Covid Tales

Covid Tales: भोपाल के मैकेनिकों से लॉकडाउन ने छीनी दो वक़्त की रोटी, कर्ज़दार भी बना दिया

अब्दुल हक़ उर्फ अब्दुल्ला

Year 2020भोपाल शहर का मॉडल ग्राउंड जिसका हर माह करोड़ों का टर्न ओवर है, वो कोविड काल में अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है। इस बार तालाबंदी में ऑटोमोबाइल से लेकर मैकनिक के छोटे और बड़े दुकानदार दुकान का किराया भी क़र्ज़ लेकर दे रहे हैं।

मॉडल ग्राउंड भोपाल में टू व्हीलर और फोर व्हीलर का सबसे बड़ा हब है। अगर आपको गाड़ी में छोटा मोटा काम कराना हो या इंजन बनवाना हो या आपको अपनी गाड़ी मोडिफाई कराना हो तो उसके लिए एक ही जगह है, जहाँ आप सारे काम करा सकते है।

जान टू व्हीलर का काम करते हैं। उनकी 10 बाई 5 फुट की दूकान है। उसका किराया 5000 रुपये है। ऐसी ही एक दुकान में फैज़ान मोपेड का काम कर अपनी दो बेटियों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रहे हैं। उनकी बड़ी बेटी 10वीं में है और छोटी बेटी 8वीं क्लास में पढ़ रही है।

फैज़ान बताते हैं कि उस दुकान से वो हर महीने 5000 रुपये दुकान का किराया 1000 रुपये बिजली और 2000 रुपये लड़के के निकालने के बाद कम से कम 12000 रुपये हर माह घर ले जाते थे। कोरोना के चलते पूरे साल भर काम की हालत ऐसी खराब हुई कि अब 8000 रुपये बचा पाना दूभर हो रहा है। पिछली बार तीन महीने बंद दूकान का किराया दुकान मालिक ने और बिजली का बिल सरकार ने तो ले ही लिया था। इस बार और भी हालात खराब हैं। समझ नहीं आ रहा कि किराया कहां से दिया जाएगा। फैज़ान ग़मज़दा होकर कहते हैं कि किस्मत ही खराब है। हम अपने बच्चों को उनकी छोटी-छोटी खुशियां भी नहीं दे पा रहे हैं और उनकी पढ़ाई छूटने का डर सता रहा है।

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अफ़ज़ल का कहना है कि हम क्या कर सकते हैं। हमारे पास तो राशन कार्ड भी नहीं है कि कुछ गल्ला सरकार से मिल जाए। मैं कपिल ऑटो पार्ट्स पर काम करता हूं, वहां पर जो लड़के सिर्फ पार्ट्स की दुकान पर ही आम करते हैं, उन्हें महीने के 5000 रुपये मिलते हैं। बाकी हम चार लोग हैं, जिन्हें कोई मासिक वेतन नहीं मिलता है। दुकान पर जो भी काम आता है उसे कर कर हमारा काम चलता है। पूरे साल में मैंने सिर्फ पहले तीन महीने की तालाबंदी में कुछ नहीं किया। बाकी बचे महीनों में हर माह हमारे ऊपर तीन से 5 हज़ार तक का काम आया और अब त्योहार के समय काम बंद है। घर में तंगी की वजह से बेटे की पढ़ाई छूट गई है।

फोर व्हीलर का काम करने वाले सादिक बताते हैं कि उनकी दुकान 10 बाई 12 फुट की है। जगह कम होने पर हम एक बार में एक ही गाड़ी में काम कर पाते हैं। ज़्यादा काम आने पर हमारे पास आसपास कोई जगह नहीं है, जिसमें हम काम कर सकें। 6500 रुपये दुकान का किराया है और बिजली का बिल 1000 रुपये का। दो लड़के काम करते हैं, जिन्हें 1000 रुपये हफ्ता देता हूँ। आने-जाने वालों का चाय का खर्च निकालें तो 3000 रुपये महीने खर्च आता है। हमें हर माह 18 से 20 हज़ार रुपये कमाना ही है। इसके ऊपर की कमाई मेरी है जो दिन ब दिन घटती जा रही है, जिसकी वजह से काम करने वाले लड़कों को बाहर निकालना पड़ा है। जिस महीने कमाई नहीं आयी उस महीने से लोड बढ़ना शुरू हो जाता है। वैसे 2016 के बाद से ही हमारी हालत खराब हो चुकी थी, जो सेविंग थी वो धीरे-धीरे दुकान के नुकसान में ख़त्म हो रही है, बाकी कसर ये लॉकडाउन वाले मर्ज़ ने पूरी कर दी है।

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जब उनसे कहा गया कि सरकार ने जनता के भले के लिए ही लॉकडाउन लगाया है, तो उनका कहना है कि सरकार ये बताये कि कोरोना नाम की वबा से कितने दिनों में निपटा जा सकता है। या हर साल तीन महीने के लिए शहर को बंद रखा जाएगा। सरकार को जनता से मतलब नहीं है, उसे सिर्फ अपनी गद्दी दिखती है।

भैया भाई डेन्टर का कहना है कि उनको दुकान में वेल्डिंग मशीन, कंप्रेसर और दो पहिया वाहन में काम करने के लिए कम से कम पांच बाई तीन फिट की दुकान की ज़रूरत होती है। चार पहिया वाहन के लिए आठ बाई आठ की ज़रूरत होती है और बाकी मशीनरी मिला लेंगे तो कम से कम से कम 12 बाई 16 फिट की जगह चाहिए होती है। जगह के हिसाब से किराया 10 से 12 हज़ार होता है। एक दुपहिया वाहन में काम की क्वालिटी के ऊपर होता है 1800 रुपये से शुरू होकर 6000 तक मिलते हैं। एक गाड़ी में काम करने में तीन से पांच दिन लगते हैं और सामान 800 से लेकर 3500 रुपये तक होता है। तीन लोग काम करते हैं। अगर हम रोज़ का पकड़े तो 250 से 300 रुपये रोज़ ही आ पाते हैं। लॉक डाउन के बाद तो काम भी कम हो गया है। लोग दिखावे पर ज़्यादा नहीं जा रहे हैं। इसलिए काम कम ही आ रहा है।

अगर सरकार ने सही समय पर इस काम को उभारने के लिए क़दम नहीं उठाया तो आगे इनकी रोज़ी रोटी पर गहरा संकट आने वाला है।