Loksabha Elections 2024: एनडीए का 400 पार दावा! कितनी हकीकत, कितना फसाना

Loksabha Elections 2024: क्या उत्तर बनाम दक्षिण होगा 2024 का लोकसभा चुनाव!

सचिन श्रीवास्तव

2024 के लोकसभा चुनाव (Loksabha Elections 2024) में ज्यादा वक्त नहीं बचा है। 24 घंटे चुनावी मोड में रहने वाली भाजपा (BJP) 2024 के चुनाव को लेकर अपनी रणनीतिक और राजनीतिक बिसात बिछा चुकी है। इसमें राम मंदिर से लेकर विकास के मोदी मॉडल और छोटे—छोटे दलों के साथ साझेदारी से विपक्ष को कमजोर करने वाले मुद्दों को जोरशोर से उठाने की तैयारी शामिल है। वहीं दूसरी ओर भाजपा और नरेंद्र मोदी को सत्ता से दूर रखने के मकसद से बना इंडिया अलायंस (INDIA Alliance) भी लगातार मिल रहे झटकों के बावजूद नई रणनीतियों पर लगातार काम कर रहा है। नी​तीश कुमार के बाद जयंत चौधरी की एनडीए से बढ़ती नजदीकियों के बीच राहुल गांधी की न्याय यात्रा और प्रगतिशील, डेमोक्रेटिक चेहरों के साथ इंडिया एलायंस सत्ता में आने की कोशिश कर रहा है।

भाजपा फिर सत्ता में आएगी या फिर इंडिया एलायंस अपनी महत्वाकांक्षी योजना में सफल हो पाएगा, यह महज तीन महीने बाद साफ हो जाएगा। ताजा राजनीतिक और प्रशासनिक हालात पर नजर डालें, तो 10 से 15 मार्च के आसपास चुनाव आचार संहिता लग सकती है। चुनाव आयोग इसके लिए तैयारियां कर रहा है। हर जिले में राजनीतिक दलों के सुझाव और प्रशासनिक अमले की तैयारियों का जायजा लिया जा रहा है। उम्मीद की जा रही है कि 16 अप्रैल से 5 मई के बीच सात या आठ चरणों में चुनाव होंगे। साथ ही 10 मई तक चुनावी नतीजे घोषित हो जाएंगे। इसके बाद जिस भी गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिलेगा, वह अगले 10 से 12 दिनों में सरकार गठन करने की तैयारियां पूरी कर लेगा।

मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में राजनीति के गंभीर से गंभीर दर्शक भी 25 से 30 मई के बीच सरकार के शपथ ग्रहण की तस्वीरों का चित्र दिमाग में बना रहे हैं, लेकिन इसमें महज मोदी की ही तस्वीर दिखाई देती है। ऐसा क्यों है?
क्या इसलिए कि बीते 10 साल से मीडिया ने 24 घंटे सरकार के गुणगान के साथ मोदी का चेहरा दिखाया है?
या इसलिए कि भाजपा के नेता और कैडर लगातार 24 घंटे चुनावों की रणनीति बनाने में जुटे रहते हैं?
या इसलिए कि भाजपा के पास असीमित संसाधन और ताकत है?
या इसलिए कि भाजपा अगले 1000 साल के भारत का दावा करती है? और विपक्ष के पास अगले 6 महीने का कॉमन मिनिमम प्रोग्राम भी नहीं है?
या इसलिए
या इसलिए

ऐसे सैकड़ों इसलिए के बावजूद यह एक सच्चाई है कि हर चुनाव अपने आप में खास, अनूठा और नया होता है। क्रिकेट की भाषा में कहें तो हर मैच अपने आप में नई तस्वीर सामने लाता है। कागज पर आप कितने मजबूत हैं, या ​आपने पिछले कितने मैच जीते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। खास मैच के दिन आप कैसा खेलते हैं, इससे ही जीत—हार तय होती है।

इसलिए 2024 के लोकसभा चुनावों को जो लोग सिर्फ भाजपा के दावों की जद में देख रहे हैं, उन्हें आने वाले दिनों में अपने विश्लेषणों पर एक बार फिर गौर करना चाहिए, क्योंकि अगर मामला इतना ही आसान होता तो भाजपा 1000 से 2000 वोटों की ताकत वाले नेताओं, दलों, समूहों को अपने पाले में करने के लिए इतना लालायित न दिखाई देती। हालांकि बतौर विश्लेषण आप इसमें यह क्षेपक भी लगा सकते हैं कि भाजपा को सामान्य जीत तो अभी भी मिल जाएगी लेकिन वह अपनी संभावित जीत को बड़ा करने और किसी भी आगामी चूक से निपटने के लिए पहले ही सारी तैयारियां कर लेना चाहती है। यह कहना इसलिए भी जरूरी है कि भाजपा इस समय भारतीय राजनीति में एकमात्र पार्टी है, जो अपनी चुनावी योजनाओं और रणनीतियों को 80 प्रतिशत से ज्यादा तक जमीन पर उतार ले जाने में सक्षम है। इसके कारण कुछ भी हो सकते हैं, लेकिन यह एक तथ्य है। जबकि विपक्ष और खुद भाजपा की करीबी पार्टियां अपनी योजनाओं और रणनीतियों के 50 प्रतिशत हासिल होने पर ही खुशी मनाने की जल्दबाजी करती रही हैं।

बहरहाल, इस भी किंतु, परंतु के बीच वह क्या है, जो इस चुनाव के केंद्र में होगा। कई विश्लेषकों ने यह माना है कि इस बार का चुनाव उत्तर बनाम दक्षिण होने की उम्मीद है। राम मंदिर के उद्घाटन के बाद यह बात और ज्यादा जोर शोर से उछाली जा रही है। इधर दक्षिण में भाजपा ने अपने कई दिग्गज नेताओं को चुनावी रणनीति से जोड़ा है, इसके ​बाद यह कयास और ज्यादा तीखे हुए हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस ने दक्षिण भारत और उत्तर भारत के बीच के आर्थिक बंटवारे को हवा देकर भी इस जमीन को साफ किया है।

अगर यह चुनाव उत्तर और दक्षिण का होता है, तो जहां एक ओर भाजपा को उत्तर में सीधी साफ जीत मिलती दिख रही है, वहीं दक्षिण में कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन मजबूत दिखता है। खासकर कर्नाटक को छोड़कर चार राज्यों में इसका हम बिंदुवार विश्लेषण करें, इसके पहले यह भी जान लेना चाहिए कि 2019 में स्थिति क्या थी।

अगर हम 2019 के चुनावी नतीजों को चार कैटेगरी में बांटें तो स्थिति और स्पष्ट होती है।
पहली कैटगरी में वे राज्य या केंद्र शासित प्रदेश रखते हैं, जहां भाजपा ने एक भी सीट नहीं जीती। ऐसे 11 राज्यों में कुल 93 सीटें हैं। इनमें से केरल, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में कुल 84 सीट हैं और भाजपा का यहां खाता भी नहीं खुला था।
दूसरी कैटगरी में वे राज्य या केंद्र शासित प्रदेश आते हैं, जहां भाजपा ने अधिकतम 50 प्रतिशत सीट जीती थीं। ऐसे 9 राज्यों में कुल 191 सीटें हैं और इनमें से भाजपा ने 77 सीटें जीती और विपक्ष के पास 114 सीट रहीं। इनमें से भी छह राज्यों महाराष्ट्र, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, तेलंगाना और पंजाब में भाजपा ने 72 सीट जीती हैं। हालांकि महाराष्ट्र और बिहार में अपने नए सहयोगी एनसीपी, शिवसेना शिंदे और जदयू के साथ आने से भाजपा की ताकत बदली है। जबकि कश्मीर, मणिपुर और गोवा में 10 सीट में से भाजपा ने आधी यानी 50 प्रतिशत जीत हासिल की है।
तीसरी कैटेगरी में वे क्षेत्र हैं, जहां भाजपा ने 50 प्रतिशत से अधिक लेकर 100 प्रतिशत से कम सीट जीतीं। ऐसे 7 राज्यों में 211 सीट हैं और इनमें से भाजपा ने 178 सीट जीती हैं।
चौथी कैटगरी वाले राज्यों में भाजपा ने सभी सीटें जीती हैं। ऐसे 9 राज्यों—केंद्र शासित प्रदेशों में कुल 48 सीट हैं, जो सभी भाजपा के खाते में गईं।
तीसरी और चौथी कैटेगरी भाजपा की बड़ी ताकत हैं। इनमें कुल 259 सीटों में से 226 सीट जीतने वाली भाजपा का कोर वोट बैंक है।

यह भी पढ़ें:  घर की महिलाओं से लॉकडाउन ने छीना चैन-सुकून

दिलचस्प यह है कि तीसरी और चौथी कैटगरी का बड़ा हिस्सा उत्तर भारत का प्रतिनिधित्व करता है और वहीं जहां भाजपा कमजोर दिखाई देती है, वह बड़ा हिस्सा दक्षिण ओर दक्षिण पूर्व का ही है। ऐसे में साफ है कि भाजपा की जीत का सूत्र उत्तर भारत से निकलता है। ऐसे में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) लोकसभा में ही भाजपा और एडीए का टारगेट सेट करते हैं, तो यह बात बेहद साफ हो जाती है कि भाजपा इस बार उत्तर की अपनी जीत को यथावत रखते हुए दक्षिण में मजबूती पर ध्यान दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने बीते सोमवार को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देते हुए भाजपा को कम से कम 370 सीटें मिलने और एनडीए के 400 के पार पहुंचने का दावा किया था। इस पर काफी चर्चा पहले ही हो चुकी है और विश्लेषक मानते हैं कि यह हवाई दावा नहीं है। अगर भाजपा अपनी पैठ दक्षिण के चार राज्यों केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में बढ़ाती है, तो यह नतीजे बहुत दूर नहीं हैं।

ध्यान रखें कि 1984 में राजीव गांधी और 1957 में जवाहरलाल नेहरू के बाद ऐसी प्रचंड जीत किसी सत्ताधारी दल को हासिल नहीं हुई है और मोदी जिस तरह से न भूतो न भविष्यति शैली में काम करते हैं, तो वे नहीं चाहेंगे कि आंकड़ों में कभी यह सामने आए कि उनसे ज्यादा बड़ी जीत भी किसी प्रधानमंत्री को हासिल हुई थी।

जाहिर है ऐसे में 400 प्लस का आंकड़ा भाजपा के लिए महज चुनावी बूस्ट अप डोज नहीं है, बल्कि साख का सवाल है। और अपनी साख के लिए भाजपा किस हद तक जा सकती है। साम, दाम, दंड, भेद के कितने नये आयाम रच सकती है, यह किसी से छुपा नहीं है। भाजपा के तौर तरीकों से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन चुनावी जीत के लिए इस पार्टी के जोश पर किसी को कोई संदेह नहीं रहना चाहिए।

तो कुल मिलाकर मामला यही है कि भाजपा 400 पार जा रही है या नहीं?
और अगर जा रही है, तो इसमें दक्षिण की क्या भूमिका होगी?
साथ ही भाजपा के कोर वर्चस्व वाले तीसरी और चौथी कैटेगरी के राज्यों में उसका प्रदर्शन और कितना बेहद हो सकता है?
क्या भाजपा अपने अब तक के कमजोर इलाके में सेंधमारी करेगी, या फिर पूरी तरह पिच को बदल देगी?

इन सभी सवालों के जवाब ढूंढते वक्त हमें फिर अपनी मूल स्थापना पर लौटना चाहिए कि हर चुनाव अपने आप में अनूठा, नया और अलग होता है। तब क्या सचमुच भाजपा उत्तर भारत में अपनी जीत के जादू को और बड़ा बना पाएगी। हालांकि वहां गुंजाइश बहुत कम रह गई है। लेकिन फिर भी भाजपा उत्तर की बाकी बची सीटों पर भी अपना वर्चस्व बरकरार रखने की कोशिश कर रही है।
इसीलिए लोकसभा में बीते सोमवार को जब मोदी ने कहा- अबकी बार…और भाजपा सांसदों ने एक सुर में कहा- 400 पार। तो तुरंत बाद ही प्रधानमंत्री ने फिर कहा, “मैं ऐसे आंकड़ों में नहीं पड़ता। लेकिन मैं देख रहा हूं कि देश का मिजाज एनडीए को 400 सीटें पार करवाकर रहेगा, लेकिन भाजपा को 370 सीट जरूर देगा।” यह लोकसभा चुनाव की टोन सेट करने वाला बयान साबित हो सकता था, लेकिन इसमें पेंच है। ध्यान रखिये यह सिर्फ अभिधा में बोला गया बयान नहीं है। (हिंदी व्याकरण न समझने वाले पाठक मुआफ करें।) इसके पीछे व्यंजना भी है। 2019 में सरकार बनने के तीसरे महीने में ही जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाने की याद इससे जुड़ी हुई है और भाजपा ने अपने उत्तर भारतीय कोर वोट बैंक को इस आंकड़े से हमेशा साधा है।

मुश्किल यही है, कि भाजपा के पास उत्तर भारतीय वोटर को लुभाने के लिए अब और कोई कारगर हथियार नहीं बचा है। उत्तर भारत में बीते 30 सालों में भाजपा ने अपनी कट्टर हिंदुत्व और विकास के नए मॉडल के साथ जो छवि बनाई है, उसके बावजूद एक बड़ा तबका भाजपा से लगातार दूरी बनाए हुए है, और यह भाजपा के लिए बड़ी चिंता है।

जाहिर है 2024 में यह चिंता कम नहीं होने वाली है। राम मंदिर और सबके राम जैसे विचारों के साथ भाजपा एक बार फिर यह कोशिश कर रही है, लेकिन आने वाले दो महीनों में प्रचार में वह कितनी आक्रामक रहती है या फिर अपनी को उदार छवि पेश करती है, इस पर उत्तर भारत के भाजपा विरोधी वोट में से 5 से 7 प्रतिशत की ढील टिकी हुई है। अगर ऐसा हो पाता है, तो भाजपा के लिए मुफीद हालात होंगे। जबकि विपक्ष की पूरी कोशिश होगी कि वह भाजपा की आक्रामक धार्मिक छवि को भुनाते हुए अल्पसंख्यक और उदार हिंदू वोट को अपने पाले में रखे।

दक्षिण में कैसे काम कर रही भाजपा
भाजपा ने दक्षिण भारत में अपनी कट्टर धार्मिक छवि को भुनाने की कोशिश की है, लेकिन इसमें वह हर बार नाकाम रही है। कर्नाटक में सरकार में आने के पीछे भी विकास के नए मॉडल और जातिगत वोटों को साधने की कोशिशें ज्यादा बड़ी वजहें रही थीं। तमिलनाडु चुनाव में बजरंग बनाम हनुमान का दांव बुरी तरह फेल हुआ था। इसलिए भाजपा दक्षिण की तरफ बेहद सधे कदमों से बढ़ रही है। इसीलिए यहां चुनाव प्रचार में 80 करोड़ लोगों को भोजन देने से लेकर गैस सिलिंडर और शौचालय जैसी चीजों पर फोकस किया गया है। यहां बेहतर जिंदगी की गारंटी वाला नारा अधिक दिखाई पड़ता है।

विपक्ष का बिखराव नहीं है दक्षिण में कारगर
आमतौर पर भाजपा की जीत के पीछे एक बड़ी वजह विपक्ष का बिखराव रहता है। अगर हम उत्तर भारत में भाजपा की जीत को परखें तो देखेंगे कि ज्यादातर सीटें जहां भाजपा और कांग्रेस की सीधी टक्कर है, वहां भाजपा 21 पड़ती है, जबकि जहां विपक्ष में कांग्रेस के अलावा कोई पार्टी है, उन राज्यों में भाजपा की ताकत आधी से भी कम रह जाती है। तो भाजपाई जीत का सूत्र असल में कांग्रेस की कमजोरी और विपक्ष के बिखराव में टिका हुआ है। केरल इसका अपवाद है। वहां कांग्रेस और लेफ्ट के बीच के घमासान के बावजूद भाजपा अपनी जड़ें जमाने में कामयाब नहीं हुई है। तेलंगाना में भी इस बार भाजपा के लिए हालात बहुत बेहतर नहीं दिख रहे हैं। वहां फिलहाल भाजपा 17 में से 4 सीटों पर काबिज है, लेकिन इन्हें बढ़ाने के अलावा भाजपा के पास कोई और विकल्प नहीं है।

विपक्षी टूट का हासिल क्या है
बीते एक साल से इंडिया गठबंधन लगातार खबरों में रहा है, लेकिन उसके भीतर सत्ता का एक जाल भी है, जिसमें सभी उलझे हुए हैं। भाजपा का इसी का लाभ उठाते हुए लगातार विपक्षी गठबंधन को कमजोर कर रही है। मुश्किल यह है कि इस गठबंधन के पास कोई व्यापक विचार नहीं है, जैसा भाजपा अपने 1000 साल के गौरव के साथ पेश करती है। सिर्फ भाजपा विरोध के नाम पर बने गठबंधन में राहुल गांधी जरूर समता, समानता और उदार भारतीय परंपरा की बात करते हैं, लेकिन इस विचार को व्यापक रूप देने और भारतीयता से जोड़ने में वे नाकाम रहे हैं। दूसरी तरफ सत्ता के प्रति लालायित नेताओं की एक बड़ी फौज की भी टूटने के लिए तैयार रहती है, यह बात कांग्रेस समेत सभी दलों पर लागू होती है। शिवसेना, एनसीपी की टूट और जदयू का एनडीए में जाना एक तरह से इंडिया गठबंधन के लिए चेतावनी भी है, तो वहीं दूसरी ओर उसके लिए अवसर भी। अगले एक दो माह में ऐसी और पाला बदली देखी जा सकती है। इससे रणनीति पर क्या असर पडेगा, कह नहीं सकते, लेकिन साझेदारों को चुनने के प्रति इंडिया गठबंधन अधिक सतर्क होगा, ऐसा लगता है। जो उसे 2024 के बाद के चुनावों में अधिक बेहतर विकल्प देगा।

यह भी पढ़ें:  Paper Politics: अपने श्वेत पत्र में एनडीए का यूपीए पर हमला, तो कांग्रेस ने ब्लैक पेपर में गिनाईं सरकार की नाकामियां

लगातार हार और राहुल गांधी का नेतृत्व
​बीते 10 सालों में विपक्ष के किसी एक नेता पर सबसे ज्यादा हमले हुए हैं, तो वह राहुल गांधी ही हैं। उन्होंने अपनी पार्टी या विपक्ष को अपने बूते कोई बड़ी जीत भी नहीं दिलाई है। वे अपने ज्यादातर चुनाव हारे हैं। इसके बावजूद दिलचस्प है कि राहुल गांधी विपक्ष के सबसे बड़े नेता बने रहे हैं। जीत के मास्टर अरविंद केजरीवाल, हवा भांपने में माहिर नीतीश और अपनी अख्खड़ता के बावजूद चुनावी जीत हासिल करने वाली लेफ्ट को बंगाल से उखाड़ फेंकने वाली ममता बनर्जी जैसे नेता उनके आगे कहीं नहीं टिकते हैं।
आप देश के और किसी भी नेता की कल्पना कीजिए, जो अपने 90 प्रतिशत से ज्यादा चुनाव हारने के बावजूद बीते दो दशकों से लगातार राजनीति का केंद्र बना रहे, न सिर्फ राजनीति में बना रहे, बल्कि उसका कद लगातार बढ़ता जाए, लगातार वह और ज्यादा आकर्षक होता जाए। वह कांग्रेस की कमान संभाले, तो भी वाह वाह और वह इस्तीफा दे तो भी वाह वाह।
जिस तरह एनडीए में मोदी का एक बड़ा चेहरा है, ठीक वैसे ही विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा राहुल गांधी ही हैं और यह भी तय है कि राहुल गांधी ही 2024 में विपक्ष का सबसे बड़ा चेहराा होंगे।

यह जानना इसलिए भी जरूरी है कि अगर दक्षिण भारत यह तय करने में एक बड़ी भूमिका अदा करने वाला है कि आगामी लोकसभा की तस्वीर क्या होगी, तो वहां मोदी और राहुल गांधी की लोकप्रियता को भी आंकने की जरूरत है। कर्नाटक को छोड़कर दक्षिण के किसी भी राज्य में राहुल गांधी की लोकप्रियता मोदी से कम नहीं है।

उत्तर भारत में बड़ी ताकत और दक्षिण के दुर्गम किले
बीते चुनाव को देखें तो यहां 10 हिंदी भाषी राज्यों में कुल 225 लोकसभा सीटें आती हैं और इनमें से भाजपा ने 2019 के चुनाव में 177 सीटें जीती थीं। वहीं भाजपा के लिए दुर्गम माने जाने वाले राज्यों में पश्चिम बंगाल में 42 में 18 सीटें, ओडिशा की 21 में 8 सीटें, असम के 14 में 9 सीटें, तेलंगाना के 17 में 4 सीटें और कर्नाटक की 28 में 25 सीटें भाजपा ने जीती थीं। यहां भाजपा ने 2019 में अपने लिए नई जमीन तैयार की थी। अब कुल मिलाकर मामला केरल, आंध्र प्रदेश और ​तमिलनाडु के अलावा उत्तर में पंजाब पर टिका है।

भाजपा के लिए 400 की राह
राजनीतिक आरोपों-प्रत्योरोपों के बीच सबसे बड़ा सवाल ये है कि भाजपा कैसे 303 में 67 सीटें जोड़कर 370 तक पहुंचेगी और एनडीए कैसे 400 पार जाएगा। जाहिर है कि इसके लिए भाजपा को नए क्षेत्र तलाशने होंगे, जो बहुत आसान नहीं है। उत्तर प्रदेश में भाजपा को 80 में 62 सीटें मिली थीं, 400 पार जाने के लिए यहां पार्टी को कम से कम 10 सीटें बढ़ानी होगी। उसी तरह महाराष्ट्र में पिछली बार मिली 48 में 23 की जीत को 30 तक बढ़ाना होगा, यानी 7 सीटें बढ़ानी होंगी, जो शिवसेना शिंदे और एनसीपी के बूते वह करती दिखाई दे रही है। पश्चिम बंगाल की जीत को 18 से 30 करना होगा। ममता की मौजूदा रणनीति विपक्षी एकता के बाद यह संभव नहीं दिखता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान में सभी सीटें जीतना होंगी। यह भी बहुत आसान नहीं लगता है। मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास एक सीट है, लेकिन पिछले 10 सालों से लगातार सांसद रहे नेताओं के प्रति असमंजस है। यहां टिकट बंटवारे और तमाम रणनीतियों के बावजूद भाजपा दो से तीन सीटें खो सकती है। उसी तरह छत्तीसगढ़ में भाजपा के​ मुश्किलें बढ़ी हुई हैं। यहां पहले ही भाजपा अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को दोहराने की चुनौति से जूझ रही है।

भाजपा की दो बड़ी मुश्किलें
मोदी के भारतीय इतिहास के सबसे बड़े चुनावी जीत के सपने को पूरा करने के लिए भाजपा पूरी ताकत से जुटी है, लेकिन भाजपा के सामने दो अहम मुश्किलें हैं:-
पहली, उत्तर भारत की पिछली जीत को हर हाल में बरकरार रखना।
दूसरी, दक्षिण भारत के कई राज्यों में मिले जीरो को शानदार सफलता में बदलना।

दक्षिण भारत में सुधारना होगा परफॉर्मेंस
दक्षिण भारत में 5 राज्यों और दो केंद्रशासित प्रदेशों को मिलाकर कुल 131 सीटों में भाजपा के पास अभी 29 सीटें हैं। दक्षिण की तरफ बढ़ें तो आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल जैसे अहम राज्यों में भाजपा की जीत को जीरो से 10-10 पर ले जाना होगा। ऐसा होना किसी चमत्कार से कम नहीं होगा। तेलंगाना में 4 वाली जीत को कम से कम 8 पर तो कर्नाटक में पुरानी जीत को कायम रखना होगा। अगर ऐसा न हुआ तो भाजपा का 370 के पार अपने दम पर पहुंचना असंभव होगा।

उत्तर भारत में अगर भाजपा ने अपना पिछला रिकॉर्ड दोहरा दिया, तो भाजपा को अपने दम पर बहुमत मिल जाएगा, लेकिन 370 सीटों के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए दक्षिण भारत को भी जीतना होगा। इस चुनावी साल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सबसे ज्यादा दक्षिण भारत की यात्रा पर ही देखे गए हैं। जानकारों को लगता है कि जिस 370 सीटों पर जीत का लक्ष्य उन्होंने तय किया है, उसके लिए दक्षिण विजय बहुत जरूरी है। इसीलिए प्रधानमंत्री कर्नाटक, केरल, तेलंगाना से लेकर तमिलनाडु तक का दौरा कर रहे हैं।