एकध्रुवीय विश्व से बेहतर है बहुध्रुवीय विश्व का होना: विनीत तिवारी

प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से इंदौर में आयोजित की गई “चीन गरीबी मुक्त भविष्य का स्वप्न” विषय पर परिचर्चा
इंदौर (मध्य प्रदेश)। चीन ने योजनाबद्ध तरीके से अपने देश में गरीबी कम करने में सफलता हासिल की है। साल 2012 में चीन में 10 करोड़ से अधिक नागरिक गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करते थे। अपनी योजनाओं के माध्यम से साल 2018 तक चीन ने गरीबी पर नियंत्रण पाने में सफलता प्राप्त की है। अब वहां गरीबों की संख्या घटकर 1 करोड़ 70 लाख ही रह गई है। इसे संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी स्वीकार किया है। यह जानकारी प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय सचिव विनीत तिवारी ने इंदौर में एक परिचर्चा के दौरान दी। वे प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई द्वारा “चीन गरीबी मुक्त भविष्य का स्वप्न” विषय पर परिचर्चा में प्रमुख वक्ता के तौर पर बोल रहे थे। विनीत तिवारी पिछले दिनों चीन में 7 देशों के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए आयोजित दस दिवसीय कार्यशाला में शिरकत करके लौटे थे। उन्होंने श्रोताओं के सम्मुख अपने अनुभव साझा किए। 
विनीत ने बताया कि वर्ष 2010 से चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रही है। वहां की कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में वर्ष 2020 तक गरीबी कम करने के लक्ष्य को लेकर योजनाएं बनाई गईं जिसके अंतर्गत ग्रामीण अंचलों और शहरों के मध्य सामंजस्य बिठाया गया। प्रत्येक गांव की आवश्यकता के अनुसार वहां अधिकारी और विशेषज्ञ भेजे गए। पर्यवेक्षण के लिए कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ता गांव में जाकर वर्षों तक रहे। उन्होंने पार्टी और प्रशासन के मध्य एक तंत्र विकसित किया, दोनों एक दूसरे की कमियों को पहचान कर विकास योजनाओं को क्रियान्वित करते है।

चीन ने 2012 में अपने देश में 1 लाख 28 हजार ऐसे गांव चिन्हित किए जो सरकार के मापदंड अनुसार गरीब थे। इन गांव में 5 लाख 40 हजार अधिकारियों, कर्मचारियों तथा 1 लाख 88 हजार पार्टी कार्यकर्ताओं को भेजा गया। यह सभी लोग 3 से 4 वर्ष तक गांव में ही रहे। वर्ष 2018 तक अब मात्र 26 हजार गांव ही ऐसे बचे थे जिन्हें विकसित किया जाना है।

भारत की तरह चीन में भी गांव की योजनाओं के लिए वहां की ग्राम सभाओं में ही पूछा जाता है। उन ग्राम सभाओं में 50% महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य रखी गई।
चीन ” वन बेल्ट वन रोड “नीति के अंतर्गत कई अफ्रीकी एशियाई देशों में अधोसंरचना निर्माण के लिए निवेश कर अपने व्यवसाय को विस्तारित कर रहा है। जो काम अमेरिका अपनी दादागिरी से करता है वही काम चीन गरीब देशों में आर्थिक इंफ्रास्ट्रेक्चर को विकसित करके उन देशों में रोजगार बढ़ाकर उन्हें अपने खेमे में ला रहा है। भारत अपनी सामरिक एवं सीमा संबंधी समस्याओं के कारण चीन की इस योजना में शामिल नहीं है।
इस मौके पर अर्थशास्त्री जया मेहता ने चीन के समाजवादी मॉडल के आकलन की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि चीन जो उपाय अपना रहा है वह पूंजीवाद व्यवस्था के भीतर कल्याणकारी राज्य के उपाय हैं। माओ की विचारधारा से चीन अलग हो चुका है। गरीबी कम करने से बड़ा सवाल ये है कि समाजवादी व्यवस्था में गरीबी रहनी ही क्यों चाहिए। निजी सम्पत्ति को अभी तक कायम रखा गया है लेकिन पार्टी का सख्त अनुशासन वहाँ जारी है।
हरनाम सिंह ने विकासशील और गरीब देशों में तत्कालीन सोवियत संघ एवं वर्तमान चीन द्वारा दी जा रही मदद के स्वरूप पर सवाल उठाए। सत्यनारायण वर्मा ने चीन के भीतर धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति के बारे में सवाल किए। चुन्नीलाल वाधवानी ने चीन के वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट पर सवाल किए। राहुल बनर्जी ने चीन में हो रहे अत्यधिक उत्पादन और वहाँ के लेबर और वर्किंग कंडीशन के बारे में सवाल किए। संजय वर्मा, शैला शिंत्रे ने भी परिचर्चा में भागीदारी की। 
सवालों के जवाब देते हुए विनीत ने कहा कि पूँजीवादी व्यवस्था में आए विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के दौर ने चीन को अपने विपुल मानव संसाधन की वजह से यह अवसर दिया है कि वह आज दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। इस अवसर से हो रहे मुनाफे का इस्तेमाल चीन किस तरह करता है इससे ही भविष्य में तय होगा कि चीन के विकास का रास्ता पूंजीवाद की तरफ जाता है या समाजवाद की तरफ। आज रूस एक पूंजीवादी देश है लेकिन वैश्विक स्तर पर अमरीका उसे आँख नहीं दिखा सकता। वैसे ही चीन अमरीका के सामने एक बड़ी ताकत बनकर मौजूद है। बेशक चीन का समाजवाद शास्त्रीय अर्थों में समाजवाद नहीं कहा जा सकता लेकिन एक बहुध्रुवीय विश्व का होना एकध्रुवीय विश्व के होने से बेहतर है। दस दिन में एक गाइडेड टूर के तौर पर निष्कर्ष निकालना गलत होगा। ये जरूर कहा जा सकता है कि अपने देश के गरीबी खत्म करने के उसके गम्भीर प्रयासों को अगर कामयाबी मिली है तो उसके पीछे एक करोड़ की समर्पित कैडरों की कम्युनिस्ट पार्टी की बहुत बड़ी भूमिका है।
कार्यक्रम का संचालन समन्वयक केसरी सिंह चिडार ने किया। आभार माना प्रगतिशील लेखक संघ इकाई के अध्यक्ष एस के दुबे ने। परिचर्चा में अभय नेमा, अजय लागू, सुलभा लागू, सारिका श्रीवास्तव, सुरेश उपाध्याय, सोहनलाल शिंदे, प्रणय, सूरज एवं अन्य साथियों ने शिरकत की। 
रिपोर्ट: हरनाम सिंह एवं सारिका श्रीवास्तव
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