Prem Kumar Mani: अंगुलिमाल और अशोक की संततियां

प्रेमकुमार मणि

अंगुलिमाल की कथा बचपन में पढ़ी-सुनी थी। बुद्ध के समय का एक दुर्दांत बाहुबली, जिससे श्रावस्ती की जनता तो तबाह थी ही, वहां का शासक प्रसेनजित भी चिंतित था। उन दिनों बाहुबलियों को डाकू कहा जाता था, आज डाकुओं को बाहुबली कहने का प्रचलन है। अंगुलिमाल के बारे में अनेक कथाएं हैं, लेकिन केंद्रीय कथा है, बुद्ध से अंगुलिमाल की भिड़ंत। प्रसंग है कि प्रसेनजीत के आग्रह पर बुद्ध ने अंगुलिमाल से संवाद करने का निश्चय किया। प्रसेनजित राजा था और उसके पास सेना थी, लेकिन वह अंगुलिमाल पर काबू पाने में स्वयं को असमर्थ पा रहे थे।

अंगुलिमाल जंगलों में रहता था। कभी-कभार बाहर निकलता और लोगों को मारकर अपना ‘शौक’ पूरा करता। जंगलों में यदि कोई आदमी पहुंच गया, तब तो मानों वह उसके इलाके में ही आ जाता था। उन्हें तो बचना मुश्किल होता था। उसका यह भी शौक था कि वह मारे हुए लोगों की एक उंगली काट कर अपनी माला में जोड़ लेता। कथा के अनुसार इसी कारण उसका नाम अंगुलिमाल हो गया था। इस नाम के सामने उसके बचपन के नाम का क्या महत्व हो सकता था भला।

बुद्ध ने उसे बुलाया नहीं। (यूँ भी किसी के बुलावे पर आना उसके स्वभाव में शामिल नहीं था। दबंग-बाहुबलियों का अपना चरित्र भी तो होता है।) वह स्वयं उससे मिलने उसके इलाके, यानी जंगल में गए। वह भी अकेले। बुद्ध की अपनी धज थी और अंगुलिमाल की अपनी। कथा है, बुद्ध को देखते ही अंगुलिमाल ने अपनी तेज-कर्कश आवाज में उन्हें रुक जाने का आदेश दिया। बुद्ध रुक गए। उनके पास तेज आवाज नहीं थी, इसलिए उन्होंने अंगुलिमाल के नजदीक आने का इंतजार किया। जब वह नजदीक आया तब बुद्ध ने अपनी सौम्य आवाज में कहा, “अंगुलिमाल, मैं तो रुक गया। तुम कब रुकोगे?”

अंगुलिमाल डाकू था, लेकिन मूलतः वह आदमी ही था। डाकू तो उसने स्वयं को बना डाला था। उसे आश्चर्य हुआ कि उसके नजदीक आने वालों की तो घिग्घी बंध जाती थी। यह तो कुछ अजूबा इंसान है। बिलकुल नहीं डर रहा है। फिर बुद्ध ने कुछ बातें कहीं। क्या कही होंगी इसका अनुमान मुश्किल नहीं है। यही कहा होगा कि संसार में तो यूँ ही इतनी सारी मुसीबत है, दुःख है। तुम अपनी तरफ से इसे और दुखी क्यों कर रहे हो। कथा सार यही है कि अंगुलिमाल का ह्रदय परिवर्तन हुआ और उसने अपनी हरकतें छोड़ दीं। वह बुद्ध का अनुयायी हो गया।

ह्रदय परिवर्तन की एक कथा बुद्ध के अवसान के कुछ सौ साल बाद की है। मगध साम्राज्य के शासक अशोक, जो आदतन हिंसा प्रिय था, का हिंसा से जी ऊब गया। वह क्रूर प्रवृत्ति का था। उसने अपने ही सभी भाइयों की हत्या कर दी थी और इतिहास के अनुसार कलिंग युद्ध में लाख से अधिक लोगों को मारा था। अशोक के ज़माने में बुद्ध नहीं थे, लेकिन उनके विचार और अनुयायी भिक्षु थे। अशोक ने एक रोज अचानक बुद्ध के धम्म की शरण में जाने का निश्चय किया।

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अंगुलिमाल और अशोक के स्वभाव और चरित्र में साम्य था, लेकिन ओहदे की भिन्नता थी। अंगुलिमाल डाकू था और अशोक राजा। अंगुलिमाल ने अपना डाकूपना छोड़ दिया, लेकिन अशोक राजा बना रहा। खजाने के धन से उसने स्तम्भ बनवाये और उस पर स्वयं को प्रियदर्शी और देवताओं का प्रिय के रूप में रखा। मुझे अशोक में ह्रदय परिवर्तन कम, काइयांपन अधिक दिखता है। उसने खजाने को अपनी सनक पूरी करने में झोंक दिया। अपने बेटे-बेटियों को तो धर्मप्रचारक बना यत्र-तत्र भेजा, लेकिन वह स्वयं बार-बार विवाह करता रहा। उसका दादा चन्द्रगुप्त तेईस वर्ष तक शासन करने के बाद स्वतः गद्दी छोड़कर सन्यासी हो गया था, लेकिन अशोक सर पर बौद्ध धर्म की गठरी रखे आखिर क्षण तक शासन में बना रहा। ऐतिहासिक साक्ष्य बताते हैं कि उसकी मृत्यु के चार साल बाद तक मगध का सत्ता संघर्ष चलता रहा और अंततः मौर्य साम्राज्य तीन हिस्सों में विभाजित हो गया, जिसे बहुत मुश्किल से महापद्म नन्द और चन्द्रगुप्त ने अपने प्रयासों से समृद्ध किया था।

मुझे प्राचीन इतिहास के अशोक और मध्यकालीन मुगल बादशाह औरंगजेब में कुछ समानता दिखती है। दोनों सामान रूप से झक्की, धर्मध्वजी और सत्ताचिपकू थे। व्यक्तिगत रूप से दोनों सादगी पसंद थे। औरंगजेब की कब्र एक आमआदमी की कब्र की तरह महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास खुल्दाबाद में सड़क किनारे अवस्थित है। अशोक अपने ही स्थापित अनगिनत लाटों से आज भी उझकने की कोशिश करता है। उन्नीसवीं सदी के आरंभ में जब यूरोपियन इतिहासकारों को अशोक के बारे में जानकारी मिली, तब उन्हें वह महत्वपूर्ण लगा। अब जब उसके चरित्र की मीमांसा हो रही है, तब वह सनकी अधिक प्रतीत होता है।

मैंने अंगुलिमाल से बात आरम्भ की थी। अंगुलिमाल और अशोक दोनों बौद्ध हुए, लेकिन इन दोनों में कौन अधिक महत्वपूर्ण है चिन्हित करने के लिए कहा जाएगा तो मैं बिना किसी द्वंद्व के अंगुलिमाल को चुनूंगा। अंगुलिमाल का पूरी तरह रूपांतरण होता है। वह अपना मूल पेशा, मूल चरित्र त्याग देता है। वह डाकू अथवा बाहुबली से एक धार्मिक व्यक्ति बनता है। एक संवेदनशील मनुष्य बनने की कोशिश करता है। वह अपने पिछले अपराधों को छुपाता नहीं। वह स्वयं को प्रियदर्शी और देवानाम प्रिय घोषित नहीं करता। उसे इस बात की कोई चिंता नहीं कि लोग उसे अभी तक डाकू ही क्यों कहते हैं। उसे आत्मविज्ञापन की कभी कोई अभिलाषा नहीं रही। खरे सोने की तरह उसका चरित्र देखा जा सकता है।

अंगुलिमाल और अशोक की परंपरा आज भी देखी जा सकती है। 1970 के दशक में समाजवादी-सर्वोदयी नेता जयप्रकाश नारायण के समक्ष चंबल के डाकू माधो सिंह ने आत्मसमर्पण किया और अपनी डाकूगिरि का परित्याग कर एकांत जीवन जीने का निश्चय किया। डाकू माधो दुर्दांत था। तीन प्रदेशों की पुलिस उससे खौफ खाती थी। वह स्वयं जेपी के पास पहुंचा। उसने अनुभव कर लिया होगा कि अपराध की दुनिया लंबे समय तक नहीं चलती। कहते हैं, वह तीन रोज तक पटना में डेरा डाले रहा। वह स्वयं को रामसिंह ठेकेदार बता रहा था और जेपी से अनुरोध कर रहा था कि वह माधो सिंह से मिलना स्वीकार लें। जेपी ने जब तीसरे रोज भी इंकार किया तब रामसिंह ने कहा- वह स्वयं माधो सिंह है और आत्मसमर्पण करना चाहता है। जेपी ने उसे सभी साथियों के साथ आत्मसमर्पण का प्रस्ताव किया, जिसे उसने स्वीकार लिया। साढ़े पांच सौ डाकुओं के साथ जेपी के समक्ष उसने आत्मसमर्पण किया। उसने स्वयं को बदलने का संकल्प लिया और बिना विज्ञापन किए अपने को पूरी तरह समेट लिया।

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अंगुलिमाल और माधो सिंह यदि स्वयं को किसी प्रभाव में आकर प्रायश्चित करते और बदलते हैं तो यह निश्चय ही स्वागतयोग्य है, लेकिन अपराधियों का एक दूसरा तबका भी है, जो अपने को राजनीति, धर्म और व्यापार में शिफ्ट करता है। इस श्रेणी के लोग आतंक सृजित करते हैं, खौफ का वातावरण उन्हें डॉन बनाता है। इसकी आड़ में वह एक आर्थिक सत्ता भी स्थापित करता है। लूट, अपहरण, रंगदारी का जो धंधा बनता है, उसमें सैकड़ों लोग शामिल होते हैं। ये लोग डॉन के फ़ौज-फाटे होते हैं। किसी रोज यह डॉन चुनावी राजनीति का हिस्सा बनने की कोशिश करने लगता है। लूट-अपहरण करने वाला इसकी फ़ौज-फाटा अचानक से राजनीतिक सक्रियता में जुट जाता है। धर्म और जाति का सहारा लेकर इनकी महत्वाकांक्षाएं अमरबेल की तरह फैलने लगती हैं। किसी रोज किसी स्थापित राजनीतिक पार्टी का हिस्सा बन कर ये अपनी ताकत बढ़ाते हैं और राजनीति में एक नए बाहुबली का अवतरण हो जाता है। यह नया राजनेता डॉन आपदाकाल में रिलीफ सामग्रियां वितरित करता है। अशोक स्तम्भ की जगह बड़े-बड़े होर्डिंग लगाता है। पालतू पत्रकारों के बल पर अपनी छवि सुथरी करवाता है। उसकी आकांक्षा यही होती है कि उसे अशोक की तरह प्रियदर्शी स्वीकार लिया जाए। अशोक की ये संततियां यह आभास करना चाहती हैं कि लोककल्याण के लिए हमने जनतंत्र का यह बाना स्वीकार किया है। मुझे देव रूप में स्वीकार करो, वरना मुझे एकबार फिर पुरानी दुनिया में लौटना मुश्किल नहीं है। खौफ के इस वातावरण में एक देवत्व विकसित होने की इनकी आकांक्षा कोई भी देख सकता है।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कुछ विवेकवान लोग भी इस मकड़जाल में झूलते दिखते हैं। उन्हें इस पर कोई शर्म भी नहीं आती है, जिनके हाथ सैंकड़ों के खून से लथपथ हैं, उनके साथ खुद को खड़ा करने में ये यदि असहज नहीं होते, तो इसे क्या कहा जाय!

[प्रेमकुमार मणि हिंदी के चर्चित कथाकार व चिंतक हैं। दिनमान से पत्रकारिता की शुरुआत। अब तक पांच कहानी संकलन, एक उपन्यास और पांच निबंध संकलन प्रकाशित। उनके निबंधों ने हिंदी में अनेक नए विमर्शों को जन्म दिया है तथा पहले जारी कई विमर्शों को नए आयाम दिए हैं। बिहार विधान परिषद् के सदस्य भी रहे।