Literary Naxalite: गुजरात साहित्य अकादमी ने विकसित की नक्सलियों की नई कैटेगरी ‘साहित्यिक नक्सल’!

केंद्र की आलोचना पर कविता और ऐसे कवियों को अकादमी ने बताया लिटरेरी नक्सल (Literary Naxalite)

साहित्य का काम अपने समय की विसंगतियों को सामने लाना है और समाज को वह आईना भी दिखाता है। इस बिंदु पर वामपंथी साहित्यकार लगातार लिखते रहे हैं और दक्षिणपंथी साहित्यकार आमतौर पर साहित्य को राजनीति से दूर रखने की बात करते रहे हैं। साथ ही दक्षिणपंथी साहित्यकार कलात्मक आड़ में यथास्थिति के पोषक भी रहे हैं। सरकार की गोद में बैठने का जतन करने वाले दक्षिणपंथी साहित्यकारों ने अब इससे एक कदम आगे निकलते हुए सामाजिक राजनीतिक विद्रुप्ताओं को सामने लाने वाले साहित्यकारों के लिए एक नया शब्द भी गढ़ दिया है। गुजरात की साहित्य अकादमी ने इस नए शब्द की खोज की है और यह शब्द है लिटरेरी नक्सल यानी साहित्यिक नक्सल।

दिलचस्प यह है कि साहित्य और राजनीति को अलग अलग रखने की सलाह देने वाले दक्षिणपंथी साहित्यकार इस मामले में राजनीति का पक्ष ले रहे हैं और उन्हें इस बात की चिंता है कि इस ​कविता से भाजपा, संघ और केंद्र सरकार की छवि खराब हो रही है। यानी अब साहित्य अकादमी की चिंताओं में मनुष्यता, देश की जनता, देश की जनता के दुख नहीं बल्कि केंद्र सरकार की नीतियां, भाजपा और संघ परिवार है।

क्या है मामला
गुजरात साहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका ‘शब्दश्रुष्टि’ में प्रकाशित संपादकीय में इस शब्द का जिक्र किया गया है। पत्रिका के जून अंक में अकादमी के चेयरमैन ने गुजराती कवयित्री पारुल खख्खर एक कविता को आड़े हाथों लेते हुए यह शब्द दिया है। पिछले दिनों कोरोना की दूसरी लहर के दौरान उत्‍तर प्रदेश और बिहार के कई इलाकों में गंगा नदी में शव फेंके गए और उन्हें उसके बाद उनका कई गंगा घाटों पर स्थानीय नागरिकों ने अंतिम संस्कार किया। इस घटना को लेकर कवियित्री पारुल खख्खर ने एक कविता लिखी। इसी कविता की गुजरात साहित्‍य अकादमी ने अपने जून संस्‍करण के संपादकीय में आलोचना की है। इसे अराजकता कहा गया है। अकादमी की ओर से यह भी कहा गया है कि जिन लोगों ने इस कविता पर चर्चा की और इसे प्रसारित किया वे ‘साहित्‍यिक नक्‍सल’ हैं।

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11 मई को पोस्ट की थी पारुल ने कविता
पारुल की गंगा में शव विषयक कविता को काफी पसंद किया गया था। पारुल ने 11 मई को अपने फेसबुक पेज पर यह कविता पोस्ट की थी। तब से इसका हिंदी और अंग्रेजी सहित कम से कम छह भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। कविता में कोरोना की दूसरी लहर के दौरान भारी संख्या में हुई मौतों के बारे में चर्चा की गई है। इससे श्मशान घाट पर शवों के दाह संस्कार के लिए लोड बढ़ गया था। 14-पंक्तियों वाला व्यंग्य देश को “राम राज्य” के रूप में संदर्भित करता है। यह उन हजारों शवों के संदर्भ में है, जो कोविड मामलों की दूसरी लहर के दौरान उत्तर प्रदेश, बिहार के जिलों में गंगा नदी के किनारे तैरते या दफन पाए गए थे।

केंद्र की राष्ट्रवादी नीतियों की विरोधी कविता
संपादकीय में ऐसे लोगों को ‘साहित्यिक नक्सल’ करार देते हुए इनको ‘केन्द्र की राष्ट्रवादी’ नीतियों का विरोधी बताया गया है।

संपादकीय के मुताबिक, इस कविता के बहाने वामपंथी और लिबरल तबका भारत में ‘अशांति’ और ‘अराजकता’ फैलाना चाहता है। साथ ही इस कविता को बेकार दमहीन और सिर्फ गुस्से और कुंठा की अभिव्यक्त बताया गया है।

संपादकीय में कहा गया है कि लिबरल द्वारा इसका इस्तेमाल संघ और भाजपा विरोध के लिए किया जा रहा है। इससे सामाजिक विघटन को बढ़ावा मिल रहा है।

साथ ही संपादकीय में बताया गया है कि अकादमी ने खाखर की पिछली रचनाओं को प्रकाशित किया था और अगर भविष्य में उन्होंने कुछ अच्छी रचनाएं लिखीं तो गुजराती पाठकों द्वारा उनका स्वागत किया जाएगा।

कविता को ‘आंदोलन की स्थिति में व्यक्त व्यर्थ क्रोध’ करार देते हुए संपादकीय में कहा गया है, ‘शब्दों का उन ताकतों द्वारा दुरुपयोग किया गया था जो केंद्र विरोधी और केंद्र की राष्ट्रवादी विचारधारा के विरोधी हैं। उक्त कविता का इस्तेमाल ऐसे तत्वों द्वारा कंधे से कंधा मिलाकर किया गया है, जिन्होंने एक साजिश शुरू की है, जिनकी प्रतिबद्धता भारत के लिए नहीं बल्कि कुछ और है, जो वामपंथी, तथाकथित उदारवादी हैं, जिनकी ओर कोई ध्यान नहीं देता है। ऐसे लोग भारत में जल्दी से अराजकता फैलाना चाहते हैं। वे सभी मोर्चों पर सक्रिय हैं और इसी तरह वे गंदे इरादों से साहित्य में कूद गए हैं।’

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संपादकीय में यह भी कहा गया है, ‘इन साहित्यिक नक्सलियों का उद्देश्य उन लोगों के एक वर्ग को प्रभावित करना है जो अपने दुख और खुशी को इससे (कविता) जोड़ेंगे।’

तीखी प्रतिक्रियाएं
इस संपादकीय और लिटरेरी नक्सल शब्द पर तीखी प्रतिक्रियाएं आना शुरू हो गया है। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार वीरेंद्र यादव ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा हैं— कुल चौदह पंक्तियों की यह कविता यदि सचमुच इतना सब कुछ कर सकती है तो कविता की शक्ति से कौन इंकार कर सकता है। सत्ता तंत्र का कविता से यह डर साहित्य की शक्ति का परिचायक है। जरूरत है मुक्तिबोध के शब्दों में ‘अभिव्यक्ति के खतरे उठाने की!’

अकादमी के अध्यक्ष ने की पुष्टि
Literary Naxaliteगुजरात साहित्‍य अकादमी के अध्यक्ष विष्णु पांड्या ने संपादकीय लिखने की पुष्टि की है। हालांकि इसमें विशेष रूप से शव वाहिनी गंगा का उल्लेख नहीं है। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि उनका मतलब उस कविता से है, जिसकी काफी प्रशंसा हुई है और कई भाषाओं में उसका अनुवाद किया गया है।

पांड्या ने अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस को दिए गए बयान में कहा है कि “इस कविता (शव वाहिनी गंगा) में काव्य का कोई सार नहीं है। न ही यह कविता को कलमबद्ध करने का उचित तरीका है। यह केवल किसी के गुस्से या हताशा को बाहर निकालने के लिए हो सकता है। इसका उदारवादी, मोदी विरोधी, भाजपा विरोधी और संघ विरोधी (आरएसएस) तत्वों द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है। साथ ही पांड्या ने कहा कि खख्खर के खिलाफ उनका कोई “व्यक्तिगत द्वेष” नहीं है।

इस मामल में अभी तक पारुल खख्खर की कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।