Theatre Workshop

Theatre Workshop: बंधन तोड़ कर आगे आए, डर निकाला और मस्ती में डूबे

(आजाद बोल की साथी फरहा इन दिनों एक थियेटर प्रोसेस से गुजर रही हैं। उन्होंने अपने अनुभव को शब्दों में ढाला है। बच्चों और किशोरियों के मुद्दे पर जमीनी काम करने वाली, अपने मोहल्ले, बस्ती की किशोरियों, महिलाओं की समस्याओं के बावस्ता रहने वाली फरहा इन दिनों लगातार लिख रही हैं और उनकी कहानियों में हमारे समाज की वह तलछट अपनी पूरी खुरदुराहट के साथ सामने आती है, जिससे हम आंख चुराते हैं। संविधान लाइव)

रोज़ की तरह मेरी फिर एक और सुबह हुई। हर रोज़ की तरह आज भी देर से जागी। लेकिन आज का दिन थोड़ा सा अलग था। क्योंकि आज मुझे थियेटर वर्कशॉप के लिए जाना था। मैं तैयार हुई खाना खाया फिर फोन बजने लगा। फोन उठाया, तो अनम बोली— जल्दी आओ लेट हो रहे हैं। मैं जल्दी जल्दी गई। शाकिर सदन पहुँची। मैंने वहाँ देखा कोई भी नहीं था। धीरे-धीरे सब लोगों ने आना शुरू हुए। देखते ही देखते सब लोग जमा हो गए। फिर चिराग भी आ गए। चिराग वो हैं जब मैं छोटी थी, तब उन्होंने मुझे और मेरी टीम के साथ मिल कर एक नाटक बनाया था। वो नाटक हम लोग ने स्कूलों औऱ बस्ती में दिखाया था। चिराग ने हमारा नाटक पूरा तैयार कराया था।

आज भी चिराग ही मीटिंग को आगे बढ़ाएंगे। चिराग ने परिचय से बातचीत शुरू की। परिचय के बाद उन्होंने सबसे ताली बजवाई। सबने ताली बजाई और अपने-अपने नाम लिए। कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। बस सब ताली बजा रहे थे और अपने-अपने नाम ले रहे थे। ताली बजाते-बजाते चिराग ने सबको खड़ा कर दिया। सब खड़े हो गए। चिराग ने एक एक्टिविटी कराई। इसमें चिराग स्टॉप बोल रहे थे, तो रुकना था और वॉक बोलने पर चलना था। फिर चिराग ने इस एक्टिवि को उल्टा कराया। उसके बाद चिराग ने सबसे कोई एक शब्द पूछा— जिसमें सब लोगों को एक्टीविटी के बाद कैसा महसूस हुआ, यह बताना था। सबने अपनी-अपनी फीलिंग बताई। किसी का थकान, एन्जॉय, साँस, एनर्जी, तो किसी ने बताया रिलेक्स।

यह भी पढ़ें:  शादी, ससुराल और मेरा सपना

Theatre Workshopफिर तीन-तीन के समूह बनाये। इनसे दूसरी एक्टीविटी (घर, तूफान, लोग) कराई। उसके बाद मूर्ति वाली एक्टिविटी कराई। इसमें चिराग किसी एक चीज़ का नाम लेते तो बाकी सब मूर्ति बनते। फिर चिराग ने दो ग्रुप बनवाए। सब लोग एक दो कर के दो ग्रुप में बंट गए। चिराग कोई भी एक चीज़ का नाम लेते और एक ग्रुप के सारे लोग मूर्ति बनते। किसी को परिवार मिलता तो किसी को शादी। अलग-अलग तरह की मूर्ति देखने को मिलती। जब ये सब एक्टिविटी कराई जा रही थी तो किसी के चेहरे पर खुशी थी तो किसी पर थकान। लेकिन थकता कोई भी नहीं। सब मस्ती के साथ एक्टिविटी में भाग लेते गए। खूब मस्ती करते रहे। इन सबमें उम्र का कोई फासला नहीं और न ही कोई छोटा बड़ा। और न कोई टेंशन। सब मिल जुल का खेलते रहे। एन्जॉय करते रहे। मानो जैसे सबका बचपन लौट आया हो। उनको आज़ादी मिल गई हो।

यह भी पढ़ें:  Old Days: जाने कहां गए वह दिन!

जब सब सर्किल में एक साथ फीडबैक के लिए बैठे तो सबने बताया कि उन्होंने बहुत मस्ती की।

अनम ने बताया जितनी भी टेंशन थी सब भूल गई मुझे यहां आ कर बहुत अच्छा लगा। मैंने यह बहुत एन्जॉय किया। उन्होंने बोला अगर मैं यहाँ नहीं आती तो मुझे बहुत अफसोस होता क्योंकि मुझे यह आकर बहुत अच्छा महसूस हुआ।

रजनी बताती हैं कि मैंने इस तरह की एक्टिविटी बहुत सालों बाद की। मुझे अपना बचपन याद आ गया। मैंने यहाँ फुल मस्ती की।

निगहत ने बोला मुझे तो ऐसा लग रहा था कि हम सब को आज़ादी मिल गई हो। क्योंकि ना कोई छोटा या बड़ा सब बराबर थे। सब यहां बंधनों को तोड कर आगे आए और अपना डर निकाल कर आगे बढ़े।

यही सब बात हो रही थी और पीछे कुछ लोग बैठ कर सब की बातें सुन रहे थे उन्होंने कही न कही अफसोस था कि वो पहले क्यों नहीं आए। तो किसी ने लेट आने के लिए माफी मांगी तो कोई नहीं आया उसके लिए माफी।

यही सब बात हुई। उसके बाद थियेटर वर्कशॉप के लिए चर्चा की। हम सब थियेटर वर्कशॉप कब से शुरू कर सकते हैं और किस समय, यही सब चर्चा हुई।