दो माह की पारो का इलाज क्या सिर्फ उसकी मां की जिम्मेदारी है!

रीवा से ममता कोल की रिपोर्ट
27 साल की उम्र आमतौर पर सपने देखने या अपने सपनों में रंग भरने की होती है, लेकिन रीवा के जरहैया गांव की सुनीता की आंखों में इस उम्र में सिवाय आंसू और अंधेरपन के कुछ भी नहीं है। उसकी 2 माह की बच्ची पारो जिंदगी और मौत से लड़ रही है। दो अन्य बच्चे प्रतिभा और संकल्प को पालने की जिम्मेदारी वह अकेले किसी तरह निभा रही है, क्योंकि पति बृजेश कर्नाटक में दिहाड़ी कर रहे हैं, ताकि बच्चों को पालने लायक पैसा जुटा सकें। लेकिन इस बीच पारो की बीमारी ने परिवार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। मुश्किल यह है कि स्वास्थ्य विभाग अपने एमसीपीसी कार्ड में बच्ची को सामान्य बता रहा है और पारो की तकलीफें लगातार बढ़ती जा रही हैं।

मामला रीवा जिला मुख्यालय से लगभग 97 किमी दूर जवा ब्लाक का गाँव जरहैया ग्राम पंचायत – गहिलवार का है। यहां 27 वर्षीय सुनीता देवी पाल और उनके पति बृजेश पाल (उम्र 31 वर्ष) का परिवार रहता है। इस 4 सदस्यीय परिवार में 5 वर्षीय बेटी प्रतिभा और 2 वर्षीय बेटा संकल्प भी हैं। परिवार के पास खुद की जमीन नहीं है। पति बृजेश पाल को आसपास काम नहीं मिला और अब वे कर्नाटक में (बागवानी) का काम दिहाड़ी पर करते हैं। अपने परिवार को पालने के लिए बृजेश को लगातार छः महीने पलायन पर ही रहकर काम करना पड़ता है। इसके बदले में प्रतिमाह लगभग 10,000 हजार रुपये की मजदूरी मिलती है। सुनीता देवी घरेलू काम-काज करती हैं, ताकि परिवार की आजीविका कुछ ठीक ठाक ढंग से चल सके।

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सुनीता के तीसरे गर्भ का पंजीयन 9 मई 2023 को आंगनवाड़ी केंद्र मे दर्ज हुआ। इसमें LMP दिनांक 13 मार्च 2023 दर्ज की गयी। इस आधार पर प्रसव की संभावित तिथि 18 दिसंबर 2023 थी। सुनीता नियमित रूप से अपने दैनिक कामों पर लगी रही। दो बच्चों की देखरेख और लालन पालन में अपना समय देती रहीं। इसके साथ ही गर्भावस्था को ध्यान रखते हुए दो टीके क्रमशः 9 मई 2023 और 28 जुलाई 2023 को लगवाए। गर्भावस्था के दौरान सेवा प्रदाताओं से आयरन फोलिक एसिड की 60 गोलियां मिलीं, जिसमें से सुनीता ने केवल 30 गोलियां ही खाईं। हीमोग्लोबिन का स्तर 9.4 से 9.8 तक रहा। सुनीता आखिरी गर्भकाल माह (9 वां) में संभावित प्रसव दिनांक का इंतजार करती रहीं। इसी दौरान दिनांक 1 दिसंबर 2023 को पेट में दर्द हुआ तो पति ब्रजेश उन्हें 108 सेवा का नंबर डायल कर जननी गाड़ी से आशा कार्यकर्ता के साथ डभौरा प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले गए।

रात 1 बजे बच्ची पारो का जन्म सामान्य प्रसव से हुआ। जन्म के समय वजन 1.5 किलो ग्राम था। पारो प्रीमैच्योर बेबी रही और उसके रीढ़ के निचले हिस्से पर घाव जैसा था। इस कारण से स्वास्थ्य अधिकारी ने बच्ची को जिला अस्पताल के लिए रेफर कर दिया। परिवार इस विपरीत परिस्थिति से घबरा कर जिला अस्पताल न जाकर प्रायवेट अस्पताल शंकरगढ़ ले गये कि प्रायवेट में तत्काल इलाज मिल सकेगा। वहां दो दिन भर्ती रही और इलाज कराने के बाद घर वापस आ गए। इसके बाद निचले भाग में भयानक फोड़ा बना गया है। इससे मल के साथ ब्लड का रिसाव बना रहता है। इसका इलाज कराते हुए परिवार प्रायवेट अस्पताल मे लगभग चालीस हजार रुपये खर्च कर चुका है, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। पारो के पिता बृजेश पुनः कर्नाटक मजदूरी पर चले गए हैं कि पैसे जुटा कर बच्ची का सही इलाज करा सकें। इधर माँ सुनीता बच्ची पारो को लेकर अस्पताल के चक्कर काट रही है।

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एमसीपीसी कार्ड में विभाग की ओर से गृह आधारित प्रसूता एवं नवजात शिशु की देखभाल में कोई जटिलता नहीं, रेफरल योग्य नहीं, वजन- 3.5 KG, मल विसर्जन में कोई परेशानी नहीं, स्तनपान सामान्य, इत्यादि जानकारी दर्शाकर पल्ले झाड़ लिए हैं। जबकि पारो ज़िंदगी और मौत से लड़ रही है। परिवार पूरी तरह से परेशान है।

आज दिनांक 2 मार्च 2024 को सुनीता बच्ची को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डभौरा लेकर पहुंची, जिसमें जिला अस्पताल के लिए रेफर कर दिया तो अकेली सुनीता 2 बच्चों को साथ लेकर जाने में सक्षम नहीं हो पाई, क्योंकि पति बृजेश पैसे जुटाने के लिए पलायन पर है। इधर पारो कि हालत बेहद गंभीर होती जा रही है।