Ground Report

Ground Report: वातावरण सो रहा था, अब आंख मलने लगा है

Ground Report: किसान आंदोलन में 11 दिन

भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के साथी आदित्य रूसिया 16 जनवरी से 26 जनवरी तक दिल्ली के विभिन्न बॉर्डर पर मौजूद थे। उस 26 ​जनवरी को भी आदित्य और उनके साथी किसानों के बीच, उनके साथ, उनके हमकदम थे, जिसका जिक्र सत्ता प्रतिष्ठानों ने काले ढंग से किया है। आदित्य की यह डायरी सरकारी दुष्प्रचार की कलई खोलती है और झूठ की धज्जियां उड़ाती है। साथ ही बताती है कि सरकार को डर किस बात का है। आखिर इन बॉर्डर पर ऐसी कौन सी ईबारत लिखी जा रही है, जिससे सरकार की सांसें उखड़ रही हैं। असल में बॉर्डर पर उत्तर का दक्षिण से, छात्रों—नौजवानों का किसानों, बुजुर्गों से, महिलाओं का देश के दीगर हिस्से से और जमीनी संघर्ष कर रहे साथियों  का कलाकारों से रिश्ता बन रहा है। यहां संस्कृतियों, भाषाओं के बीच प्रेम का आदान—प्रदान हो रहा है और असली हिंदुस्तान धड़क रहा है। सरकार की चिंता यही है। आदित्य ने जो कुछ देखा, महसूस किया, वो उस कहे, सुने से बिल्कुल जुदा है, जो अब तक बताया, दिखाया जा रहा है। उन्होंने किसान आंदोलन में अपनी 11 दिन की मौजूदगी को फुटकर नोट्स में सिलसिलेवार दर्ज किया था। इन्हें हम अविकल प्रस्तुत कर रहे हैं। पढ़ें और अंदाजा लगाएं कि सत्ता और उसका समर्थक मीडिया जो छवि दिखाने की कोशिश कर रहा है, हकीकत उसे कितनी जुदा है।

16 जनवरी 2021: गाजीपुर बॉर्डर

हुक्का, गीत, नारे और भगत सिंह की सीख

सभी साथी बैनर लेकर उसके पीछे खड़े हो गए। ढपली पर नारे गीत शुरू हो गए। सभी गाते हुए मंच की ओर बढ़ने लगे। मैं सभी की तस्वीरें खींचता और वीडियो बनाता। वहां मौजूद लोग भी हमारे साथ नारे लगाते। हम 100 मीटर चले। एक गुड की ट्राली आ रही थी। कुछ लोग उस ट्राली में बैठे थे। कहते घर का बना गुड है और सभी को बांटते जा रहे थे। हमें भी दिया। गुड खाने के बाद हम बिना रुके मंच की ओर चल दिए। नारे लगाते और सभी के हाथ एक साथ उपर उठते और नीचे आते।

लगभग 2 से ढाई किलोमीटर बाद मंच आ गया। हमने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और मंच के सामने लोगों में बैठ गए। जब हम बैठे तो लगा हम सब एक हैं। मंच पर गीत, कविता, भाषण सुने। ऐसा लग रहा था किसी फिल्म की शूटिंग चल रही है। कोई क्रांतिकारी नाटक का दृश्य। जो सरकार की गलत नीतियों का विरोध कर रहे हैं। बच्चे, बूढ़े, महिला, युवा सभी वहां मौजूद थे।

मंच से घोषणा हुई 18 जनवरी से किसान महिला दिवस मनाया जाएगा। घोषणा सुन मैं और मेरे साथी मंच से थोड़ा आगे चले। एक छोटा सा लड़का रस्सी का घेरा घुमा रहा था। इतने में उसकी बड़ी बहन बीच से लेकर घुमाती है। हम थोड़ा और आगे चले तो आर्मी के रिटायर्ड सैनिक बैठे थे। हमने उनसे बात की और उनके साथ चाय पी।

आगे चले तो देखा अस्पताल है, उसमें पलंग, ऑक्सीजन, वेंटिलेटर, दवाई सब इंतजाम था। जगह-जगह लंगर लगे हैं। खालसा एड की तरफ से भी लोग सेवा कर रहे थे। लाइब्रेरी भी थी। वहां से आप किताब लेकर पढ़ सकते हैं। थोड़ा आगे हम चले एक महिला हारमोनियम पर वाहेगुरू जप रही थी। हारमोनियम सुनकर मैं कुछ देर उन्हें सुनता रहा। इसी तरह हम घूमते रहे और अद्भुत दृश्य देखते रहे। एक 14 साल का लड़का भगत सिंह का पोस्टर अपने पंडाल के सामने चिपका रहा था। पोस्टर पर शहीद भगत सिंह थे और उस पर लिखा था—

आंखें बंद करके ना पढ़ो
यह ना समझो जो पुस्तकों में लिखा है वही सही है
पढ़ो, सोचो, विचार करो, आलोचना करो
इसकी मदद से नए विचार बनाने की कोशिश करो
—शहीद भगत सिंह

फिर हमारे सभी साथी और मैं अखिल भारतीय किसान सभा के साथी जहां रुके थे। वहां पहुंचे और खाना खाकर वहीं विश्राम किया। बड़े-बड़े बांसों से किसान भाइयों ने हाईवे पर डिवाइडर के सहारे सोने का इंतजाम कर लिया था। चारों तरफ त्रिपाल से कवर था। फिर भी ठंडी हवाएं अपना रास्ता बना लेतीं। तो हम इस तरह गाजीपुर बॉर्डर पर पूरा 1 दिन रुके।

17 जनवरी 2021: सिंघु बॉर्डर

हर तरफ ट्रैक्टर, ट्रॉली, अब यही घर हमारा

सुबह उठते ही मैंने सबसे पहले अपना फोन चार्ज किया। फ्रेश होने के बाद सभी साथियों के साथ सिंघु बॉर्डर के लिए रवाना हुआ। हम सभी साथी सिंघु बॉर्डर पहुंचे और ढपली पर गीत, नारे लगाए। पिछली बार की तरह यहां पुलिस बल ज्यादा संख्या में था। क्योंकि सिंघु बॉर्डर पर 100 से 120 किलोमीटर तक लोग अपने टैक्ट्रर टॉली लेकर यहां मौजूद थे।

सिंघु बॉर्डर 1 किलोमीटर पर हमारे पंजाब इप्टा और एआईएसएफ के साथी और चाचा के ट्रैक्टर और ट्राली लगे थे। वहां एक अंकल थे, उन्हें सब काका कहते थे। हमारे रुकने का इंतजाम वहीं था। लोग बैठे हैं। कुछ लोग सब्जी काट रहे हैं। शाम के खाने के लिए। एक डलिया में किताबें रखी है, मैक्सिम गोर्की का मदर उपन्यास रखा है। भगत सिंह के दस्तावेज और भी किताबें रखी थीं। एआईएसएफ के साथी विक्की महेश्वरी मिले और बोले यह रही किचन ये ट्राली यही रुकना है। अपना घर समझो। हमने अपने बैग ट्राली में रख दिए। चाय पी और सभी साथी मुख्य मंच का चक्कर लगा वहीं आ गए जहां से चले थे।

मुझे वहां थिएटर की लड़कियां और कुछ लड़के मिले, जो पंजाब इप्टा से थे। एक लड़का सुमनदीप अपनी पग बांध रहा था। मैंने पूछा— भाई क्या करते हो? सवाल-जवाब हुए। नाटक वाला निकला भाई। रमन, गुरतेज, समर, किरण, टशन, परमिंदर सभी नाटक करते थे। नाटक से एमए भी कर रहे हैं कुछ। फिर मैंने भी मन बना ही लिया कि मैं अब यहां 26 तारीख तक तो रुकूंगा ही रुकूंगा।

हमारी ट्राली से आगे एक गली थी। वहां एक ताऊ ने अपना पूरा बाड़ा खोल दिया था। वहां नहाने—धोने का इंतजाम था। ताऊ से मेरी अच्छी दोस्ती हो गई थी। ताऊ के सामने एक भाई भी था। उसने अपना ऑफिस किसानों की सेवा में खोल दिया था। ठंड का समय और कब रात हुई। पता नहीं चला। आग के चारों तरफ लोग बैठे थे। मेरे हाथ में ढपली, साथी राहुल के हाथ में भी डफली। उन्होंने गीत शुरू किया। मैंने जोश के साथ बढ़िया झूम झूम के डफली बजाई। दुष्यंत कुमार की गजल— धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है, वातावरण सो रहा था अब आंख मलने लगा है। ग़ज़ल गाई और भी गीत गाए। मेरा रंग दे बसंती चोला, पगड़ी संभाल जट्टा, इंकलाब जिंदाबाद गीतों के गाने के बाद हम ट्रॉली में सोने चले गए।

18 जनवरी 2021: सिंघु बॉर्डर

सुखमनी ने छोड़ी जॉब, ये दिन महिलाओं का

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पहली बार इस तरह ट्राली में सोया था। सुबह उठा तो लगा यह सपना है। उठते ही चाय पी। ठंड बहुत थी। तो हम ट्राली में ही बैठे रहे। फिर कुछ देर बाद मैं रमन भाई के साथ नहाने चला गया। एक बड़ा ड्रम गरम पानी की बाल्टी भर भर के एक लड़का उसी ड्रम में डाल रहा था। 5-7 नहाने के मग्गे रखे थे। कपड़े ट्राली पर रखने के बाद मैं नहाने बैठ गया। नहा कर हम ट्राली पर पहुंचे तो वहां लड़कियां पराठें बना रही थीं। हमने पराठें खाए। फिर उसके बाद चाय पी।

चार लड़के लाइन से एक—दूसरे के सर पर तेल की चंपी कर रहे थे। उनमें से एक लड़का गुरतेज। बहुत अच्छा गाता है। आवाज भी अच्छी है। आज का दिन महिलाओं को समर्पित था, क्योंकि आज ही के दिन से किसान महिला दिवस को मनाया जाएगा।

आज महिलाओं ने मंच संचालन किया। भाषण दिए। गीत गाए। कविता पढ़ी। पूरा स्टेज आज के दिन विशेष रूप से महिलाएं संभाल रही थीं। शाम 5—6 बजे लड़कियां स्टेज से आईं और उन्होंने कहा सांझी साथ चलोगे। वहां सभी बैठ कर बात करते हैं, गाते हैं, अपने अनुभव शेयर करते हैं। मैं उनके साथ चल दिया रास्ते में ट्राली में कीर्तन चल रहा था। लोग आ जा रहे थे कोई लंगर में सेवा दे रहा है।

खीर, हलवा, जलेबी, दाल, चावल, रोटी लोग बुला बुला कर बांट रहे थे। हम सभी साथी वहां पहुंचे। वहां कुछ महिलाएं आंदोलन से जुड़े अपने अपने अनुभव बता रही थीं। केरल से भी कुछ लोग आए थे। वहां बैठे थे। उन्होंने अपनी भाषा में एक गीत गाया और नारे लगाए। हमारे साथ एक लड़की थी— सुखमनी। उसने अपनी जॉब छोड़ दी थी और 1 महीने से आंदोलन में थी। लड़कियों को गाने को कहा। पंजाब इप्टा के लड़के लड़कियों ने एक पंजाबी फोक प्रस्तुत किया।
शाला मेंडा जीवे ढोला
मोढे ते परना है
लोक सारे हक मांगदे
दिल्ली विच धरना है
उसके बाद साथी विक्की महेश्वरी ने एक कविता पढ़ी। मणि भगत सिंह पर। बहुत अद्भुत लहजा है बोलने का पढ़ने का। सभी स्तब्ध होकर उस कविता को सुन रहे थे। कविता सुनते ही ऐसा लगने लगा कि भगत सिंह हमारे बीच मौजूद हैं। वह यह कविता स्वयं पढ़ रहे हैं। हम वापस अपनी ट्राली पर आए। वहां मेरी मुलाकात एफटीआईआई के 2 छात्रों से हुई। दोनों से मेरी मित्रता हो गई। आदित्य तमिलनाडु से है जो एफटीआईआई से कैमरे की पढ़ाई कर रहा है। अंतिम वर्ष का छात्र है। शीतल केरल से है, वह डायरेक्शन में पढ़ाई कर रही है और फर्स्ट सेमेस्टर में है। यह दोनों आंदोलन पर डॉक्यूमेंट कर रहे हैं।

हर फील्ड के लोग वहां मुझे मिल रहे थे। मैं सब से मिल रहा था और सब से मित्रता होती जा रही थी।

19 जनवरी 2021: सिंघु बॉर्डर

केरल से आए कंबल, प्याज और नाटक की रिहर्सल

रोज की तरह हम उठे और नाश्ता पानी करके बॉर्डर की ओर चल दिए। यूथ फेडरेशन के नेशनल प्रेसिडेंट आफताब आलम साहब, नेशनल जनरल सेक्रेट्री तिरुमलाई साहब और स्टेट सेक्रेट्री साथी राहुल एक टेंपो में केरल की ओर से किसान भाइयों के लिए 25000 कंबल भेजे थे, वह लेकर आ गए। हम सभी साथी कंबल लेने पहुंचे। चाचा के ट्रैक्टर पर सारे बैग रखे। और अपनी ट्राली की ओर चल दिए।

आज साथी विकी ने बताया कि कल टिकरी बॉर्डर पर नुक्कड़ नाटक जनगीत गीत गाने हैं। नाटक् की टीम के साथी अपना काम करते जाते और संवाद बोलते जाते। प्याज काटते समय, आटा गूंथते समय, रोटी सेंकते समय मैं उनको गौर से सुनता। उनकी सारी बातें मैं समझ जाता, क्योंकि पंजाब से मेरा पुराना नाता है। पंजाबी संगीत बचपन से सुनता रहा हूं।

मैं नाटक के गीतों पर ढपली बजाता। नाटक में संगीत करता। रोज रात में हम गीत गाते हैं। कोई कविता पड़ता और खूबसूरत माहौल बन जाता। दुष्यंत कुमार का यह शेर ज्यादातर जोर देकर गाते—

ये घोषणा हो चुकी है, मेला लगेगा यहां पर,
हर आदमी घर पहुंचकर, कपड़े बदलने लगा है।
फिर धीरे-धीरे यहां का मौसम बदलने लगा है,
वातावरण सो रहा था अब आंख मलने लगा है।

20 जनवरी 2021: टिकरी बॉर्डर

जबरदस्ती दिए पैसे, कहा— सही काम कर रहे हो

सुबह जल्दी उठकर तैयार होकर सभी साथी टिकरी बॉर्डर के लिए निकले। वैन में सभी नाटक के संवाद दोहराते। फिर हमने गीत गाने शुरू किए। एक डेढ़ घंटे में हम टिकरी बॉर्डर पहुंच गए। बॉर्डर से 15-20 किलोमीटर तक लोग धरने पर बैठे थे। स्टेज बॉर्डर पर था। वहां से हमने चलना शुरू किया।

एक स्पेस देखकर वहां पहला मंचन किया। चारों तरफ लोग इकट्ठे हो गए। बच्चे, बूढ़े और जवान सभी वहां मौजूद थे। लोगों ने नाटक देखा। आशीर्वाद दिया। कुछ लोगों ने पैसे दिए। हमारे साथियों ने पैसे लेने से मना किया कि हम किसानों के लिए आए हैं। फिर भी एक दो लोगों ने जबरदस्ती पैसे दिए। कहा— सही काम कर रहे हो, सबको एकजुट करने का।

किसान एकता जिंदाबाद…, काले कानून रद्द करो…, इंकलाब जिंदाबाद… के नारों से सारा वातावरण गूंज उठा। हम थोड़ा और आगे चले। हमारे हाथों में ढपली देख लोगों ने बुलाया। वहां लंगर चल रहा था। हमसे आग्रह किया। कुछ सुनाओ। एक साथी ने गाना शुरू किया। मैंने ढफली बजाई। साथ में गाया। लोग ध्यान से सुन रहे थे। कोई ताली बजा रहा था। कोई नाचने लगा। मैं भी डफली बजाते हुए नाचता, वहां मौजूद संगत शुक्रिया अदा करने लगी।

हम और आगे चले वहां भी हमने नाटक किया। गीत गाये, नारे लगाए। हम शाम तक वहीं रहे। 8 से 10 किलोमीटर तक चले। कई जगह नाटक किए। गीत गाए। एक ट्राली के बाहर महिलाएं गिद्धा कर रही थीं। हमने उनके गीतों पर ढपली बजाई और वहां नाटक करने के बाद हम सिंघु बॉर्डर के लिए वापस चल दिये।

कुछ लोग मिले जो हमारे जाते समय कहते आओ खाना खा लो, चाय पी लो। मुझे ऐसा लगा हम उनके गांव, उनके घर गए हैं। यह प्रेम समर्पण इंसानियत देख मैं बहुत खुश हुआ। किसान हमारे अन्नदाता हैं। किसानों के लिए अदम गोंडवी का यह शेर याद आया—

यूं खुद की लाश अपने कंधे पर उठाए हैं
ऐ शहर के बाशिंदो हम गांव से आए हैं

21 जनवरी 2021: सिंघु बॉर्डर

चंद कंबल बांटने चले 8 से 10 किमी

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आज हमने छोटी ट्राली में केरल से आए कंबल रखे। हम लोग कंबल बांटने चल दिए। हमने ट्रालियों पर जाकर लोगों से बात करते हुए कहा— हमारे केरल के साथियों ने किसान आंदोलन को समर्थन देते हुए यह भेंट भेजी है। स्वीकार करें। बहुत से लोगों ने लेने से मना किया। और कहा—जिसे जरूरत हो उसे दे देना। सिंघु बॉर्डर से हम ट्रैक्टर से 8—10 किलोमीटर गए। कंबल बांटकर लौटे। लौटते में हमने गीत गाने शुरू कर दिए। हम जहां से भी गुजरते लोग हाथ उठाकर मुस्कुरा कर समर्थन पेश करते।

22 जनवरी 2021: सिंघु बॉर्डर

कलाकार, चित्रकार, लेखक सब शामिल हैं अपनी तरह से

किसान आंदोलन में हर दिन कुछ नया होता है और कुछ रिपीट। साथी विक्की लाल कपड़े का लंबा बैनर लाए थे। उस पर लिखा था एग्रीकल्चर इज अवर कल्चर। हम 12-15 लोग बैनर लेकर निकले और गीत भी गाते चले। स्टेज के पास पहुंचकर बैनर लेकर खड़े हो गए। गीत गाते, नारे लगाते। हमें सुनकर लोगों इकट्ठे हो जाते हैं। मीडिया आ जाता और बातचीत होती। सवाल-जवाब चलते। मुख्य मंच के पास हमारे एक साथी गुरतेज ने गीत गाया।
कलेजे तीर वेखन नू
थे सिर ताज वेखन नू
हम लोग कोरस करते। एक अलग ही माहौल बन जाता। वहीं मंच के पास 38 फीट लंबी और 20 फुट चौड़ी 2 चित्रकार द्वारा पेंटिंग बनाई जा रही थी। आंदोलन में कलाकार भी बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। चाहे नाटक करते हों, गाते हो, चित्रकार हों, लेखक हों, सभी वहां किसी न किसी माध्यम से उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

Ground Report

23 जनवरी 2021: सिंघु बॉर्डर

सही तो कर रहे हैं, अपने हक के लिए

आज और ट्रैक्टर आ गए हैं। ट्राली पर भी ट्रैक्टर ट्राली लगे हैं। लोगों में जोश है। हिम्मत है। उत्साह है। सबसे महत्वपूर्ण प्रेम है। बराबरी है। आदर है। सत्कार है। हर इंसान के प्रति। आज संगत और आ गई। लोग निरंतर बढ़ते जा रहे हैं।

हमारी ट्राली के सामने एक परिवार रहता है। उनकी छोटी सी दुकान है। सिगरेट, गुटखा, पान, मसाला की। वो लोग एक बड़ी सी जमीन की रखवाली करते हैं। और वहीं रहते हैं। एक महिला थी, जो बाहर खाट पर बैठी रहती थी। दिन भर। वहीं तसले में जलती लकड़ी से हाथ तापती रहती थी। मैंने उससे बात की। आप जानती हैं यह लोग 2 महीने से यहां सड़कों पर इस तरह रह रहे हैं, ऐसा क्यों कर रहे हैं यह लोग? उसने पहले गुटखा थूका, और मुझसे कहा— सही तो कर रहे हैं। अपने हक के लिए इतनी दूर गांव से आए हैं। इतनी ठंड में बैठे हैं। इतना सुन, मैंने उससे ज्यादा बात नहीं की और ट्राली पर आ गया।

24 जनवरी 2021: सिंघु बॉर्डर

यूं घुले मिले हैं, जैसे बरसों की पहचान हो

आज कई राज्यों से लोग आए हैं। बिहार, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, मध्यप्रदेश और भी राज्यों के लगभग 400 के आसपास लोग हो गए थे। बिहार वाले अपनी बोली में गाते। आंध्रा वाले अपनी बोली में। वहां कई राज्यों से लोग आ रहे हैं। अपनी बात रख रहे हैं। कलाकार भी उनमें मौजूद हैं। गाते हैं। लिखते हैं। नाटक करते हैं।

प्रजा नाट्य मंडली आंध्र प्रदेश के साथी अमर और उनके साथियों से मुलाकात हुई। वहां मैं किसी को नहीं जानता, पर हम पता नहीं कैसे इतने घुल मिल गए जैसे हम वर्षों से जानते हों। साथ खाते, चाय पीते, गीत गाते, नारे लगाते। एक अद्भुत अनुभव होता। मैं अक्सर सोचता— काश सभी इतने प्रेम भाईचारे से रहें। वहां मेरे कई दोस्त भी बन गए।

25 जनवरी 2021: सिंघु बॉर्डर

मां के साथ आया दोस्त मेडोलिका भी साथ

आज ग्वालियर से मेरा एक दोस्त अपनी मम्मी के साथ सिंघु बॉर्डर आ गया। मुझे यकीन नहीं हुआ कि वह अपनी मम्मी को साथ में लेकर आएगा। वह दो-तीन इंस्ट्रूमेंट लाया था, जिसमें मेडोलिका भी था। आंध्रा के साथियों ने अपनी भाषा में गीत गाया। मैंने उनके साथ मेडोलिका बजाया।

मैंने वहां बहुत गीत कविता सुने। अलग-अलग भाषा में। और कुछ सीखे भी। आज सभी लोग बहुत व्यस्त रहे। कोई ट्रैक्टर से जा रहा है। कुछ लोग ट्रैक्टर में तिरंगा झंडा लगा रहे हैं। निशान साहब लगा रहे हैं। किसान एकता का झंडा लगा रहे हैं।

26 जनवरी 2021: सिंघु बॉर्डर और दिल्ली

और ये खास गणतंत्र, माहौल जो कभी देखा नहीं था

आज गणतंत्र दिवस है। हम जल्दी उठ कर, नहा कर तैयार हुए। और ट्रैक्टर मार्च के लिए निकले। हमारे तीन ट्रैक्टर थे। जिसमें एक ट्रैक्टर में छोटी ट्राली लगी थी। जिस पर हम लोग बैठे थे। मैंने मेडोलिका पर गीत शुरू किया। साथियों ने गाना शुरू किया था। गणतंत्र दिवस की ट्रैक्टर परेड शुरू हुई। हम दिल्ली की ओर चल पड़े। हमने जैसे ही सिंघु बॉर्डर का बैरीकेड पार किया, तो यह लगा यह सारी दुनिया की सरहद खुल चुकी है। गणतंत्र दिवस पर पहले कभी इतना खुश और उत्साह नहीं हुआ, जितना आज मुझे ट्रैक्टर परेड में शामिल होकर हो रहा था।

हमारे ट्रैक्टर के आगे कई और ट्रैक्टर जा चुके थे। कई और पीछे थे। ट्रैक्टर गिने नहीं जा सकते थे, पर पूरी दिल्ली में सिर्फ ट्रैक्टर ही ट्रैक्टर थे। हमने दिल्ली में प्रवेश किया तो एक अलग ही वातावरण था। रोड के दोनों तरफ लोग ​थे। लोग ट्रैक्टर पर बैठे किसानों पर फूल बरसा रहे थे। और कोई हाथ जोड़ रहा था। कोई सलाम कर रहा था। कोई पानी की बोतल, कोई नाश्ता। हर तरह से लोग स्वागत कर रहे थे। पुल के ऊपर से लोग फूलों की बारिश कर रहे थे। दिल्ली के लोगों ने घंटों खड़े होकर ट्रैक्टर परेड का स्वागत किया। ऐसी परेड मैंने कभी नहीं देखी। उस परेड का हिस्सा था, यह मेरे लिए गर्व की बात है।

किसान, मजदूर एकता जिंदाबाद