Bank privatisation

Bank Privatisation: बैंकों का निजीकरण देश के साथ धोखाधड़ी

Bank privatisationफरहा और साहिबा की रिपोर्ट
भोपाल।
केंद्र सरकार ने सरकारी क्षेत्र के दो और बैंकों के निजीकरण (Bank privatisation) का प्रस्‍ताव दिया है। इसके विरोध में सरकारी बैंकों (PSU Banks) के कर्मचारियों और अधिकारियों ने सोमवार और मंगलवार, यानी 16 और 17 मार्च को हड़ताल का आह्वान किया है। इस मुद्दे पर संविधान लाइव ने एटक के उप महासचिव शिव शंकर मौर्य, जनवादी लेखक संघ के सचिव मनोज कुलकर्णी और एनएफआईडब्ल्यू की महासचिव सारिका श्रीवास्तव से बात की।

बैंकों के निजीकरण के मामले पर एनएफआईडब्ल्यू की मध्य प्रदेश की महासचिव सारिका श्रीवास्तव कहती हैं कि हमारा देश गरीब देश है जिसमें लोगों को पेटभर खाना, सर छुपाने को छत की जरूरत है न कि कार, फ्रिज, टीवी जैसी वस्तुएँ खरीदने की। लेकिन अफसोस कि एक बोरी अनाज खरीदने को कहीं भी जीरो फाइनेंस पर पैसा नहीं मिलता। तब इन हालात में यदि बैंक का निजीकरण कर दिया जाएगा तो हालात और भी चिंताजनक हो जाएंगे। उनका कहना है कि सरकारी विभागों/ क्षेत्रों का निजीकरण देश की जनता के साथ धोखाधड़ी है और देश के साथ गद्दारी।

एक सवाल के जवाब में सारिका श्रीवास्तव ने कहा कि निजीकरण का विरोध इसलिए किया जाता है क्योंकि सरकारी क्षेत्र देश के हित में सोचकर बनाए और कार्यान्वित किए जाते हैं जबकि निजी संपत्ति केवल और केवल निजी हित और अधिक से अधिक मुनाफा कमाने का साधन होती है।

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सारिका का कहना है कि किसी भी देश के बैंक देश की एवं उस देश में रहने वाली जनता को आर्थिक सहायता करने के लिए होते हैं। यदि बैंकों का निजीकरण कर दिया जाएगा तो बैंक का मालिक अपने मुनाफे के लिए योजनाएं बनाएगा न कि बैंक के ग्राहक के लिए। अभी जो ब्याज दर लोगों को ध्यान में रखकर कम रखी जाती है उसे बढ़ा दिया जाएगा। बैंक केवल उन्हें ही ऋण देंगे जो उनका ऋण चुकाने में समर्थ हों तब इस परिस्थिति में छोटे किसान, व्यापारी, छोटे फेक्ट्री-कारखानों एवं मजदूरों को ऋण मिलने में खासी कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। यदि मिला भी तो यह तय है कि उसकी वसूली भी खतरनाक ही होगी।

साथ ही उन्होंने कहा कि यदि सरकारी बैंक कर्जे की भरपाई न कर पाने पर फेल हो जायें तो सरकार उन्हें बचाती है और लोगों की जमापूँजी खतरे के बाहर रहती है लेकिन निजी बैंक यदि फेल हुए तब लोगों की जिंदगी भर की जमापूँजी की जिम्मेदारी कौन लेगा? बैंक निजीकरण होने से सीधे-सीधे हजारों लोगों की नोकरियों पर जो संकट आएगा वो समस्या तो दिख ही रही है।

आम जनता को होगा नुकसान
बैंकों के निजीकरण पर अपनी राय रखते हुए एटक के उप महासचिव शिव शंकर मौर्य ने कहा कि बैंक का निजीकरण सही नहीं है। बैंकों में जो पैसा है वह आम जनता का ही पैसा है। अगर बैंक का ऐसे ही निजीकरण होता रहा तो आम जनता तो अपना पैसा ही नहीं निकाल पाएगी। बैंक का निजीकरण हुआ तो आम जनता परेशान हो जाएगी और जो लोग नौकरी कर रहे हैं उनको भी बड़ी दिक्कत का सामना करना पड़ेगा। निजीकरण से आम जनता को ज्यादा परेशान होना पड़ेगा।

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जनवादी लेखक संघ के मध्य प्रदेश सचिव मनोज कुलकर्णी का बैंकों के निजीकरण पर कहना है कि बड़े बैंक सार्वजनिक होते है, इन बैंकों का निजीकरण नहीं होना चाहिए। पहले बैंकों की पहुंच कम थी, लेकिन अब बैंकों में बड़ी आबादी को सुविधा मिल रही है। निजीकरण से आम जनता को भी नुकसान है। निजीकरण से बैंक उद्योगपति के हाथों मे चला जाएगा इसलिए इसका विरोध करना जरूरी है।

क्या है मामला
सरकार ने 2019 में IDBI बैंक में अपना अधिकतर हिस्‍सा LIC को बेचकर उसका निजीकरण किया था। पिछले चार साल में सरकारी क्षेत्र के 14 बैंकों का विलय हो चुका है। बजट 2021-22 में वित्‍त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दो सरकारी बैंकों के निजीकरण का प्रस्‍ताव रखा। बैंक कर्मी इसी का विरोध कर रहे हैं। अतिरिक्त मुख्य श्रम आयुक्त के साथ 4, 9 और 10 मार्च को हुई बैठक में कोई नतीजा नहीं निकला इसलिए हड़ताल हो रही है। बैंक यूनियंस के बाद जनरल इंश्‍योरेंस कंपनियां 17 मार्च को हड़ताल पर रहेंगी।