संस्कृति विभाग का ​कल्चर: महज 12 संस्थाओं के खाते में गया 60 प्रतिशत से ज्यादा अनुदान

मध्य प्रदेश की साहित्य संस्कृति-1
– चंद संस्थाओं और व्यक्तियों के बीच कैसे सिमट गया भोपाल और प्रदेश का साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल
– संस्कृति निर्माण की कोशिश के अनुदान से हो रहा खेल अकादमियों का संचालन तो कहीं टीबी जागरुकता
मध्य प्रदेश में साहित्य और संस्कृति के विकास, विस्तार एवं उन्नयन का काम सरकार के संस्कृति संचालनालय के जिम्मे है। लेकिन इस भारी भरकम बजट वाली संस्था में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। पिछले एक साल से कामकाज में बदलाव की कुछ कवायदें शुरू हुई हैं, लेकिन उसके नतीजे फिलहाल दिखाई नहीं देते हैं। मौजूदा सरकार के पहले 15 साल तक भाजपा के कार्यकाल और उसके पहले के कांग्रेस के कार्यकाल को देखें तो तस्वीर बहुत सकारात्मक नहीं दिखाई देती है। 
असल में, भोपाल के साहित्यिक-सांस्कृतिक बिरादरी के सर्वेसर्वा ही पूरे प्रदेश की साहित्यिक सांस्कृतिक पहचान बनाने, निखारने का काम करते हैं, इसलिए सवालों के घेरे में भी राजधानी के संस्कृतिकर्मी ही ज्यादा हैं। वैसे ये आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं कि देश ही नहीं, बल्कि दुनिया में अपनी अलग पहचान रखने वाले भोपाल के साहित्यकारों एवं संस्कृतिकर्मियों से खुद उनका शहर ही ठीक ढंग से वाकिफ नहीं है।

बीते 25-30 सालों में शहर का विस्तार तेजी से हुआ। जनसंख्या भी दोगुनी से भी अधिक हो गई है, लेकिन दिलचस्प है कि शहर का साहित्यिक—सांस्कृतिक समाज मौटे तौर पर उन्हीं चेहरों से अटा पड़ा है। जिनके बाल पहले काले थे, वो सफेद हो गए हैं, तो कुछ जो सम्मानित थी अब सहारा लेकर चलने लगे हैं। इसी तरह जो खिलंदड़ युवा सवालों से चौंकाने वाले थे, अब वे सत्ता की परिक्रमा करते हुए पांचों उंगलियां घी में डुबोकर सिर को नए मर्तबान की तलाश में इधर उधर घुमा रहे हैं। 

इसके क्या कारण हैं?
आखिर
पूरी दुनिया में अपनी अपनी वैचारिक धाक और रचनात्मकता के लिए पहचाने जाने वाले साहित्यकार-संस्कृतिकर्मी क्यों अपने ही शहर में बेगाने हैं?
क्यों भोपाल के साहित्यिक कार्यक्रमों की गूंज ठीक से पॉलिटेक्टिनिक चौराहे के आसपास तक सुनाई नहीं देती है? 
क्या वजह है कि राजधानी और प्रदेश के साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल पर कथित तौर पर वामपंथी लेखकों-संगठनों की पकड़ मजबूत है, लेकिन सामाजिक और राजनीतिक माहौल पर साहित्य-संस्कृति का असर नगण्य है?
आखिर क्यों शहर के ज्यादातर साहित्यिक—सांस्कृतिक कार्यक्रम दो किलोमीटर के दायरे में ही सिमटे रहते हैं?
शहर के कवियों, रंग​कर्मियों, कलाकारों का एक बड़ा तबका संस्कृति के कथित मंदिरों की सीढ़ियों पर क्यों नहीं रख पाता है पांव?
क्यों भोपाल की ही तरह विभिन्न जिलों में साहित्य—शक्ति के कुछ केंद्रों के समक्ष नतमस्तक होना है संस्कृतिकर्मियों की मजबूरी?
ऐसे कई सवाल साहित्य प्रेमियों के मन में हैं, तो कुछ भी जुबान पर भी। हम धीरे-धीरे इन सवालों के करीब जाएंगे और जानने की कोशिश करेंगे कि आखिर कुएं में भांग किसने, या किस किसने डाली है।
इसी क्रम में आज बात गैर सरकारी संस्थाओं की

सरकारी अनुदान की बंदरबांट 

संस्कृति विभाग की विभिन्न सरकारी संस्थाओं के अलावा प्रदेश में कई गैर सरकारी संस्थाओं को साहित्य एवं संस्कृति से संबंधित कार्य करने के लिए संस्कृति संचालनालय की ओर से अनुदान दिया जाता है। इस अनुदान के लिए साल 1987 में एक नियमावली बनाई गई थी। जाहिर है नियमावली में ऐसे कई पेंच हैं, जिसके आधार पर सरकारें अपनी चहेती संस्थाओं को अनुदान देती रहती हैं। 
प्रदेश सरकार के संस्कृति संचालनालय की ओर से अशासकीय संस्थाओं को जो आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है, उसका लिखित उद्देश्य साहित्य एवं संस्कृति के संरक्षण और विकास का है, लेकिन दिक्कत यह है कि साहित्य और संस्कृति के नाम पर कुछ लोगों ने सरकार को खूब चूना लगाया है। पूर्ववर्ती भाजपा सरकार के हालिया 6 सालों के अनुदान को बारीकी से देखें तो साफ होता है कि संस्थाओं ने कला-संस्कृति के विकास के लिए सरकारी अनुदान लिया और इसके बाद क्रिकेट अकादमी से लेकर टीबी जागरूकता तक के काम किए। 
क्रिकेट अकादमी चलाना या टीबी जागरूकता कोई जनविरोधी काम नहीं है, लेकिन कला-संस्कृति के नाम पर खेल और स्वास्थ्य संबंधी काम करने वाली संस्थाओं को दिया गया अनुदान क्या किसी भी रूप में ठीक कहा जा सकता है? 
हालांकि इसमें उक्त संस्था के विधान की आड़ ली जा सकती है, जिनमें संभव है कि क्रिकेट अकादमी के साथ युवा खिलाडिय़ों को कविता-कहानी से रू-ब-रू कराने जैसे उपक्रम शामिल हों। अस्तु।
जानकारी के मुताबिक दिलचस्प यह है भी कि इनमें से कई अनुदान प्राप्त संस्थाएं ऐसी भी हैं, जिनके विभाग के रिकॉर्ड में दर्ज पते अपने मूल स्थान पर हैं ही नहीं। यही नहीं इन संस्थाओं में से कई के अध्यक्षों के मोबाइल फोन नंबर संस्कृति विभाग की साइट पर दिख रहे हैं, वे या तो बंद हैं या चालू ही नहीं हैं। 
वैसे कहा तो यह भी जा रहा है कि कई संस्थाओं ने अनुदान तो लिया है, लेकिन बीते कार्यक्रम करने की औपचारिकता को भी पूरा नहीं किया है। 
हालांकि बाद में संस्थाओं के कामों पर सवाल खड़े हुए तो संस्कृति विभाग ने साल 2018-19 के लिए संस्थाओं को दिए जाने वाले अनुदान पर रोक लगा दी। नतीजतन पहले जहां डेढ़ सौ से लेकर 300 से अधिक संस्थाओं को अनुदान दिया गया, वह वित्त वर्ष 2018-19 में सिमटकर 53 पर आ गया। 
बाद में जुलाई 2019 में वर्ष 2019-20 के लिए अनुदान हासिल करने की इच्छुक संस्थाओं से आवेदन मांगे गए। साल 2018—19 में सरकार से 6 लाख रुपए का अनुदान प्राप्त कर चुकी संस्था के सर्वेसर्वा ने बताया कि फिलहाल निर्धारित प्रपत्र में आवेदन जमा करवाए गए हैं। लेकिन अनुदान राशि निर्गत नहीं की गई है। 
कुछ उदाहरण देखिये अनुदान की उदारता के
– पुल बोगदा के पास एक सोसायटी के ऑफिस का पता निर्माणाधीन बिल्डिंग का है। पड़ोसियों को भी नहीं पता कि यहां सोसायटी के दफ्तर और उसके काम क्या हैं।
– दिलचस्प है कि भोपाल की एक मशहूर क्रिकेट अकादमी को साहित्य एवं संस्कृति के बजट से 3.5 लाख रुपए दिए गए। इस संस्था का क्रिकेट के क्षेत्र में काफी नाम है, और इसके संचालक सम्मानित क्रिकेट कोच हैं। 
– विभागीय अधिकारी बताते हैं कि चयन में प्रथम दृष्टया संस्था का मूल उद्देश्य देखा जाता है, लेकिन यदि संस्था के संविधान में साहित्य-संस्कृति का उन्ययन शामिल है, तो तकनीकी रूप से अनुदान को गलत नहीं कहा जा सकता है। 
– इसी तरह एक संस्था को 90 हजार रुपए का आवंटन हुआ, लेकिन वह काम करती है, नशे के प्रति जागरुकता फैलाने का। 
– एक अन्य संस्था भेल क्षेत्र से संचालित है, इसे 65 हजार रुपए का आवंटन हुआ, लेकिन यह काम करती है टीबी के प्रति जागरुकता फैलाने का। 
– नार्थ टीटी नगर की एक संस्था को 25 हजार रुपए की रकम दी गई, लेकिन उसके काम के बारे में कोई जानकारी नहीं है। 
– इसी तरह चूनाभट्टी की एक संस्था को 25 हजार दिए लेकिन उसके न ऑफिस का पता है, न काम की जानकारी है।
– रेलवे कोच फैक्टरी की एक संस्था को 1 लाख रुपए दिए गए, संस्था का दावा है कि वह सांस्कृतिक कार्यक्रम करती है, लेकिन एक साल से कोई कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया। 
इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि सरकार और अधिकारियों से अगर रिश्ते अच्छे हों तो किसी भी विभाग से, किसी भी तरह का अनुदान आसानी से लिया जा सकता है। 
बीते छह सालों में कितनी संस्थाओं को मिला कितना अनुदान
– साल 2013-14 में सरकार की ओर से 311 संस्थाओं को 1 करोड़ 39 लाख 45 हजार रुपए की राशि सहायता के तौर पर उपलब्ध कराई गई। यानी हर संस्था के हिस्से में औसत करीब 45 हजार रुपए आए। 
– ठीक अगले साल यानी 2014-15 में संस्थाओं की संख्या 169 हो गई और राशि भी इसी अनुपात में घटकर रह गई 70 लाख 85 हजार रुपए। यानी हर संस्था को औसतन करीब 42 हजार रुपए दिए गए।
– साल 2015-16 में सरकार की इस सहायता योजना से लाभान्वित संस्थाओं की संख्या फिर बढ़ गई और दो साल पहले के आंकड़े के करीब यानी 308 पर पहुंच गई। इन संस्थाओं को कुल 1 करोड़ 66 लाख 30 हजार रुपए बांटे गए। यानी औसतन 54 हजार रुपए हर संस्था को। 
– इसी तरह साल 2016-17 में 259 संस्थाओं को 1 करोड़ 54 लाख 95 हजार रुपए की राशि दी गई। औसतन 60 हजार रुपए प्रति संस्था। 
– इसके अगले साल यानी साल 2017-18 में सरकार अचानक बेहद उदार हो गई और वहीं 310 संस्थाओं को कुल 3 करोड़ 59 लाख 25 हजार रुपए दिए। औसत रहा हर संस्था के हिस्से 1 लाख 16 हजार रुपए आए। 
– चुनावी वर्ष 2018-19 में सरकार ने कुल 53 संस्थाओं को 67 लाख 50 हजार रुपए की सहायता उपलब्ध कराई। यानी हर संस्था के हिस्से में आए 1 लाख 27 हजार रुपए। 
2018 में संस्थाओं के कामों पर सवाल खड़े हुए तो विभाग ने अनुदान पर रोक लगा दी। नतीजतन लाभान्विति संस्थाओं संख्या सिमटकर 53 पर आ गई।
सिर्फ इतना ही नहीं, इन संस्थाओं को दिए जाने वाली रकम में भी काफी दिलचस्प तथ्य सामने आते हैं। साल 2018-19 की ही बात करें तो कुल 67.50 लाख की राशि में से महज 26 संस्थाओं को ही 58 लाख रुपए से ज्यादा की राशि दे दी गई। इनमें से भी 12 संस्थाओं को 40 लाख 65 हजार रुपए की राशि दी गई। 
यह आंकड़े सरकार और सत्ता के इन संस्थाओं से अच्छे रिश्ते बयां करते हैं, या फिर इन संस्थाओं का साहित्य के क्षेत्र में काम काज इतना आला दर्जे का है, कहना मुश्किल हैं।

यह भी पढ़ें:  जल संकट: पानी पर कब्जे की लड़ाई

फिलहाल इतना ही

(सत्ता, समाज और संस्कृति के रिश्तों को परखते हुए नई ईबारतें भविष्य की उज्जवल तस्वीर बनाने की दिशा में भी काम कर रहा है। अगर आप नई ईबारतें के लिए कोई रचनात्मक योगदान देना चाहते हैं, तो स्वागत है। हमें किसी भी विषय पर अपनी रचना [email protected] पर मेल करें। हम यथासंभव स्थान देने की कोशिश करेंगे।)