Theatre: कोविड काल में रंगकर्मियों के हाथों से छूटा ‘रंग’

Year 2020
अब्दुल हक उर्फ अब्दुल्ला

(Theatre in Lockdown: कोविड काल बीते साल में सबसे अधिक इस्तेमाल हुए शब्दों में शामिल है। इस शब्द में छुपी तकलीफ को समाज के कई तबकों ने महसूस किया है। कई तकलीफें उठाई गईं, लेकिन कई हिस्से अछूते भी रहे। ऐसा ही एक समुदाय है रंगकर्मियों (Theatre artist) का। भोपाल में हिंदी रंगकर्मियों की स्थिति का आकलन करते हुए साथी अब्दुल हक ने रंगकर्मियों से बातचीत की। अब्दुल खुद भी रंगकर्म से गहराई से जुड़े हैं, सो इन बयानों की तासीर को उन्होंने शब्दों में ढालते हुए साफगोई भी बरती है। उन्होंने जानने की कोशिश की कि इस आपदा में वो खुद को अपने रंग कुनबे को किस जगह पाते हैं। इसमें रंगकर्म के साथियों ने अपनी तकलीफें तो साझा की हीं, उनके हल भी सुझाए। रंगकर्मियों की एसोसिएशन न होने का दुख भी कहा, तो रंगकर्म की सा​माजिक जिम्मेदारी पर भी खूब बात की। इन्हीं मुद्दों को छूती अब्दुल हक की रिपोर्ट…. – संविधान लाइव)

वसीम खान बताते हैं, “कोरोना महामारी से पहले मेरी आर्थिक स्थिति ठीक थी और मैं संस्कार वेल्ली स्कूल में ड्रामा टीचर था। मगर जब महामरी आई तो स्कूल प्रबंधन ने मुझे स्कूल से निकाल दिया उसके बाद से मेरी आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब हो गयी है। इसके पीछे बड़ी वजह है रंगकर्मियों की कोई आवाज नहीं होना। अगर रंगकर्मियों की कोई एसोसिएशन होती तो आज सरकार से बात कर रही होती।”

उन्होंने कहा कि रंगकर्मी की अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी होती है मगर कोरोना काल में रंगकर्मी इस हालत में हैं ही नही जो किसी की मदद कर पायें।

शिव कटारिया कहते हैं, “मैंने तो पहले भी कई बार इस बात को कहा है कि ये किसी भी समय नहीं माना गया कि रंगकर्मी का भी पेट होता है। हमने रंगकर्म को ग्रन्थ की श्रेणी में रखकर रंगकर्मी को मानव समाज से बेदखल करके उन्हें देवता बना दिया। ऐसा प्रतीत होता है कि रंगकर्मी किसी ऐसे ग्रह से आये हैं, जहां उनकी कोई ज़रूरत नहीं होती है। अब बात अभी की की जाये तो स्थिति पहले से ही अच्छी नहीं थी उसे और भी खराब कर दिया गया है। हम अनाथ हैं हमें ये भी नहीं पता कि हमें किस के सामने रोना है।”

उन्होंन कहा कि सामाजिक ज़िम्मेदारी होनी चाहिये वर्ना हमारा रंगकर्म सार्थक कैसे हो सकता है। जब तक हम दर्शकों के लिए रंगमंच कर रहे थे, तो हमारी आर्थिक ज़िम्मेदारी दर्शक के हाथ में थी। अब जब सरकारी अनुदान पर प्रायोजित रंगमंच होगा जो दर्शक के प्रति सामाजिक अवहेलना का काम किया जाएगा तो दर्शक भी उन्हें उनके हाल पर ही छोड़ेगा। हमें इस महामारी में अपनी समझ बनानी पड़ेगी जो दर्शक को लेकर सामाजिक जिम्मेदारियों का निर्वाह कराती रहे।

ऐश्वर्या तिवारी ने कहा, “रंगकर्म को कभी श्रम के तौर पर माना ही नहीं गया तो उसके लिए मानदेय कौन तय करेगा। उसने जब काम ही नहीं किया तो उसका मानदेय का सवाल ही नहीं पैदा हुआ। हमने अपने रंगगुरुओं से यही सीखा है कि रंगमंच में पैसा नहीं है। ये बात अलहदा है कि उन सारे रंगगुरुओं का रंगकर्म हमेशा ही पैसों से हुआ है, जिनके पास रिपर्टरी है, सरकारी अनुदान है, वो अनुदान के पैसों से नाटक कर रहे हैं, या फिर जिनके पास किसी दूसरे सोर्स से पैसा आ रहा है वो शौकिया रंगकर्म कर रहे हैं। अब जिनको सिर्फ रंगकर्म ही करना है, वो कहाँ जाएँ? मुझे तो लगता है रंगकर्म ही करना उनकी गलती है। उनके पास कुछ भी नहीं बचता है। दोनों किस्म के रंग संस्थानों ने सारी नैतिकता इन कमज़ोर रंगकर्मियों पर थोप रखी है। रंगकर्म में सबसे ज्यादा हालत खराब हिंदी रंगकर्मी की है, जो मानसिक तौर पर दबाव में अपनी जिंदगी जी रहे हैं, जो न ही व्यावसायिक स्तर पर काम कर रहा है, न ही सामाजिक स्तर पर ही काम कर पा रहा है। अगर जल्दी ही किसी ने रंगसं गठन की शुरुआत नहीं कि तो आने वाले समय में हम रंगकर्म को सिर्फ कागजों पर ही देखेंगे।”

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उन्होंन कहा कि मैं खुद कोविड पेशेंट रह चुकी हूं, और मेरा इलाज चिरायु में हुआ था, जिसका बिल एक लाख 50 हज़ार रुपये था, जो चिरायु प्रशासन को राज्य सरकार ने दिया, लेकिन कुछ भ्रामक स्तिथि पैदा हुई है, जिनके जवाब सरकार से मिलना ज़रूरी है। जनता डरी हुई है उसके लिए सरकारें ज़िम्मेदार हैं। मैं कह रही थी कि हम रंगकर्मी की हैसियत से बहुत काम कर सकते हैं, मगर हम अगर देखें तो सोशल मीडिया पर खासकर ऐसे वक़्त में रंगकर्मियों की ज़िम्मेदारी थी कि वो लोगों के बीच मानसिक दबाव नहीं बनने देते वो खुद ही इतने दबाव में आ गये कि अपना काम भूलकर डर को आगे बढ़ाने में लग गये। कोविड की दूसरी लहर में मेरा मानना ये है कि अगर हम रंगकर्मियों ने सोशल मीडिया पर अपना काम किया होता तो हालात इतने बुरे ना होते। अगर अभी भी ऐसी शुरुआत होती है तो हम जुड़कर काम करना पसंद करेंगे।

राजेश कुमार ने कहा, “रंगकर्मी के पहले भी खाने के लाले थे, आज भी है। बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे जो यह कह सकते हैं कि उनकी रोज़ी-रोटी रंगकर्म से चलती है। रंगकर्मी दोनों जगह मारा गया। उसे रंगमंच में पैसा नहीं मिलता है और फिल्म टेलीविज़न में काम। आखिर वो जाए तो जाए कहां।”

उन्होंने कहा कि सामाजिक ज़िम्मेदारी तो निभाई ही जा सकती है। हम कम से कम लोगों के पास जाकर दैहिक दूरी में लोगों को कोविड से आगाह कर सकते है। एक ढपली लेकर गीतों से लोगों के बीच सकारात्मक सन्देश तो दिया ही जा सकता है।

प्रियेश पाल कहते हैं, “अगर हम बात करें रंगकर्मी की तो वो बेहाल पहले भी था और अब भी है। उसके पास ऐसा कुछ भी नहीं था जो उससे कहीं लिया गया हो। मैं अभी मार्च में ही कोविड से जंग जीतकर बाहर आया हूं। अजीब विडम्बना है सारी नैतिकता की ज़िम्मेदारी तो सिर्फ और सिर्फ उन रंगकर्मियों ने ले रखी है जो किसी भी संस्था के मालिक नहीं हैं। हिंदी रंगमंच में आप जब तक भूखे रहकर काम कर सकते हैं तब तक सब आपको गले लगाएंगे, जिस दिन आपने ये तय कर लिया की मुझे मेरे हिस्से का पैसा चाहिए उस दिन आप रंगगुरुओं की आँख की किरकिरी बन जाएंगे और आपसे आपके हिस्से के पैसे वसूलने के लिए पुलिस भी आपके घर आ सकती है। मुझे लगता है जब तक तब रंगकर्मी संगठित नहीं होंगे उनका कोई भला नहीं कर सकता।”

उन्होंने कहा कि अगर हम अपने आपको रंगकर्मी कहते हैं तो हमारी ज़िम्मेदारी बनती है कि हम समाज को नयी दिशा दें। कोविड काल में समझ नहीं आया कि रंगकर्म से क्या किया जा सकता है, लेकिन इस दूसरी लहर में बात साफ़ साफ़ समझ आ रही है कि लोगों के बीच में मानसिक दबाव को कम करने का काम रंगमंच बखूबी कर सकता है।

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मुकेश पाचोरे ने कहा, “रंगकर्मियों की आर्थिक स्थिति अब और भी खराब हो गयी है। पिछले एक साल से सभागार खाली हैं। नाटकों का प्रदर्शन नहीं हो रहा है, जिसकी वजह से रंगकर्मियों को पैसा मिलता था वो पूरी तरह से बंद हो गया है। रंगकर्मियों के पास दूसरा काम नहीं है। भोपाल में हो रही शूटिंग में भी काम नहीं मिल पा रहा है। सरकार को चाहिये कि वो ऐसा फंड बनाये कि रंगकर्मियों का कोविड में जो नुक्सान हुआ है, उसका मूल्यांकन करके उन्हें कुछ राशि दी जाए।”

उन्होंने कहा कि सरकार अगर चाहे तो रंगकर्मियों का इस्तेमाल लोगों में जागरूकता के लिए कर सकती है। मुझे एक रंगकर्मी होने के नाते पूर्ण विश्वास है कि जो किसी की नहीं सुनता वो रंगकर्मियों की सुन लेता है।

रमेश अहीरे कहते हैं, “कोविड से पहले रंगकर्मी जैसे-तैसे अपना खर्च चला रहे थे। कोविड ने उन्हें तोड़ दिया। पिछले लॉकडाउन में आर्थिक रूप से कमज़ोर रंगकर्मियों की मदद की गई थी। उसके बाद धीरे-धीरे हालात सही हो रहे थे कि फिर अचानक हुए लॉकडाउन ने बुरी तरह से उन्हें तोड़ दिया है। अब तो उम्मीद भी ख़त्म होती जा रही है, इसलिए कुछ और काम ढूंढना शुरू कर दिया है। सरकार को चाहिए कि वो आर्थिक रूप से कमज़ोर रंगकर्मियों पर ध्यान दे।”

उन्होंने कहा कि रंगमंच ऐसी बहुत सारी गतिविधियों का माध्यम है जो हमारा मानसिक संतुलन स्थिर रखता है। अगर हम ज़ूम पर लाइव लोगों को जोड़कर म्यूजिक, छाउ डांस या एक्टिंग की एक्सरसाइज करेंगे तो लोगों को मानसिक तनाव से बाहर ला सकते हैं।

शिवांगी सिंह भदौरिया ने कहा, “रंगमंच में वही लोग अपनी कला का प्रदर्शन कर सकते हैं जिनके पास रोटी का इंतज़ाम पहले से है। अगर आपके पास रोटी का इंतज़ाम नहीं है तो रंगमंच में आप बहुत दिन ज़िंदा नहीं रह सकते। जब आप ज़िंदा नहीं हैं तो फिर किसी काम के नहीं हैं। मैं 2014 से निरंतर रंगकर्म कर रही हूं और मैंने शुरू में ही समझ लिया था कि अगर मुझे रंगकर्म में बहुत लंबा जाना है तो रोटी का इंतेज़ाम अलग से करना होगा। मैंने बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया था। पर कोविड के बाद बेरोजगारी बढ़ी है, तो रंगकर्म जिसे रोजगार माना ही नहीं गया तो उन रंगकर्मियों की हालत खराब होना लाज़िमी है। मुझे लगता है रंगकर्म को व्यवसायिक बनने से रोकने में सरकारी अनुदानकर्ता रंगकर्म ज़िम्मेदार है।”

अफ़सोस की बात ये है कि हमने एक रंगकर्मी होने ने नाते इस बात पर चर्चा क्यों नहीं की कि हम इस कोविड काल में बहुत बड़ी भूमिका अदा कर सकते थे, जिस तरह फ्रंटलाइन वर्कर लाभ कर रहे थे। रंगकर्मियों को घरों से बाहर निकलकर लोगों को कोविड के प्रति सचेत करने का काम हाथ में ले लेना चाहिये था। हम पुलिस के साथ किसी भी चेकपोस्ट पर लोगों को समझाने का काम बखूबी कर सकते थे। पूरे कोविड काल में दूध वाले ने अपना काम किया, सब्ज़ी वाले ने अपना काम किया, सामाजिक संस्थाओं के कार्यकर्ताओं ने अपना काम किया, एक हम रंगकर्मी ही घरों में बैठे रहे। उन्होंने कहा कि हम आगे कोशिश करेंगे कि रचनात्मक तरीके से हम कोविड में भी रंगसाथियों के साथ किसी किस्म की गतिविधियों को संचालित कर सकते हैं।