असर हो सकता है।

समान नागरिक संहिता पर असर
असल में, सीएए के जरिये केंद्र सरकार और भाजपा एक तीर से दो निशाने साध रही है। अगर सीएए का विरोध इसलिए किया जाता है कि इसमें धार्मिक आधार पर भेदभाव किया जा रहा है, तो भाजपा और केंद्र सरकार समान नागरिक संहिता का तर्क दे सकती है, जिसमें सभी धर्मों के नागरिकों के लिए एक समान कानून और प्रक्रियाओं की व्यवस्था की बात की जा रही है। हालांकि समान नागरिक संहिता का अभी तक कोई ड्राफ्ट नहीं आया है। इसलिए इसलिए इस पर जो भी बहस होगी, वह कयासों और मंशाओं को लेकर ही होगी।

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चुनाव से पहले जारी होगी अधिसूचना
नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के नियम जारी करने में हो रही देरी के कारण गृह मंत्रालय कठघरे में है। हालिया घटनाक्रम के बाद यह साफ हो गया है कि लोकसभा चुनाव की घोषणा से काफी पहले नियम अधिसूचित कर दिए जाएंगे। सरकार की ओर से जारी सीएए की नियमावली अप्रैल-मई में संभावित लोकसभा चुनाव पर भी सीधा असर डालेंगे।

पूरी प्रक्रिया होगी ऑनलाइन
गृह मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक, नियम तैयार हैं और ऑनलाइन पोर्टल भी तैयार है। इसकी पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन होगी। आवेदकों को वह साल बताना होगा, जब उन्होंने यात्रा दस्तावेजों के बगैर भारत में प्रवेश किया था। आवेदकों से कोई दस्तावेज नहीं मांगा जाएगा। बीते साल 27 दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कानून के कार्यान्वयन को लेकर कोलकाता में बयान दिया था। शाह के मुताबिक सीएए को लागू करना भाजपा की प्रतिबद्धता है।

2019 का विरोध और 9 राज्यों में जिला मजिस्ट्रेटों को अधिकार
संसद के दोनों सदनों से विधेयक पारित होने के बाद दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून को राष्ट्रपति की मंजूरी मिली थी। इसके बाद देश भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे। विरोध प्रदर्शन और पुलिस की कार्रवाई के दौरान तब 100 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। गृह मंत्रालय के मुताबिक नौ राज्यों में पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता दी जा सकती है। इनमें गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और महाराष्ट्र शामिल हैं। इन नौ राज्यों के 30 से अधिक जिला मजिस्ट्रेटों और गृह सचिवों को नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत अधिकार दिए गए हैं। इन जिलों के अधिकारियों को अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आने वाले हिंदुओं, सिखों, बौद्धों, जैनियों, पारसियों और ईसाइयों को भारतीय नागरिकता देने की शक्तियां दी गई हैं।

असम और पश्चिम बंगाल में संवेदनशील मुद्दा
असम और पश्चिम बंगाल में यह मुद्दा राजनीतिक रूप से बहुत संवेदनशील है। इन दो राज्यों के किसी भी जिले के अधिकारियों को अब तक नागरिकता देने के अधिकार नहीं दिए गए हैं। वर्ष 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार गृह मंत्रालय ने आठ महीने में (अप्रैल-दिसंबर, 2021) कुल 1,414 विदेशियों को भारतीय नागरिकता दी। इसके लिए पंजीकरण या देशीयकरण (registration or naturalization) सिद्धांत का सहारा लिया गया।