संतुलन साधने की कला

सचिन श्रीवास्तव

कुछ मित्रों में संतुलन साधने की जबर्दस्त कला होती है। वे एक ही समय में नदी में तैर भी रहे होते हैं और स्वयं को गीला होने से भी बचा ले जाते हैं। समाज के काले, पीले, पतित चेहरों के साथ गली—गली घूम लेते हैं और क्या मजाल कि कोयले की गली से गुजरते हुए एक धब्बा उनके हिस्से आ जाए। अद्भुत कला है यह। हर किसी को नहीं आती। अपने को तो कतई नहीं। जिन्हें नहीं आती, उन्हें सीखने की सलाहों का भी अंत नहीं।

दिलचस्प है कि संतुलन की कला को साधने में माहिर मित्र अक्सर ये हिदायत देते हुए भी पाए जाते हैं कि निष्पक्ष जीवन, व्यवहार जरूरी है। यह निष्पक्षता ही उनके संतुलन की कुंजी है। वे हर जगह पाये जाएंगे लेकिन असल में किसी पक्ष में नहीं होंगे।

इस तरफ कहेंगे हम तो यही के हैं। आप चाहो तो मेरा पिछला जीवन देख लो। दूसरे पक्ष के विरोध में तो मैंने कागज में लिख रखा है कितना कुछ। ठीक यही बात वे दूसरी तरफ से भी कह सकते हैं। मजे कि बात यह कि वे दोनों जगह अपना आधा हिस्सा छुपाकर सच ही बोल रहे होते हैं। वे मित्रताओं से जीवन जीते हैं। मित्र होना कोई बुरी बात नहीं है, लेकिन दिलचस्प है कि उनके मित्रों की सूची में पुलिस वाले और चोर, चालक और भोले, नेता और जनता समान रूप से शामिल होते हैं।

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वे जनता की बात करते हैं, और नेता के साथ गलबहियां करते हैं। वे इस नेता के विरोध में उस नेता के पक्ष में खड़े हो जाते हैं और फिर वक्त आने पर दोनों से ही एक ही भाव से सहज दूरी या फिर करीबी निकाल लेते हैं।

ये संतुलित लोग हर जगह पाए जाते हैं। क्या साहित्य, क्या कला, क्या पत्रका​रिता, क्या आंदोलन और क्या जीवन! आप थोड़ा सी आंख लगाएंगे तो दिख जाएंगे।

देखिये अपने आसपास संतुलन को साधने में माहिर लोगों को। उनके कोई विरोधी नहीं होते हैं। वे दो दूर के छोरों पर खड़े विरोधियों के बीच संतुलन साधते हुए इस इंतजार में खड़े होते हैं, कि जो खेत होगा, हम उसके करीब हों लेंगे। तब तक वे निश्चित दूरी पर होते हैं।

आदमी के लिए संतुलन का गणित जानना बहुत जरूरी है ​लेकिन जो अपनी गृहस्थी के आटे दाल का गणित ठीक से संतुलित नहीं कर पाते हैं, वे भला क्या जानें के संतुलन क्या होता है। वे बेवकूफ जीवन भर किसी पक्ष में खड़े होकर अपनी जवानी और कई बार तो अधेड़ावस्था तक बर्बाद कर लेते है।

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चतुर सुजान तो वही हैं, जो 30 की वय के पहले संतुलन को साधना सीध जाएं हालांकि इन दिनों खबर है कि 70 के पार वाले भी धैर्य पूर्वक सीखी संतुलन की कला के जरिये जीवन को सुखमय करने की राह पर हैं। यानी कुछ ने जल्दबाजी में सीखकर संतुलन को अब उच्चतम उंचाई दी है, तो कुछ ने देर से ही सही लेकिन पूरी तैयारी से संतुलन का निवाह किया है।

लेकिन
प्रिय मित्रो, संतुलन की इस राह पर जरा बचकर चलना। दिक्कत यही है कि संतुलन के लिए हर वक्त जगह बदलनी होती है। पैर एक जगह जमीन पर स्थिर रखना, संतुलन के कलाबाजों के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। फिर इस नित नई बदलती व्यवस्था में भारी होते पलड़े को भांपने में की गई जरा सी चूक किस खाई में फेंकेगी, इसे आप जान ही रहे हैं।

कृष्ण बिहारी ‘नूर’ के शब्दों में कहें तो—
सच घटे या बड़े तो सच न रहे
झूठ की कोई इंतेहा ही नहीं