Premchand

Premchand: अपने समय को देखने की काबिलियत देते हैं प्रेमचंद

संविधान लाइव में रविवार को हुई प्रेमचंद (Premchand) पर परिचर्चा

बीते रविवार को भारतीय महिला फेडरेशन, संविधान लाइव और आल इंडिया यूथ फेडरेशन की ओर से उपन्यास सम्राट प्रेमचंद (Premchand) की जयंती के उपलक्ष्य में “मेरे प्रेमचंद” विषय पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस आयोजन की खासियत यह रही कि परिचर्चा से पहले बच्चों ने प्रेमचंद (Premchand) का संक्षिप्त परिचय दिया और फिर प्रेमचंद (Premchand) की कहानियों का पाठ किया। अन्य वक्ताओं ने प्रेमचंद (Premchand) के साहित्य से उनके निजी जुड़ाव को बताते हुए प्रेमचंद (Premchand) की कहानियों और उनके पात्रों के बारे में बात की।

कार्यक्रम की शुरुआत में इकरा ने प्रेमचंद (Premchand) का संक्षिप्त परिचय बताते हुए कहा कि उन्होंने हिंदी और उर्दू में 301 कहानियां लिखीं। प्रेमचंद (Premchand) का बचपन बहुत मुश्किलों में बीता। इकरा ने कश्मीरी सेव नामक कहानी का पाठ किया। इसके बाद अल्फिया, आफरीन, रेहान, फायजा, जोया और गुनगुन ने प्रेमचंद की अलग अलग कहानियों का पाठ किया।

इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीवान ने कहा कि आज प्रेमचंद (Premchand) की कहानियां हों या श्रीलाल शुक्ल का राग दरबारी सभी पर एक समान संकट है। यह संकट उस सारे साहित्य पर है, जिसे लेकर हमारी और बाद की भी एक पीढ़ी भावुक है। 1930 के आसपास जब प्रेमचंद लिख रहे थे वह उथल पुथल का दौर था। तब महात्मा गांधी भारत आ गए थे और आजादी का संघर्ष जारी था। उस दौर को रचनात्मक खूबसूरती से सामने रखना प्रेमचंद (Premchand) के सामने एक बड़ी चुनौती थी। उसके बाद आजादी के बाद के दौर को उसकी विद्रुपताओं को, उसकी मक्कारियों को और समाज की अच्छाइयों को भी राग दरबारी ने दर्ज किया। लेकिन संकट यह है कि अब यह दोनों ही समाज आज के शहरी समाज से दूर हैं। चाहे वह प्रेमचंद (Premchand) के पात्र हों, या राग दरबारी के पात्र। इनसे शहरी समाज का वास्ता नहीं है। इसलिए राग दरबारी को पढ़ते हुए जो मजा कस्बाई युवाओं को आता है, वह शहरी युवा को नहीं मिलेगा।

उन्होंने कहा कि प्रेमचंद (Premchand) को हिंदी या उर्दू में लिखने पर भले बात करें लेकिन असल में उनकी जुबान हिंदुस्तानी है, जो हिंदी—उर्दू का मिश्रण है। तब संविधान सभा में भी इस बात पर काफी बवाल हुआ था कि हमारी राष्ट्र भाषा हिंदी हो या हिंदुस्तानी। यह बेहद अफसोसनाक है कि हिंदुस्तानी को तरजीह नहीं दी गई, जो दोनों भाषाओं का मिश्रण है। हालांकि प्रेमचंद के लिए भाषा एक औजार थी और उन्होंने खूबसूरती से हिंदुस्तानी में अपने समय को दर्ज किया। लेकिन अब वह भाषा और वह जीवन शहरी संसार से दूर है।

उन्होंने कहा कि दिलचस्प है कि प्रेमचंद (Premchand) आजादी के पहले अपने समाज को दर्ज करते हैं और वह पूरा गंभीर लेखन है, लेकिन आजादी के बाद की परिस्थितियों को दर्ज करते हुए श्रीलाल शुक्ल राग दरबारी में व्यंग्य का सहारा लेते हैं। यह उच्च कोटि का व्यंग्य है और आजादी के बाद यह मारक होता है। लेकिन यह सामाजिक मुश्किलें तब भी शाश्वत रहती हैं। आज भी वह हालात हैं। आज हमें अपने औजार बदलने होंगे।

उन्होंने कहा कि एक बड़ा साहित्यकार, लेखक असल में अपने समय से संवाद ही करता है और उसका औजार भाषा होती है, तो हमें अपनी भाषा पर फिर विचार करना जरूरी है। अपने समाज को देखने की दृष्टि भी इसमें जरूरी है और यह दृष्टि अपने समय को देखने की काबिलियत ही हमें हमारे पूवर्ज देते हैं। एक कुम्हार कैसे चाक और मिट्टी के जरिये नए नए बर्तनों को आकार देता है, वह देखना अपने अपने रचने की प्रक्रिया को समझना है। अपने समय को दर्ज करने के लिए हमें समाज की घटनाओं उसके रिश्तों उसके संकटों को जानना जरूरी है, तभी भाषा के जरिये वह सामने आएंगे। 

इसलिए हमें अपने पूर्वजों से संवाद करना चाहिए। यह बुनियादी चीज है और अपने आंख, कान खुले रखना भी जरूरी है, नहीं तो हम एक भेडियाधंसान में फंसते चले जाएंगे।

सामाजिक—राजनीतिक कार्यकर्ता सत्यम पांडे ने पंच परमेश्वर कहानी से अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि प्रेमचंद (Premchand) की कहानी पंच परमेश्वर में दोस्ती का जिक्र है और आज 1 अगस्त को दोस्ती का ही दिन है। पूरी दुनिया में आज फ्रेंडशिप डे मनाया जा रहा है। उन्होंने गोदान फिल्म के गाने अहसान मेरे दिल पर तुम्हारा है दोस्तों का भी इसी संदर्भ में जिक्र किया और कहा कि प्रेमचंद के उपन्यास “गोदान” पर “तहरीर” धारावाहिक के अंतर्गत बनी कहानी में मशहूर अभिनेत्री सुरेखा सीकरी ने अभिनय किया था, जिनका हाल ही में निधन हुआ है। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद की कहानियों को पहली बार पढ़ा—जाना तब हम जाति को सबसे अच्छा समझते थे और कहानी में जातिवाद पर चोट थी, लेकिन बाद में समझ आया कि बात तो सही है। इस तरह प्रेमचंद की कहानियां हमें अपने समाज को सही ढंग से देखने की दृष्टि भी देती हैं। उन्होंने कहा कि आज समाज में तोड़ने वाले लोग ज्यादा हावी होते दिख रहे हैं, लेकिन अगर इकट्ठा रहते हैं, हम अपने आसपास के लोगों से बात करते रहते हैं, तो प्रेमचंद को ज्यादा अच्छे से समझ पाएंगे।

वरिष्ठ साहित्यकार मुजफ्फर इकबाल सिद्दीकी ने प्रेमचंद की एक लघु कथा बंद दरवाजा का पाठ किया और कहा कि प्रेमचंद (Premchand) के लिए भाषा साधना थी, साध्य नहीं थी। उन्होंने तसव्वुराती लेखन को जमीन पर उतारा और कहानियों के विषय रोजमर्रा की जिंदगी की तकलीफों से उठाए। साथ ही समाज के व्यापक नजरिये को भी सामने रखा। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद को शहर कभी रास नहीं आया, वे बंबई भी रहे लेकिन उनका मन गांवों और समाज में ही लगा।

एटक के उप महासचिव शिव शंकर मौर्य ने अपने अनुभव का जिक्र कहा कि प्रेमचंद को पढ़ना हमारे कॉलेज के दिनों में इसलिए भी जरूरी था कि नहीं पढ़ेंगे तो फेल हो जाएंगे। लेकिन उनकी कहानियों में जो समाज झलकता है, जो तकलीफें दिखती हैं, वे जीवन से भी जोड़ती हैं। उन्होंने कहा कि एक लेखक के तौर पर प्रेमचंद (Premchand) ने कई पीढ़ियों का मार्गदर्शन किया है। वे प्रगतिशील परंपरा के भी वाहक रहे हैं।

ख्यातिलब्ध कार्टूनिस्ट बालेंदू परसाई ने कहा कि प्रेमचद (Premchand) के बारे में उन्होंने गोष्ठियों, परिचर्चाओं के जरिये ही जाना। उन्होंने बताया कि प्रेमचंद की कहानियों के पात्रों पर हाल ही उन्होंने कुछ कार्टून बनाए, जिन पर खासी चर्चा सोशल मीडिया पर हुई। यह दिखाता है कि उनके पात्र आज भी लोगों से संवाद करते हैं।

पत्रकार सचिन श्रीवास्तव ने कहा कि प्रेमचंद (Premchand) अपने समय से जो संवाद कर रहे थे, वह किसी दवाब का नतीजा नहीं था, उन्हें यह जरूरी लगा और कहानियां, उपन्यास उनका औजार थे। आज कम्यूनिकेशन के तौर तरीकों के लिए भी प्रेमचंद को पढ़ना और उन्हें जानना जरूरी है। वीडियो और आवाजों के दौर में शब्दों को पढ़कर दृश्य बनाना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि हम और हमारे से पहले की पीढ़िया नाकारा साबित हुई हैं, जो हम प्रेमचंद की कहानियों के भारत को आज नहीं बदल पाए हैं, लेकिन उम्मीद है कि आने वाली पीढ़ी इस दृश्य को बदलेगी।

युवा रिसर्चर सालिक अंसारी ने कहा कि बच्चों ने जो कहानियां सुनाईं उनमें प्रोटीन, विटामिन के साथ जिस तरह खाने की आदतें बदलीं और चीजों के दाम के मुताबिक उन्हें खाने वालों का जिक्र बताता है कि रोजमर्रा की जिंदगी में कितनी कहानियां छुपी होती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि इसी क्रम में बच्चे भी अपने आसपास की जीवन पर लिखें तो कई अच्छी कहानियां सामने आ सकती हैं।

रंगकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल हक ने कहा कि प्रेमचंद (Premchand) जिस वक्त में लिख रहे थे तब हमारा संविधान भी नहीं बना था। न देश आजाद हुआ था, लेकिन उनके सामने एक दृश्य था, उनका इमेजिनेशन था कि उन्होंने देश की वह तस्वीर सामने रखी जो आज भी हमें सच्चाई दिखाती है। उन्होंने यह भी अफसोस जाहिर किया कि हैरत है कि उस वक्त से आज तक व्यवस्था नहीं बदली।

सामाजिक कार्यकर्ता शिवराज कुशवाहा ने कहा कि प्रेमचंद (Premchand) के बारे में उन्होंने स्कूल में ही जाना। उनकी हिंदी की टीचर कहानियों को अलग ढंग से पढ़ाती थीं, इसलिए बड़े भाई साहब कहानी हमेशा ताजा रहती है।

रंगकर्मी और फिल्म कलाकार देवेंद्र कुशवाहा ने कहा कि स्कूली दिनों में ही प्रेमचंद (Premchand) की कहानियों से रिश्ता बन गया था, जो रंगकर्म के दौरान मजबूत हुआ। उन्होंने बताया कि छतरपुर में प्रेमचंद की कहानी कफन का मंचन पिछले छह साल से लगातार कर रहे हैं।

युवा सामाजिक कार्यकर्ता मनोहर राणा ने कहा कि प्रेमचंद (Premchand) की कहानियों को स्कूल में पढ़ा था और उसी दौरान दूरदर्शन पर कुछ कहानियों पर आधारित नाटक आते थे, इससे कहानियों से एक रिश्ता बना।

इस दौरान बच्चों के कहानी पाठ के बाद करूणा गवई ने प्रेमचंद (Premchand) के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद प्रगतिशील परंपरा के लेखक थे और प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना पर पहले सम्मेलन में वे अध्यक्ष बने। साथ ही उनकी कहानियों में भारत की तात्कालिक परिस्थितियां पूरे वेग से सामने आती हैं। उन्होंने प्रेमचंद की कहानियों पर बनी फिल्मों का जिक्र करते हुए कहा कि फिल्मी दुनिया उन्हें बहुत ज्यादा रास नहीं आई, हालांकि उस वक्त की फिल्मों पर प्रेमचंद का खासा प्रभाव रहा।

कार्यक्रम के दौरान रवीना, निम्रा सिद्दीकी, शिव कुमार ने भी प्रेमचंद की कहानियों से अपने रिश्ते को बताया। इस दौरान निहारिका पंसोरिया, फरहा, उमर, अब्दुल अजीज समेत अन्य लोग मौजूद थे।

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