RamLakhan Bhatt: एक रंगकर्मी का गुजर जाना

RamLakhan Bhatt: जमाना बड़े गौर से सुन रहा था, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते कहते

• हरिओम राजोरिया

गुना इप्टा के सबसे वरिष्ठ साथी कवि एवं रंगकर्मी रामलखन भट्ट (14 जुलाई 1952- 24 मई, 2021) आज नहीं रहे। वे कोरोना संक्रमित हो गए थे और उनके फेफड़े 75% तक इस रोग से प्रभावित थे। वे महीना भर अस्पताल में रहे। भाभी भी अस्पताल में ही सोती थीं। गुना में छोटे-बड़े सभी आयु वर्ग के साथी रामलखन भट्ट जी के स्वास्थ्य को लेकर चिंतित और सक्रिय थे। पल-पल की जानकारी के लिए साथियों ने एक व्हाट्सऐप समूह भी बनाया था, जिसमें ऑक्सीजन लेवल से लेकर उन्हें दिए जाने वाले उपचार तक की जानकारी साथियों के साथ साझा होती थी। मित्रों के अथक प्रयास भी उन्हें कोरोना से नहीं बचा पाए।

साहित्य और रंगकर्म में उनकी ऐसी कोई बड़ी पहचान नहीं थी। उनके भीतर ऐसी महत्वाकांक्षा का कोई छुपा हुआ रूप भी नहीं था कि कोई उन्हें पहचाने। 90 के दशक के शुरुआत में वे नौकरी के सिलसिले में होशंगाबाद से गुना आए थे। वे बायोकेम कंपनी में मेडीकल रिप्रेजेंटेटिव के रूप में काम करते थे और उन्हीं के प्रयासों से गुना में MR की पहली यूनियन बनी और वे गुना इप्टा की तरह इस संगठन के भी पहले अध्यक्ष बने थे।

गुना इप्टा ने जो पहला नुक्कड़ नाटक- ‘सबसे सस्ता गोश्त’ (लेखक: असग़र वज़ाहत) किया। उसका निर्देशन रामलखन जी ने ही किया था। इस नाटक में सत्येंद्र रघुवंशी और बहुत बेचैन रहने वाले कवि श्रीनाथ आचार्य (अब दिवंगत) ने भी अभिनय किया था। रामलखन जी के भीतर संगठन में स्वयं को अनुपस्थित रखकर काम करने की अदभुत क्षमता थी। वे धीमे बोलते थे। जोर देकर ऊंची आवाज़ में अपनी बात कभी नहीं कहते थे। उनके भीतर सामाजिक सरोकारों के प्रति संबद्धता, सूक्ष्म निरीक्षण और व्यंग की बहुत गहरी समझ थी। वे अशोकनगर के ज़्यादातर नाटकों के चुप्पा दर्शक होते थे और नाटक के अंत में मुस्कुराकर आत्मीयता के साथ अपनी तटस्थ राय साथियों को देते थे।

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वे विचार के स्तर पर बहुत प्रतिबद्ध और स्पष्ट समझ वाले साथी थे और छोटे-बड़े सब साथियों के सुख-दुःख में हमेशा साथ खड़े मिलते थे। वे उस तरह के सच्चे और सरल मनुष्य थे जो बगैर आवाज़ किए अपने पीछे आने वाले नए साथियों के लिए चुपचाप रास्ता छोड़ देते हैं।

वे जब गुना आए, मैं अशोकनगर लोनिवि में दैनिक वेतन पर नौकरी करता था। तब अशोकनगर गुना जिले की एक तहसील हुआ करती थी और इस छोटे कस्बे में सांस्कृतिक और साहित्यिक सक्रियता बनाए हुए थे। रामलखन जी हर सप्ताह नौकरी के सिलसिले में अशोकनगर आया-जाया करते थे और धीरे-धीरे सभी साथियों से जुड़ गए थे। वे अपनी दवाइयों का भारी बैग लिए डॉक्टरों के चक्कर लगाने के बाद घर ज़रूर आते थे और धीरे-धीरे हमारे परिवार के साथ पूरी तरह से घुलमिल गए थे। वे मेरी अनपढ़ मां से उसी की बोली में बात करते थे। उनकी मृत्यु का समाचार फ़ेसबुक पर पढ़कर अमेरिका से मेरे भतीजे विवेक ने मुझे फ़ोन किया और बोला कि मैं अपने दोस्तों को दादी का एक किस्सा सुनाता था उसमें भट्ट अंकल एक पात्र हुआ करते थे।

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वे जीवन से भरे हुए थे और उनकी रचनात्मक सक्रियता जीवन से विरत कोई अलग चीज नहीं थी। वे जैसे बोलचाल में स्वभाविक थे वैसे ही अपनी ग़ज़लों में भी। उनकी ग़ज़लों में निजी अनुभव, आधुनिकताबोध, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नयापन था। वे महत्वकांक्षी बिलकुल नहीं थे और अपने भीतर के संवेदनशील कलाकार और रचनाकार के प्रति बहुत लापरवाह थे।

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उनका एक किस्सा है। 2003-04 में गुना में नीलम शमी राव कलेक्टर हुआ करती थीं। वे लेखक और कवि श्याम शमी जी की बेटी थीं। एक बार उनके पिता जब गुना आए तो उन्होंने अपने निवास पर एक कवि गोष्ठी रखी। उस गोष्ठी में रामलखन भट्ट जी ने जब अपनी ग़ज़ल पढ़ी तो गुना के एक शायर ने (नाम नहीं लिख रहा) ने उन्हें बीच में ही यह कहते हुए टोक दिया कि यह तो मेरी ग़ज़ल है। इसे मैं दस सालों से हिंदुस्तान के तमाम मंचों पर पढ़ रहा हूं। इस गोष्ठी में कहानीकार तरुण भटनागर तथा मैं भी मौजूद था। उस शायर की बात सुनकर सब परेशान हो गए, क्योंकि रामलखन जी ‘कल बात करेंगे’ कह कर चुप हो गए थे। दूसरे दिन वह शायर, रामलखन भाई साहब के रामपुरा वाले घर पर अपने एक दोस्त को लेकर हाज़िर हो गया। रामलखन जी ने 1978 की किसी तारीख का देशबंधु अखबार उसके सामने रख दिया, जिसमें उनकी वह ग़ज़ल छपी थी। अख़बार देखकर शायर की हालत खराब हो गई। दो ग़ज़लें एक जैसी कैसे हो सकती हैं, इस बात पर बनाबटी आश्चर्य करता हुआ वह वहां से भाग गया।

रामलखन भट्ट जी हम में से अनेक साथियों के बड़े भाई जैसे थे। उम्र में ज़्यादा बड़े सगे भाइयों से चिपटकर रोने में एक आंतरिक झिझक होती है पर वे ऐसे थे, जिनसे चिपटकर मैं खूब रोया। उनका न रहना जैसे शरीर से किसी अंग के कटकर अलग होने जैसा है।