Rapid Study

Rapid Study: कोरोना की दूसरी लहर का महिलाओं और बच्चों पर पड़ा सबसे बुरा असर

महज सात फीसदी बच्चे कर पा रहे आन लाइन क्लास: EKA Rapid Study
एका की कानूनी सहायता ईकाई परवाज ने किया कोरोना लॉकडाउन पर त्वरित अध्ययन
शहरी गरीबों पर किए गए अध्ययन के नतीजों में सामने आए कई चौंकाने वाले तथ्य

भोपाल। कोरोना के बाद बिना तैयारी के लगाए गए लॉकडाउन ने मध्यवर्ग की कमर तोड़ी और साथ ही निम्नवर्गीय परिवारों की जिंदगी पर भयानक असर डाला है। इस दौरान आर्थिक स्थिति बदहाल हुई है। इससे उनका जीवन स्तर बहुत नीचे चला गया है। कई परिवार कर्जदार हो गए हैं। इसके अलावा जो सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है, वह यह कि इन परिवारों को गरीबी और बदहाली की वजह से बिना इलाज अपने प्रियजनों को खोना पड़ा है। बच्चों को तमाम तरह की मानसिक समस्याओं से गुजरना पड़ा है। उनकी न सिर्फ पढ़ाई छूट गई है, बल्कि कई बार उन्हें प्रताड़ना भी झेलनी पड़ी है। यह तथ्य एका संस्था की कानूनी सहायता ईकाई परवाज के एक त्वरित अध्ययन में सामने आए हैं। ऑनलाइन पढ़ाई के बारे में परवाज के अध्यन में पता चला कि महज सात फीसदी बच्चे ही ऑनलाइन पढ़ाई कर पा रहे हैं। भोपाल के शहरी गरीब वर्ग पर आधारित इस अध्ययन की रिपोर्ट एका के फेसबुक पेज पर ऑनलाइन प्रोग्राम के दौरान पेश की गई।

इस शोध में सायरा खान, निगहत खान, अमरीन शेख, प्रदीप सिंह, रजनी, सीमा साल्वे, और अनीता ने करीब 45 बस्तियों में बातचीत की। इस दौरान 320 परिवारों के करीब 1600 सदस्यों पर कोरोना लॉकडाउन के असर का अध्ययन किया गया। समन्वय में अब्दुल हक ने सहयोग किया। इस अध्ययन के टूल बनाने, सवालों के चयन और जानकारी का विश्लेषण सीमा कुरुप और सचिन श्रीवास्तव ने किया है।

एका संस्था की सीमा कुरूप ने शोध रिपोर्ट को कोरोना के कारण बिछड़े अपने साथियों जोस शूल टी, अनिंदो बनर्जी, बीएल शर्मा और दविन्दर कौर उत्पल को स​मर्पित करते हुए बताया कि यह शोध 2 मई से 4 जून के बीच तब किया गया, जब जन प्रतिनिधि जमीन पर मौजूद नहीं थे और कोरोना की दूसरी पीक अपना असर दिखा रही थी। उन्होंने अध्ययन के उद्देश्यों पर विस्तार से बात रखते हुए कहा कि आगे इस अध्ययन के निष्कर्षों से सबक लेते हुए जमीनी कार्रवाइयों की जरूरत है।

शोध के निष्कर्षों और अपने अनुभवों को बताते हुए सायरा खान ने बताया कि उन्होंने जिन परिवारों से बात की उसमें महिलाओं और बच्चों के हालात बेहद खराब हैं। महिलाएं जहां राशन की किल्लत, घरेलू झगड़ों, मानसिक तनाव से गुजर रही हैं, तो बच्चों की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हुई है।

निगहत ने बताया कि राशन की पहुंच गरीब परिवारों तक बेहद सीमित रही और काम धंधे चौपट होने से परिवारों में तनाव है। लोगों ने अपने रोजगार भी बदले हैं। वहीं अमरीन शेख ने बताया कि परिवारों में कोरोना के अलावा अन्य बीमारियों से भी मुसीबत है। डॉक्टर्स के पास लोग कम जा रहे हैं और इलाज के लिए पैसों की कमी है इसलिए घरेलू उपचार और नुस्खों पर निर्भर हैं।

एडवोकेट प्रदीप सिंह से वैक्सिनेशन पर अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि ज्यादातर लोगों को वैक्सीन पर भरोसा नहीं है। अफवाहों के कारण लोग वैक्सीनेशन प्रक्रिया से दूरी बना रहे हैं।

संविधान लाइव के एडिटर सचिन श्रीवास्तव ने रिपोर्ट पेश करते हुए शोध बताया कि लॉकडाउन मेडिकल इमरजेंसी थी, लेकिन इसे एक बार फिर कानून व्यवस्था का सवाल बना दिया गया। पिछले लॉकडाउन के दौरान लोगों को राशन को लेकर हुई समस्या से सरकार ने कोई सबक नहीं लिया। इस बार भी लॉकडाउन के दौरान गरीब तबके के पास राशन नहीं पहुंच सका। लोग आसपास की राशन की दुकानों से सामान खरीद रहे थे तो उन दुकानदारों पर केस किया गया। सामान उठा लिया गया। पुलिस ने उन्हें प्रताड़ित किया। दुकानों को भी बंद करा दिया गया। सरकार ने राशन के बारे में कई एलान किया, लेकिन वह जमीन पर कहीं नहीं दिखा।

उन्होंने शोध के नतीजों के बारे में बताते हुए कहा कि लॉकडाउन में सबसे ज्यादा बुरा प्रभाव बच्चों और महिलाओं पर पड़ा है। अगर इस बारे में फौरी तौर पर कोई मदद नहीं मुहैया कराई गई तो महिलाओं को बच्चों को मानसिक बीमारियां घेर लेंगी।

क्यों किया गया अध्ययन
रिपोर्ट साझा करते हुए सीमा कुरुप ने बताया कि एका की कानूनी सहायता इकाई परवाज और काउंसलिंग टीम ने लॉकडाउन के दौरान शहरी गरीब समुदाय के सामने आने वाली महत्वपूर्ण चुनौतियों के बारे में यह अध्ययन किया है। इस अध्ययन में खाद्य सुरक्षा, आजीविका, कोविड एवं गैर कोविड स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, मानसिक स्वास्थ्य, आवागमन, बच्चों की शिक्षा, बच्चों को होने वाली परेशानियां, कोविड टेस्टिंग, ट्रीटमेंट और टीकाकरण, कोविड मैनेजमेंट, सामुदायिक स्वस्थ्य मैनेजमेंट, परिवार की आर्थिक स्थिति, पोषण और कोविड लॉकडाउन के प्रति नागरिकों की सोच जैसे बिंदु शामिल किए गए थे।

अध्ययन के महत्वपूर्ण निष्कर्ष
अध्ययन में पता चला कि लोगों के सामने सबसे बड़ा संकट आर्थिक है। 115 परिवारों ने सीधे तौर पर काम की जरूरत और आर्थिक परेशानी को सबसे बड़ी और पहली समस्या बताया। अन्य परिवारों ने भी आर्थिक दिक्कतों का जिक्र किया। ज्यादातर परिवार लॉकडाउन और कर्फ्यू के पूरी तरह खुलने का इंतजार कर रहे हैं, ताकि वे अपने परिवार के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम कर सकें।

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314 परिवारों ने अपनी आजीविका के साधनों के बारे में जानकारी दी है। इनमें से 67 या 21.3% परिवार अपना स्वयं का बिजनेस करते हैं। 59 परिवार यानी 18.8% किसी प्राइवेट या सरकारी संस्था में नौकरी करते हैं। 120 परिवारों यानी 38.2% की आजीविका दिहाड़ी पर निर्भर है। वहीं 68 परिवारों यानी 21.7 फीसदी परिवार अन्य स्रोतों पर निर्भर हैं। छह परिवारों ने अपनी आजीविका के बारे में जानकारी नहीं दी।

तालाबंदी यानी लॉकडाउन के बारे में 90 फीसदी से अधिक उत्तरदाताओं ने कहा कि इससे काफी परेशानी हुई है। यह परेशानियां छह बिंदुओं पर सबसे ज्यादा हैं। पहली काम धंधे पर असर और आर्थिक स्थिति खराब हुई है। दूसरी आवागमन प्रभावित हुआ है। तीसरी समस्या के बारे में लोगों ने कहा कि खाद्य सुरक्षा प्रभावित हुई है। इसके अलावा स्कूल बंद होने से पढ़ाई प्रभावित हुई है। कोविड और गैर कोविड स्वास्थ्य की दिक्कतें भी लोगों को हुई हैं। लोगों के पास सही और आधिकारिक सूचना का अभाव है।

एक अन्य परिवार ने कहा कि लॉकडाउन नहीं होना चाहिए था, क्योंकि रोज़ खाने कमाने वालों को इससे परेशानी होती है और गरीबों पर इसका ज़्यादा प्रभाव पड़ता है। एक व्यक्ति ने बताया, “लॉकडाउन लगने से घर में राशन की दिक्कत और कर्ज़ा भी हो गया है। घर चलाने में काफी परेशानी हो रही है। लगभग ऐसी ही बातें अन्य उत्तरदाताओं ने कहीं।”

शोध में महिलाओं की स्थितियों के बारे में भी पता चला। शहरी गरीब परिवारों में महिलाओं की स्थिति बेहद खराब है। घर चलाने की जिम्मेदारी महिलाओं पर ही होती है और राशन की किल्लत और आमदनी में कमी के कारण उनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ा है। बातचीत में कई महिलाओं ने बताया कि घर में झगड़े बढ़ गए हैं और मारपीट आम हो गई है। कई जगह गर्भवती महिलाओं को आंगनबाड़ी बंद होने के कारण पोषण आहार नहीं मिला है।

महिलाओं का कहना था कि घर में राशन की काफी कमी है ओर आसपास का जो माहौल है उस वजह से भी राशन से जुड़ी बहुत दिक्कतें हैं। काम की खराब स्थिति, घर की आर्थिक स्थिति, किराए, खाने की परेशानी, मानसिक तनाव, मौत से सदमा, पुरुषों की टिप्पणी, बीमारी की टेंशन का महिलाओं ने बार बार जिक्र किया।

इसके अलावा लॉकडाउन और कर्फ्यू में किराने के सामान की कमी से सबसे ज्यादा लोग प्रभावित हुए। कुल 318 लोगों में से 85 यानी कुल संख्या के 26.7 फीसदी ने किराना शॉप की कमी बताई। इसी तरह 42 परिवारों ने अस्पतालों में अटेंडेंट की कमी की परेशानी बताई। 24 परिवारों ने सब्जी और फल के ठेले न चलने की कमी को सबसे बड़ी परेशानी बताया। इसके अलावा सफाई कर्मचारी, नर्स, गुटखा व अन्य परेशानियों के बारे में जिक्र किया गया।

लॉकडाउन की वजह से लोगों की कमाई पर भी असर पड़ा है। 73.1 फीसदी यानी 234 परिवारों ने बताया कि लॉकडाउन के कारण उनकी कमाई पूरी तरह खत्म हो गई है। वहीं 16 परिवारों के मुताबिक उनकी कमाई 70 प्रतिशत रह गई है। 13 परिवारों ने कमाई 50 फीसदी और 45 परिवारों ने कमाई 30 प्रतिशत कम होने का दावा किया। कुल 320 परिवारों में से 12 यानी कुल 3.7 फीसदी ने कहा कि लॉकडाउन से उनकी कमाई पर कोई असर नहीं पड़ा है। वह पूर्व की भांति स्थिर हैं।

यह सर्वे जिन परिवारों के बीच किया गया उनकी मासिक कमाई 6000 रुपये से 14000 रुपये है। सर्वे में शामिल परिवारों में से लॉकडाउन के पहले 145 की तय मासिक आमदनी थी जबकि 165 परिवार दिहाड़ी मिलने और धंधे में बिक्री पर निर्भर थे।

सर्वे में शामिल परिवारों में से 64.8 % यानी 206 परिवारों ने बताया कि उनके परिवार में एक ही कमाने वाला सदस्य है। 18 परिवारों यानी 5.66 फीसदी में कोई भी सदस्य कमाता नहीं है। इन परिवारों का गुजर बसर पड़ोसियों, रिश्तेदारों या भीख मांगकर हो रहा है। 64 परिवारों यानी कुल संख्या का 20.13 प्रतिशत में दो सदस्य पैसा कमाते हैं। ऐसे परिवारों की संख्या 19 यानी 5.97 फीसदी है, जहां कमाने वाले सदस्यों की संख्या तीन है।

इसी तरह छह परिवारों में चार, दो परिवारों में पांच और तीन परिवारों में कमाने वाले छह सदस्य हैं। 238 परिवारों यानी 81.8 प्रतिशत के सदस्यों ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें वेतन नहीं मिल रहा है, जबकि 53 उत्तरदाताओं यानी कुल का 18.2 फीसदी ने बताया कि वेतन मिल रहा है। 54 परिवारों यानी 17.3 फीसदी ने बताया कि लॉकडाउन के दौरान पहले की तरह काम जारी है, जबकि 260 परिवारों (83.3 प्रतिशत) का कहना है कि इस दौरान काम नहीं है।

उत्तरदाता परिवारों में से 17.6 फीसदी परिवार राशन पर मासिक तौर पर तीन हजार रुपये से कम खर्च करते हैं। इसमें से भी 12 परिवार (3.8%) एक से दो हजार रुपये, 20 परिवार (6.3 %), दो से ढाई हजार रुपये और 25 परिवार (7.9 %) अपने राशन पर ढाई से तीन हजार रुपये खर्च करते हैं। तीन हजार से अधिक खर्च करने वाले परिवारों की संख्या 262 (82.4 %) है।

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280 परिवारों में से 275 परिवारों (98 %) ने कहा कि उन्हें आंगनबाड़ी से किसी तरह का कोई राशन नहीं मिला है। जबकि एक परिवार ने दो पैकेट और एक ने 25 पैकेट मिलने का दावा किया। एक परिवार आंगनबाडी गया ही नहीं, जबकि एक उत्तरदाता ने कहा कि उनके पास राशनकार्ड नहीं है। वहीं एक जवाब मिला कि आंगनबाडी बंद है।

290 उत्तरदाताओं में से 44.1 फीसदी यानी 128 परिवारों ने कहा कि उन्हें राशन नहीं मिला है, जबकि 55.9% यानी 162 परिवारों ने बताया कि उन्हें राशन मिला है। इनमें से 92 परिवारों को एक महीने का, 65 परिवारों को दो माह का और पांच परिवारों को तीन महीने का राशन मिला है। कुल 320 परिवारों में से 83 (26 %) परिवारों ने बताया कि उनके पास किसी तरह का कोई राशन कार्ड नहीं है। राशन कार्ड धारी 237 परिवारों में से 89.5% यानी 212 परिवारों के पास बीपीएल राशनकार्ड है, जबकि 25 परिवार (10.5 %) ने बताया कि उनके पास सामान्य राशन कार्ड है।

191 परिवार (59.9%) के पास स्वयं का मकान है। इनमें पक्के, कच्चे घर, झोपड़ियां और साझा घर शामिल हैं। 112 (35 %) परिवार किराये के मकान में रहते हैं। अन्य 17 परिवार बेघर हैं या कब्जे की जमीन पर रहते हैं।

सर्वे में शामिल 274 परिवारों में से घर के किसी सदस्य को वैक्सीन नहीं लगी है। 23 परिवारों में घर के कम से कम एक सदस्य को वैक्सीन लगी है, जबकि 13 परिवारों में दो सदस्य और 7 परिवारों में तीन सदस्य वैक्सीनेशन करा चुके हैं। एक परिवार में चार और एक में सात सदस्यों ने वैक्सीन लगवाई है।

98.4% परिवारों ने कहा कि अब तक उनके परिवार में एक भी व्यक्ति कोविड संक्रमित नहीं हुआ है। वहीं पांच परिवारों ने कहा कि उनके परिवार में कम से कम एक व्यक्ति कोविड संक्रमित हो चुका है। वहीं 18 परिवारों ने कहा कि उनके घर में कम से कम एक व्यक्ति की कोविड से मौत हुई है। 78 लोगों ने कहा कि उनकी जान पहचान के लोगों में कोविड से मौत हुई है।

इन 78 उत्तरदाताओं ने कुल 370 से अधिक कोविड मौत का उल्लेख किया। इस तरह करीब 4.7 मौत की जानकारी हर उत्तरदाता को है। खासकर जानकी नगर, चूना भट्टी, पीर गेट, रातिबड़, बरखेड़ी, कोलार, लालघाटी ऐसे इलाके हैं, जहां लोगों ने अपनी जानकारी में 15 से 50 मौतों तक का जिक्र किया।

91 फीसदी यानी 289 परिवारों ने बताया कि उनके घर में किसी को कोई गैर कोविड बीमारी नहीं है। 9 फीसदी यानी 29 परिवारों ने बताया कि उनके घर में किसी न किसी सदस्य को कोविड के अलावा अन्य बीमारी है। मुख्य तौर पर परिवार जिन बीमारियों से जूझ रहे हैं, उनमें मिर्गी, डाइबिटीज, अस्थमा, सांस लेने में तकलीफ, हाई ब्लड प्रेशर, बुखार, लो ब्लड प्रेशर, स्किन इन्फेक्शन, टीबी, किडनी स्टोन पथरी, एलर्जी आदि शामिल हैं।

शोध करने वाली टीम ने भोपाल की 45 बस्तियों के लोगों से बातचीत की। 4 मई से 2 जून 2021 के बीच की गई स्टडी में 320 परिवारों के करीब 1700 सदस्यों की जानकारी एकत्र की गई। शोध से पता चला कि कुल संख्या में से 1.3 परिवारों को डॉक्टर की सलाह की जरूरत है, लेकिन उन्हें यह उपलब्ध नहीं है। 20.3% यानी 65 परिवारों को गैर कोविड स्वास्थ्य संबंधी जानकारी की जरूरत थी। सर्वे में शामिल दो फीसदी यानी 6 परिवारों में गर्भवती महिलाएं थीं।

इस शोध में बच्चों की स्थितियों को भी रखा गया था। अध्ययन में परिवार के बच्चों की स्थिति के बारे में कई तथ्य सामने आए। सबसे ज्यादा तो परिवार के सदस्यों ने बच्चों के भीतर डर के माहौल पर बात की। लोगों ने बताया कि बच्चे घर में ही टाइम बिता रहे हैं और लॉकडाउन खुलने के बाद भी बच्चों के लिए बहुत ज्यादा अवसर बाहर जाने के लिए नहीं मिले हैं, इसलिए वे चिड़चिड़े हो गए हैं। मोबाइल, टीवी देखकर ही वे अपना समय बिता रहे हैं।

बातचीत में कई परिवारों ने बताया कि कई बच्चे दोस्तों से न मिल पाने के कारण परेशान हैं। छोटे बच्चों के पोषण आहार का जिक्र भी लोगों ने बार-बार किया। एक व्यक्ति ने बताया कि बच्चों को बाहर जाने और खेलने से रोका जा रहा है, क्योंकि आस पास में काफी कोरोना मरीजों की मौत हुई है। रोकने पर बच्चे गुस्सा करते हैं। वह सवाल भी करते हैं कि क्या है कोरोना? हमको बाहर क्यों नहीं जाना है? एक परिवार के सदस्य ने कहा कि लाकडाउन से डर का माहौल है। बच्चों की मानसिक स्थिति बहुत ख़राब है उनके अंदर चिड़चिड़ापन आ गया है।

आनलाइन क्लास के बारे में 264 (90.7%) परिवारों ने बताया कि आनलाइन क्लास नहीं होती है, जबकि 20 (6.9%) परिवारों ने बताया कि आनलाइन क्लास होती है। दो परिवारों ने कहा कि क्लास होती है, लेकिन बच्चे नहीं करते हैं, जबकि सात परिवारों का कहना था कि मोबाइल और डाटा नहीं होने के कारण बच्चे आनलाइन क्लास नहीं कर पाते हैं।