17th AIPSC: देश में वैज्ञानिक चेतना को मजबूत करने के लिए करेंगे जमीनी कार्रवाई

विज्ञान, विचार और कला के उद्घोष के बीच हुआ 17वीं अखिल भारतीय जन विज्ञान कांग्रेस (17th AIPSC) का समापन
नई कार्यकारिणी: आयसर पुणे के वैज्ञानिक प्रो. सत्यजीत रथ अध्यक्ष और मध्यप्रदेश बीजीवीएस की आशा मिश्रा चुनी गईं महासचिव
मध्य प्रदेश विज्ञान सभा के एस.आर. आजाद बने आल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क के कोषाध्यक्ष
4 दिन में 12 सत्र और 28 कार्यशालाओं में 70 से अधिक विशेषज्ञों ने रखी अपनी बात

17th AIPSC: स्थानीय एक्सटॉल कॉलेज में 6 से 9 जून के बीच संविधान, समाज, विज्ञान, कृषि, कोविड, महिला, बच्चों, जेंडर, पर्यावरण, किसान, सोशल मीडिया, विकास, आदिवासी, अर्थव्यवस्था, वैज्ञानिक चेतना समेत विविध विषयों पर 70 से अधिक विशेषज्ञों ने अपनी बात रखी। इस दौरान देश के 20 से अधिक राज्यों के आए 800 से अधिक प्रतिनिधियों ने इस बातचीत में हस्तक्षेप किया। साथ ही अपने अपने राज्यों, क्षेत्रों और समुदायों की सांस्कृतिक विविधता से रूबरू कराते हुए संवाद किया। यह मौका था 17वीं अखिल भारतीय ​जन विज्ञान कांग्रेस का (17th AIPSC), जिसे आल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क (AIPSN) की ओर से आयोजित किया गया।

‘आइडिया आफ इंडिया,’ यानी “भारत का विचार” थीम पर आयोजित इस आयोजन (17th AIPSC) के उद्घाटन सत्र को वरिष्ठ पत्रकार और जनसरोकार की पत्रकारिता के प्रमुख स्तंभ पी. साईनाथ ने संबोधित किया, तो समापन समारोह के मुख्य वक्ता नाल्सर यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के कुलपति एवं संविधान विशेषज्ञ प्रो. फैजान मुस्तफा थे। इसके अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. अनिता रामपाल, सिद्धो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सोनाझारिया मिंज, केरला की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा, इंस्टिट्यूट ऑफ मैथेमेटिकल साइंसेस चेन्नई की प्रो. डी. इंदुमति, शिक्षाविद प्रो. आर., ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क के अध्यक्ष डॉ. सब्यसाची चटर्जी, रामानुजम, आयशर पुणे के वैज्ञानिक प्रो. सत्यजीत रथ, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, शिमला से आए सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. ओ.पी. भूरेटा, इंटरनेशनल नाइट्रोजन इनिशिएटिव के चेयरमेन प्रो. एन. रघुराम, पर्यावरणविद् एवं वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डी. रघुनंदन, वरिष्ठ स्वास्थ्य कार्यकर्ता समीर गर्ग, वरिष्ठ कवि राजेश जोशी, प्रो. सुरोजीत मजूमदार, पूर्वा भारद्वाज, प्रो. आर. रामानुजन, प्रो. विनीता गोवडा, प्रो. डी. इंदुमती, मयंक वाहिया, गौहर रजा, किशोर चंद्र, विवेक मोंटेरियो, इंदिरा चक्रवर्ती, वंदना प्रसाद, टी. सुंदररमन, दिनेश अब्रोल, अशोक धावले, रामालिंगम ई., थॉमस फ्रैंको, मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव शरदचन्द्र बेहार, वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता राजेन्द्र कोठारी, सामाजिक कार्यकर्ता संदीप दीक्षित, किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बादल सरोज, समर्थन संस्था के निदेशक डॉ. योगेश कुमार, विकास संवाद के निदेशक सचिन जैन सहित देश के कई वरिष्ठ वैज्ञानिक, शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए।

कार्यक्रम (17th AIPSC) के उद्घाटन समारोह में स्वागत उद्बोधन वरिष्ठ साहित्यकार रामप्रकाश त्रिपाठी ने दिया। सत्रों के संचालन की जिम्मेदारी विज्ञान सभा के एस आर आजाद, बीजीवीएस के राहुल शर्मा, सामाजिक कार्यकर्ता सत्यम पांडे आदि ने निभाई।

समापन समारोह (17th AIPSC) के बाद अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क की नई कार्यकारिणी की घोषणा की गई। इसमें अध्यक्ष आयसर पुणे के वैज्ञानिक प्रो. सत्यजीत रथ को नियुक्त किया गया। वहीं मध्यप्रदेश भारत ज्ञान विज्ञान समिति की आशा मिश्रा को महासचिव और मध्यप्रदेश विज्ञान सभा के एस.आर. आजाद को कोषाध्यक्ष बनाया गया है। अंत में यह संकल्प लिया गया कि आने वाले दिनों में देश में वैज्ञानिक चेतना के प्रसार को लेकर कार्यक्रम बनाए जाएंगे।

कार्पोरेट पावर, अतार्किकता एवं गैर बराबरी के खिलाफ हो लड़ाई
इससे पहले 6 जून को उद्घाटन सत्र के मुख्य वक्ता वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ ने कहा कि पिछले 10 सालों में असमानता की खाई ज्यादा गहरी हुई है। आजादी के 75वें साल में कार्पोरेट पावर, अतार्किकता एवं गैर बराबरी के खिलाफ हमें लड़ाई लड़नी होगी। यह दुखद है कि आजादी के अमृत महोत्सव में आजादी के मूल्यों और संवैधानिक मूल्यों की बात नहीं की जा रही है। देश में वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बढ़ावा दिए बिना समानता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों की समस्याओं का हल नहीं किया जा सकता। कार्पोरेट मीडिया के माध्यम से जनता की आवाज को सामने नहीं लाया जा सकता।
कार्यक्रम का उद्घाटन मंच से भारत के संविधान की प्रस्तावना के उद्घोष और प्रतिभागियों द्वारा झंडे को लहराते हुए किया गया। ये रंगीन झंडे भारत की विविधता और बहुलता को दर्शा रहे थे।

समानता, सबको अवसर, आजीविका के बिना लोकतंत्र नहीं
कार्यक्रम की मुख्य अतिथि केरला की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के.के. शैलजा ने कहा कि समानता, सबको अवसर, आजीविका के बिना सही मायने में लोकतंत्र नहीं है। आज पूंजीवादी एवं सामंतवादी व्यवस्था का समय है। वास्तविक आजादी के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। संविधान बनाते समय हमने प्रगतिषील विचारों को अपनाया और अखंडता, समता, समानता एवं समाजवाद की बात की। इन्हें आज हम बिना वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हासिल नहीं कर सकते। केरला ने कोविड के समय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ उसका सामना किया। शैलेजा ने कोविड के समय के अनुभवों को भी साझा किया।

विज्ञान शिक्षा में शोध का बढ़ावा देने की जरूरत : डी. इंदुमती
इंस्टिट्यूट ऑफ मैथेमेटिकल साइंसेस, चेन्नई की प्रो. डी. इंदुमति ने कहा कि उच्च शिक्षा में दशमलव 6 फीसदी बजट खर्च हो रहा है, जिसकी वजह से विज्ञान में शोध के अवसर कम हुए हैं। आज इस बात की जरूरत है कि नए शोध संस्थान खोले जाएं और उनके लिए ज्यादा फंड दिए जाएं।

जन विज्ञान आंदोलन की जरूरत
वरिष्ठ कवि राजेश जोशी ने अपनी एक कविता सुनाते हुए वर्तमान राजनीतिक और वैज्ञानिक चुनौतियों पर टिप्पणी की। स्वागत उद्बोधन में वरिष्ठ साहित्यकार रामप्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि मौजूदा समय में जन विज्ञान आंदोलन की ज्यादा जरूरत है। कार्यक्रम की प्रस्तावना बताते हुए ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क के अध्यक्ष डॉ. सब्यसाची चटर्जी ने कहा कि मेघनाथ साहा, रबिन्द्रनाथ टैगोर, जवाहरलाल नेहरु और सुभाष चंद्र बोस जैसे हमारे देष के कई वरिष्ठ वैज्ञानिक, साहित्यकारों एवं राजनेताओं ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण की बात की है, जिन्होंने भारत की विविधता और बहुलता में एकता को महत्व दिया है। आज इसे नकारने का प्रयास किया जा रहा है।

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बाजार के हस्तक्षेप से बनाई जा रही है शिक्षा नीति : प्रो. अनिता रामपाल
7 जून को दूसरे दिन स्वास्थ्य, शिक्षा, निजीकरण और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर सेमिनार का आयोजन किया गया। इसके साथ ही छोटे समूहों में विज्ञान एवं सामाजिक विकास से जुड़े विषयों पर कार्यशालाओं का आयोजन किया गया। इस मौके पर दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रो. अनिता रामपाल ने कहा कि नईशिक्षा नीति में कई खामियां हैं, जो एक बड़े वर्ग को शिक्षा से वंचित कर सकती है। शिक्षा नीति बनाने और उसके क्रियान्वयन में बाजार का हस्तक्षेप है। भारत के शिक्षा मॉडल में बाजारीकरण की झलक मिलती है। सरकारी स्कूलों की इतनी श्रेणियां बना दी गई है, जो अपने आप में भेदभाव को दर्शाता है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर बात करते हुए साइंस डॉक्युमेंट्री निर्माता एवं वैज्ञानिक गौहर रजा ने कहा कि जरूरी नहीं कि जिन तक विज्ञान पहुंचे उन तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी पहुंचे। यह हमारी बड़ी जवाबदेही है कि इस वर्ग तक वैज्ञानिक दृष्टिकोण पहुंचाया जाए।

स्वास्थ्य पर बात करते हुए वरिष्ठ स्वास्थ्य कार्यकर्ता समीर गर्ग ने कहा कि आयुष्मान कार्ड जैसी योजना से निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को लाभ हो रहा है और सार्वजनिक स्वास्थ्य ढांचा कमजोर हो रहा है।

वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सत्यजीत रथ ने कहा कि महामारी या सामान्य समय में भी हम तक दवाइयों के पहुंचने के साथ-साथ इसकी जानकारियों का भी पहुंचना जरूरी है। जानकारी के अभाव में हम उन बातों को नहीं जान पाते, जिनकी वजह से हमारा स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है।

इसके अलावा दूसरे दिन विज्ञान कांग्रेस में प्रो. सुरोजीत मजूमदार, पूर्वा भारद्वाज, प्रो. आर. रामानुजन, प्रो. विनीता गोवडा, प्रो. डी. इंदुमती, मयंक वाहिया, किशोर चंद्र, विवेक मोंटेरियो, इंदिरा चक्रवर्ती, वंदना प्रसाद, टी. सुंदररमन, दिनेश अब्रोल, अशोक धावले, डी. रघुनंदन, रामालिंगम ई., थॉमस फ्रैंको सहित देश के कई वरिष्ठ वैज्ञानिक, शिक्षाविद एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए।

8 जून को पर्यावरण, कृषि, आजीविका, लैंगिक समानता जैसे विषयों पर सेमिनार एवं कार्यशालाएं आयोजित किए गए। ‘‘हस्ती मिटती नहीं हमारी’’ विषय पर आजादी के 75वें साल में भारतीय संस्कृति की विविधता पर भी चर्चा की गई।

सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सोनाझारिया मिंज ने कहा कि हर गांव तक प्राथमिक स्कूल की पहुंच हो गई है, भले ही वहां कैसी भी शिक्षा हो, लेकिन आज भी जरूरत के मुताबिक उच्च शिक्षण संस्थान नहीं है। शिक्षा के माध्यम से सशक्तिकरण, समानता और समावेशीकरण के लक्ष्यों को पाया जा सकता है, लेकिन उच्च शिक्षा का फंक्शनल पार्ट दयनीय स्थिति में है। स्कूली शिक्षा में भी क्लासरूम से भेदभाव हटाने के लिए हमें प्रोग्रेसिव स्कूल की जरूरत है, जहां भाषा, पहनावा, लिंग एवं रंग के आधार पर भेदभाव न हो।

शिमला से आए सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. ओ.पी. भूरेटा ने कहा कि हिमालयन जोन बहुत ही संवेदनशील है। हम वहां जो भी विकास की पहल कर रहे हैं, उसका पूरे पर्यावरण पर असर पड़ रहा है। जम्मू-कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व तक के हिमालयन राज्यों में विकास की योजनाएं बनाते समय हमें यह देखना होगा कि इसका असर पूरे देश ही नहीं, बल्कि दुनिया के पर्यावरण पर पड़ता है। आज जो भी आपदाएं आती हैं, वे प्राकृतिक नहीं, बल्कि मानव जनित आपदाएं हैं। हमें इस क्षेत्र में बड़ी योजनाओं पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना चाहिए और आपदाओं के प्रति लोगों में जागरूकता, वनीकरण एवं सही नीति के साथ आगे बढ़ना चाहिए।

इंटरनेशनल नाइट्रोजन इनिशिएटिव के चेयर प्रो. एन. रघुराम ने कहा कि कृषि क्षेत्र की विदेशी निजी कंपनियों एवं ईस्ट इंडिया कंपनी में कोई अंतर नहीं है। ये सारी कंपनियां किसानों को लूटकर यहां की पूंजी विदेश ले जा रही है। आज कृषि क्षेत्र के कई समझौते पूंजीवादी पूंजी को बढ़ाने के लिए किया जा रहा है, इसका किसानों को कोई फायदा नहीं है। आश्चर्यजनक बात यह है कि देश में आजादी के बाद उत्पादन बढ़ा है, लेकिन भूखमरी खत्म नहीं हुई। यह वितरण प्रणाली के असफल होने के कारण है।

कोरोना काल में आजीविका को लेकर देशव्यापी संकट आया था, जिसमें रिवर्स माइग्रेशन में गांव लौटे मजदूरों के लिए गांव में कोई आजीविका नहीं थी। कृषि में भी रोजगार सीमित है। इस मसले पर पर्यावरणविद् एवं वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता डी. रघुनंदन ने एक अध्ययन की रिपोर्ट जारी करते हुए बताया कि ग्रामीण क्षेत्र में गैर कृषि रोजगार यानी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ाने की जरूरत है ताकि टिकाऊ आजीविका की ओर हम बढ़ सकें।

समापन सत्र में प्रो. फैज़ान मुस्तफा ने कहा कि कानून का मतलब न्याय होता है, लेकिन कानून के केन्द्र में शक्ति हो गई है। आज स्थिति यह है कि लोगों के न्याय क्या है, बताना मुश्किल हो गया है। पर हमें अन्याय भी नहीं दिख रहा है। किसी के साथ हो रहे अन्याय को देखकर हम विचलित क्यों नहीं हो रहे हैं? यदि ऐसा नहीं हो रहा है, तो मनुष्यता पर प्रश्नचिह्न लगता है। उन्होंने कहा कि हमारे संविधान में अभिव्यक्ति की आजादी दी हुई है। इसका साफ मतलब है कि व्यक्ति के दिल में जो कुछ भी है, उसे बोलने दिया जाए। जो समाज बोलने से रोकता है, वह आगे नहीं बढ़ सकता। जनता की सहमति से सरकार है, तो जनता की भागीदारी सरकार की नीतियों पर बोलकर ही हो सकती है। यह प्रशंसा के रूप में भी हो सकता है या फिर आलोचना के रूप में। उन्होंने कहा कि देश में वैज्ञानिक चेतना के बिना देश को बेहतर नहीं बनाया जा सकता। देश में नफरती भाषणों के खिलाफ कड़े कानून बनाने की जरूरत है। आज देश में धर्म, सत्ता और कार्पोरेट का गठजोड़ है, यदि हम इसे समझ जाएंगे, तो संभव है कि कुछ बेहतर कर पाएं।

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने कहा आज जो देशमें धर्मान्धता फैली है, उसे वैज्ञानिक चेतना से खत्म किया जा सकता है। वैज्ञानिक चेतना के लिए जन विज्ञान आंदोलन से जुड़े लोगों को सामूहिक रूप से आगे आकर काम करना होगा।

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शिक्षाविद प्रो. आर. रामानुजम ने कहा कि आज जनता डेटा बन गई है। हमें तकनीक के सही इस्तेमाल के लिए लोगों को जागरूक करना होगा। सिदो कान्हू मुर्मू विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. सोनाझारिया मिंज ने कहा कि समाज के उन आयामों की पहचान की जाए, जहां वैज्ञानिक चेतना में कमी है और फिर हमें उन क्षेत्रों में काम करने की जरूरत है।

संसाधनों के बावजूद पिछड़ा हुआ है मध्यप्रदेश

मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के विकास पर बात करते हुए डॉ. योगेश कुमार, सचिन जैन, राजेन्द्र कोठारी, संदीप दीक्षित सहित कई वक्ताओं ने कहा कि मध्यप्रदेश में प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता है, लेकिन इसके बावजदू स्वास्थ्य, शिक्षा एवं रोजगार में प्रदेश पिछड़ा हुआ है।

विकास संवाद के निदेशक सचिन जैन ने कहा कि सामाजिक विकास के संकेतकों में मध्यप्रदेश पिछड़ा हुआ है। एक ओर केरल में जहां शिशु मृत्यु दर 6 है, वहीं मध्यप्रदेश में इसकी संख्या 43 है। स्वास्थ्य की स्थिति देखा जाए, तो प्रदेष में 14 हजार से ज्यादा उप स्वास्थ्य केन्द्र चाहिए, लेकिन पिछले 15 सालों से 4 हजार की कमी बनी हुई है। एनएफएचएस के नए आंकड़ों में देखा जाए तो गांवों में स्वच्छ ईंधन का उपयोग मात्र 23 फीसदी घरों में है।

वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता राजेन्द्र कोठारी ने कहा कि मध्यप्रदेश की प्रति व्यक्ति आय देश की तुलना में दो तिहाई ही है। प्राकृतिक संसाधन के बावजूद कुपोषण, बेरोजगारी और अन्य समस्याएं हैं।

मध्यप्रदेश के मानव विकास पर काम करने वाले वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता संदीप दीक्षित ने कहा कि प्रदेश के 95 फीसदी नेतृत्व यहां की संभावनाओं को छूते ही नहीं है। असीम संभावनाओं के बावजूद हम आगे नहीं बढ़ पाए। राजनीतिक नेतृत्व प्रदेश के बजाय व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए संसाधनों का दोहन कर रहा है।

किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बादल सरोज ने कहा कि मध्यप्रदेश के संसाधनों को बचाने में यहां के जन आंदोलनों की बड़ी भूमिका रही है, यदि ऐसा नहीं होता, तो विकास के नाम पर जल, जंगल और जमीन को सरकार बेच देती। यह लड़ाई अभी भी जारी है।

मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव शरदचन्द्र बेहार ने कहा कि प्रदेश में पंचायत राज को मजबूत करने के बजाय खत्म करने का प्रयास किया जाता रहा है, ऐसे में विकेंद्रीकृत विकास की संभावनाएं खत्म होती है।

समर्थन संस्था के निदेशक डॉ. योगेश कुमार ने कहा कि पंचायतों की ताकत कम करने से शक्तियां केंद्रीकृत हो जाती है, जिसकी वजह ग्राम सरकार की अवधारणा खत्म हो जाती है। यह जरूरी है कि पंचायतों एवं राज्य स्तर के संस्थानों में शक्ति का सही तरीके से बंटवारा किया जाए और हमें पंचायत राज को मजबूत करने का प्रयास करना होगा।

अंतिम दिन समापन सत्र में संविधान और वैज्ञानिक चेतना के साथ मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ के विकास पर चर्चा की गई। आखिरी सत्र में अखिल भारतीय जन विज्ञान नेटवर्क की नई समिति भी गठित की गई। इस अवसर पर विज्ञान एवं संविधान से जुड़ी विभिन्न पुस्तकों का विमोचन किया गया। साथ ही पूरे आयोजन की विस्तृत रिपोर्ट के रूप में 8 पृष्ठों के अखबार का विमोचन किया गया।

शाम को विभिन्न राज्यों से आए प्रतिभागियों ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।

कार्यक्रम स्थल पर विभिन्न राज्यों के पुस्तकें एवं उत्पादों के स्टॉल लगाए गए । आंध्रप्रदेश के प्रतिभागियों ने अंधविश्वास एवं भ्रांतियों की वैज्ञानिक व्याख्या के लिए लाइव डेमो का स्टॉल लगाया । “भारत का विचार’’ को लेकर विभिन्न महापुरुषों एवं वैज्ञानिकों के वक्तव्य के साथ वरिष्ठ चित्रकार मनोज कुलकर्णी की पेंटिंग प्रदर्शनी लगाई गई।

गीत, गायन, कविता में घुले विज्ञान और प्रतिरोध के स्वर
17वीं अखिल भारतीय जन विज्ञान कांगेस के दौरान विभिन्न सत्रों और कार्यशालाओं में मुद्दा आधारित बातचीत के साथ विभिन्न सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने भी प्रतिभागियों को खासा रोमांचित किया। इन प्रस्तुतियों से एक ओर जहां देश की सांस्कृतिक विविधता देखने जानने को मिली, तो वहीं विचार और कला के मेल से बनने वाली वैज्ञानिक चेतना ने भी झकझोरा।
आयोजन की शुरुआत में ही लिटिल इप्टा के साथियों ने इंकलाबी गीत से किया, जिससे सांस्कृतिक प्रस्तुतियां का स्वर तय हो गया। यह 8 जून को प्रतिरोध की कविता में सुनी रचनाओं तक लगातार कायम रहा। पहले दिन 6 जून को भोपाल लिटिल इप्टा के जनगीत के अलावा बिहार की गायन टीम की प्रस्तुति और मणिपुर के साथियों की संगीतमय प्रस्तुति के अलावा एक्स्टॉल कॉलेज के छात्रों के नृत्य ने माहौल को नई रंगत दी।
दिन में एक ओर जहां मुद्दा आधारित बातचीत में माहौल को गर्म रखा गया, तो वहीं देर शाम से शुरू हुए सांस्कृतिक सत्र ने देश की विविधता के चुनिंदा हिस्सों को सामने रखा। इनमें तमिलनाडु और बिहार के साथियों की ओर से नाटक की प्रस्तुति की गई, तो झारखंड के साथियों की ओर से गीत और गायन की प्रस्तुति की गई।
भोपाल के स्थानीय एक्सटॉल कॉलेज के छात्र—छात्राओं के नृत्य ने भी खास मनोरंजन किया। दिल्ली से आई पूर्वा भारद्वाज की एकल नाटिका ने कला की जरूरी जिम्मेदारी को बताया। महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के गीतों की प्रस्तुति के अलावा हरिणाया और उड़ीसा की टीमों की नाट्य प्रस्तुतियां भी इस आयोजन की खासियतों में शुमार रही हैं। इसके अलावा मशहूर गायिका नगीन तनवीर और नीलांजना के गायन ने खूब तालियां बटोरी।
8 जून की शाम में प्रतिरोध की कविताओं के जरिये वैज्ञानिक चेतना के माहौल को एक नई उंचाई मिली। इस कविता पाठ में सर्वश्री बाबूलाल दाहिया, शैलेंद्र शैली, प्रतिभा, आरती, उत्तर प्रदेश से मीरा गुप्ता, हिमाचल प्रदेश से जयनंद शर्मा, सचिन श्रीवास्तव, अरुणाभ सौरभ, प्रमोद गौरी, नेहल शाह, रोमा अधिकारी, पूजा सिंह, शुभा, संतोष शेंदकर, मुकेश यादव और सत्यम पांडे ने काव्य पाठ किया। मंच संचालन सत्यम पांडे ने किया।