पीवीवी लक्ष्मी: पति के सपने को संवारती एक राष्ट्रीय चैंपियन शटलर

23 अगस्त 2016 के राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित

सचिन श्रीवास्तव 

हर सफलता के पीछे कड़ी मेहनत, लगन और कभी न हारने का जज्बा होता है। पीवी सिंधू के ओलंपिक रजत की चमक के पीछे पुलेला गोपीचंद की अनथक मेहनत को दुनिया ने थोड़ा-बहुत सराहा है, लेकिन यह बात लगभग भुला दी गई है कि बतौर कोच पुलेला गोपीचंद की अकादमी से दो ओलंपिक पदक विजेता खिलाड़ी निकले हैं, तो इसके पीछे गोपीचंद की पत्नी पीवीवी लक्ष्मी की खामोशी मेहनत है। जो खुद भी राष्ट्रीय स्तर की शटलर रही हैं।

बात 1996 की है। अटलांटा ओलंपिक के भारतीय दल में एक लड़की बैडमिंटन टीम का हिस्सा थी। यह पीवीवी लक्ष्मी थीं, जो अविभाजित आंध्र प्रदेश की ओर से ओलंपिक में जाने वाली पहली महिला थीं। हालांकि उन्होंने कभी ओलंपिक के बारे में नहीं सोचा था। लक्ष्मी बताती हैं कि उस वक्त तक नेशनल चैंपियन कर्नाटक और महाराष्ट्र से होते थे, और उनका लक्ष्य नेशनल चैंपियनशिप जीतना ही था। सिंधू की जीत के बारे में लक्ष्मी कहती हैं, सिंधू भाग्यशाली हैं कि उन्हें वह व्यक्ति कोच के रूप में मिला जो मुझे नहीं मिल सका। यानी मेरा पति। हालांकि सिंधू की खुद की मेहनत भी मायने रखती है। बीते 4-5 महीने में सिंधू में गजब का बदलाव आया था। वह विजेता है।
दो बच्चे और पति को संभालती नेशनल चैंपियन
लक्ष्मी बताती हैं कि पुलेला गोपीचंद सुबह चार बजे अपनी अकादमी जाते हैं। जहां वे 10 से 30 साल तक की उम्र के लोगों को प्रशिक्षण देते हैं। बीच में दो घंटे और कभी कभी तो महज एक घंटे के लिए लंच के लिए आते हैं और इसके बाद शाम सात बजे घर लौटते हैं। आठ साल तक नेशनल चैंपियन रहीं लक्ष्मी की पूरी दिनचर्या अब उनके दो बच्चों 13 वर्षीय गायत्री, 12 वर्षीय साई विष्णु के अलावा गोपीचंद के ईर्द-गिर्द घूमती है। 
अकादमी की मुश्किलें
पुलेला गोपीचंद की अकादमी आज भले ही इस बात के लिए जानी जाती हो कि यहां से ओलंपिक मेडलिस्ट साइना नेहवाल और पीवी सिंधू ने प्रशिक्षण पाया। लेकिन अकादमी के असल हालात बेहद खराब हैं। साल में पांच महीने विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक कार्यक्रमों के कारण बैडमिंटन कोर्ट उपलब्ध नहीं होते। इसके अलावा एक बार चुनाव के दौरान बैलेट बॉक्स रखे होने के कारण भी कोर्ट नहीं मिला था। 
उपलब्धियां
मलेशिया कॉमनवेल्थ गेम्स में ब्रॉन्ज
श्रीलंका में सार्क खेलों में सिंगल्स, डबल्स और मिक्स्ड का स्वर्ण
बतौर कोच गोपी अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। हम शाम में महज एक घंटे का वक्त ही साथ गुजारते हैं। इसके अलावा गोपी अपनी अकादमी में ही व्यस्त रहते हैं। फिर भी मैं खुश हूं क्योंकि वे एक बेहतरीन कोच होने के साथ, अच्छे पति और जिम्मेदार पिता भी हैं।

पीवीवी लक्ष्मी, 

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