Protest

Protest: सद्भाव, अमन और भाईचारे की अपील उर्फ चंद चेहरों को ताकते गांधी

सचिन श्रीवास्तव
भोपाल।
नए साल के शुरुआती जोशो खरोश और उम्मीदों के बीच हम सभी जानते हैं कि यह साल ऐसा कोई खास चमत्कार नहीं करने वाला है, जो बीते दो—पांच साल अपनी बदकिस्मती और मजबूरी के बीच नहीं कर सके हैं। इसकी बानगी 3 जनवरी को भोपाल में गांधी भवन स्थित गांधी प्रतिमा के समक्ष दिए गए एक जरूरी धरने में भी दिखाई दी।

पहले इस धरने के बारे में चंद जानकारियां।
वजह: धरने की वजह थी साम्प्रदायिक, कट्टर पंथी, प्रतिगामी ताकतों द्वारा महात्मा गांधी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियां और तथाकथित धार्मिक आयोजनों में अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफ़रत फैलाने वाला भ्रामक दुष्प्रचार।
आयोजक: राष्ट्रीय सेक्युलर मंच, गांधी भवन और भोपाल की प्रगतिशील, जनवादी, धर्म निरपेक्ष संस्थाओं ने संयुक्त तौर पर इस धरने की अपील की थी।
क्या हुआ: इस मौके पर आम जनता से सदभाव, अमन और भाईचारा कायम रखने की अपील की गई।
कौन थे शामिल: महात्मा गांधी की प्रतिमा के समक्ष आयोजित इस धरने की अध्यक्षता गांधी भवन न्यास के सचिव श्री दयाराम नामदेव ने की। राष्ट्रीय सेक्युलर मंच के संयोजक श्री लज्जा शंकर हरदेनिया ने विषय प्रवर्तन कर सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने संबंधी प्रस्ताव प्रस्तुत किया। धरने का संचालन और आभार प्रदर्शन प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश महासचिव शैलेन्द्र शैली ने किया। धरने में उत्तराखंड के पूर्व राज्यपाल श्री अजीज कुरैशी विशेष रूप से शामिल हुए।
संबोधन और गायन: मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता बादल सरोज, हाजी हारून साहब, अली अब्बास उम्मीद, रूप सिंह चौहान, आशा मिश्रा, मनोज कुलकर्णी, जावेद अनीस, पूर्णेंदु शुक्ल, चंद्र कांत नायडू, अनीस भाई और माधुरी ने धरने को संबोधित किया। नीना शर्मा ने फैज अहमद फैज की क्रांतिकारी रचना सुनाई।

यह सारी जानकारियां हमें आयोजक साथियों की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति से हासिल हुईं हैं। इसी क्रम में प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है कि धरने में आयोजक संस्थाओं के सदस्य “बड़ी संख्या” में सम्मिलित हुए।

आयोजक संस्थाओं यानी राष्ट्रीय सेक्युलर मंच, प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ, न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव, भारत ज्ञान विज्ञान समिति, गांधी भवन न्यास के अलावा आल इंडिया डेमोक्रेटिक वुमन एसोसिएशन, भारतीय किसान सभा, आल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस आदि की मौजूदगी भी धरने में रही।

अब मूल बात।
असल में यह धरना बताता है कि आने वाला साल कैसा होने वाला है। भोपाल ही नहीं बल्कि देश में सांप्रदायिक राजनीति के खिलाफ बीते 3 दशकों की कुछ सबसे मजबूत आवाजों में से एक वरिष्ठ पत्रकार लज्जा शंकर हरदेनिया जी की आवाज है। वे अपने लेखों के साथ जमीन पर भी धरनों, प्रदर्शर्नों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। 90 की उम्र में भी उनकी सक्रियता और सांप्रदायिक, नफरती राजनीति के खिलाफ उनकी प्रतिबद्धता को सलाम करने के अलावा और क्या किया जा सकता है? कुछ नहीं क्या?

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उनकी आवाज को मजबूत तो किया ही जा सकता है। उनके साथ खड़ा हुआ जा सकता है? लेकिन भोपाल में तो कम अज कम ऐसा नहीं हो रहा है। दिलचस्प है कि उपर जो नाम लिखे हैं, उनके अलावा चार—पांच साथी और थे, जिनमें भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नबाबउद्दीन, मुन्ने खां आदि शामिल हैं। यानी कुल मिलाकर दो दर्जन भी नहीं। हालांकि जो साथी मौजूद थे, वो जिनसे जुड़े हैं उन संगठनों के नाम भी लिखें तो करीब 50 से ज्यादा संगठनों में इनकी कम से कम राज्य स्तरीय भूमिका है।

इसके बावजूद लोकतंत्र और संविधान को बचाने की इनकी अपील का असर, बेहद सीमित और अपने आसपास के चंद साथियों में ही होता है, और बाज मौकों पर तो वह भी नहीं।

इसकी कुछ खास वजहें हैं।

  • जैसे सांप्रदायिकता के खिलाफ बीते तीन दशक में इन साथियों ने खूब तेज लड़ाई लड़ी है, लेकिन कम होने के बजाय सांप्रदायिकता का असर राजनीति और समाज में बढ़ता ही गया है।
    जैसे पूंजीवाद और ग्लोबलाइजेशन के खिलाफ इन प्रतिबद्ध साथियों ने बेहद जरूरी और मानीखेज विरोध किया है, लेकिन हालात यह हैं कि आज पूंजीवाद और धार्मिक कट्टरता ने मिलकर ग्लोबलाइजेशन को औजार बनाते हुए सत्ता पर पूरा नियंत्रण कायम कर लिया है और लोकतंत्र व संविधान को ताक पर रख दिया है।
    जैसे प्रतिरोध की संस्कृति और प्रगतिशील, जनवादी मूल्यों के लिए इन साथियों ने बीते तीन—चार दशक में खूब आयोजन किए, सेमिनार, रैलियां, गोष्ठियां की। नाटक किए, लेकिन हालात यह हैं कि आज प्रगतिशील और जनवादी मूल्यों के प्रति समर्पित साथियों की संख्या हर शहर में उंगलियों पर गिनी जा सकने लायक हो गई है।
    जैसे इन साथियों ने शिक्षा के वैज्ञानिक आधार को जीवंत बनाए रखने के लिए अपनी उम्र खपा दी, लेकिन देश में अंधविश्वास और कूपमंडूकता दिन ब दिन अपनी जड़ें गहरी करते जा रहे हैं।
    जैसे दलित अधिकार….
    जैसे अल्पसंख्यक अधिकार….
    जैसे महिला के लिए बराबरी का समाज….
  • ऐसे कई जैसे हैं, जिनके लिए साथियों ने उम्र स्वाहा कर दी, लेकिन हालात जो पहले थे, उससे बदतर ही हुए हैं।

दिलचस्प यह है कि उसके बावजूद अपने औजारों को परखने, अपनी रणनीति को टटोलने, अपने संवाद की तकनीक को बदलने की जिद इन साथियों में नहीं दिखती है। इनकी प्रतिबद्धता और बेहतर दुनिया के प्रति इनकी कोशिशों पर किसी को न कल शक था, न आज है। लेकिन कल यह कोई बड़ा बदलाव लाएंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

यह तो है पहली वजह। यानी ये साथी खुद। इनकी रणनीतियां पुरानी पड़ चुकी हैं और इनकी आवाज धीमी होती जा रही है।

दूसरी वजह है इस शहर के वे चंद चेहरे, जो सोशल मीडिया पर हाय तौबा तो करेंगे, लेकिन जमीन पर जब आने की बात होगी, तो अपने अपने दायरे में कैद हो जाएंगे। अपनी एक दिन पहले ही ओबीसी आरक्षण के सवाल पर भीम आर्मी के राष्ट्रीय नेतृत्वकर्ता जब शहर में दााखिल होने की कोशिश कर रहे थे, तो कई आवाजें चुप थीं। सामान्य राजनीतिक समझदारी के तहत किसी ने इस पर बयान देना तक जरूरी नहीं समझा। वो युवा जो शहर के कल्चर, राजनीति और अधिकार आधारित कामों में संलग्न हैं, वह भी जरूरी राजनीतिक सवालों पर चुप्पी साधे रहते हैं। उन्हें धरना, प्रदर्शन विरोध की ताकत का न तो अंदाजा है और न ही उसकी कीमत उन्हें पता है। चंद युवा तो ऐसे हैं जो धरने को मिलने जुलने का एक ​अवसर मानते हैं।

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तीसरी वजह जरूरी आंखों का मोतियाबिंद है। शिक्षा के सवाल पर कार्यरत साथियों को लगता है कि यही जरूरी मसला है, ​बाकी सब गौड़ हैं। जैसे अल्पसंख्यक साथियों को लगता है कि उनका सवाल ही सबसे जरूरी सवाल है, बाकी सारे मसले बौने हैं। इसकी एक मिसाल सीएए—एनआरसी आंदोलन और किसान आंदोलन के बीच की दूरी है। इस पर कई बार बात भी हुई है। सीएए—एनआरसी में आंदोलनरत साथियों में कई ने किसान आंदोलन पर एक शब्द भी कहना जरूरी नहीं समझा। इसके लिए जमीन पर उतरने की तो बात ही अलग है।

एक और वजह है, आलोचना। एक दूसरे की आलोचना। कई नव क्रांतिकारी साथियों को लगता है कि उनकी लाइन, उनकी सोच ही सबसे बेहतर, सबसे सही, सबसे क्रांतिकारी है, जबकि बाकी सभी संशोधनवादी हैं। नव क्रांतिकारियों के साथ एक सुविधा ये होती है कि उनका कोई इतिहास नहीं होता है, इसलिए उन्हें उनके काम के आधार पर आलोचना का सामना नहीं करना पड़ता है, जबकि दूसरे सभी समूहों, व्यक्तियों, संगठनों की आलोचना के लिए उनके पास पर्याप्त आधार होते हैं।

और भी वजहें हैं, लेकिन फिलहाल इतना ही… बाकी पर बात करेंगे जल्द।

बात शुरू हुई थी गांधी प्रतिमा के सामने धरने से। तो गांधी जी जब अपने छोटी छोटी आंखों से ताकते होंगे और देखते होंगे कि बीते 4 दशक से बस यही चेहरे सामने आ रहे हैं, तो शायद खुद को भी टटोलते होंगे कि संविधान में विरोध प्रदर्शन के अधिकार को आखिर इस देश ने समझा क्यों नहीं? लोकतां​त्रिक आवाजों को बुलंद करने की कार्रवाइयों को तीखा और तेज करने की देश की साहसी समझ कहां गायब हो गई? क्या यही वो लोग थे, जिनके लिए आजादी लिए पुरखों ने बलिदान दिया?

शायद सोचते होंगे गांधी। यकीनन सोचते ही होंगे।

लेकिन हम सब कब सोचेंगे?