Russia Ukraine Conflict : हथियारों के धंधे की खातिर लड़ा जाता युद्ध

Russia Ukraine Conflict

Russia Ukraine Conflictसंदीप पाण्डेय व माधुरी प्रवीण

(Russia Ukraine Conflict : भले ही गरम पानी के समुद्री रास्ते की रूस की जरूरत, यूक्रेन के ‘नाटो’ में जाने, ना जाने देने की जिद और अमेरीका-रूस की पारंपरिक दुश्मनी रूस-यूक्रेन के मौजूदा युद्ध (Russia Ukraine conflict) की वजहें हों, लेकिन ध्यान से देखें तो इसके पीछे हथियारों के सौदागरों की मौजूदगी साफ दिखाई देती है। पिछले डेढ़ हफ्ते से जारी इस युद्ध ने दूसरे दौर के ‘शीतयुद्ध’ और नतीजे में हथियारों के धंधे की पृष्ठभूमि रच दी है। क्या होगा भारत सरीखे देशों पर इसका असर? क्या हम अपनी पुरानी गलतियों से कोई सीख ले पाएंगे? प्रस्तुत है, इन बातों पर प्रकाश डालता सोशलिस्ट पार्टी (इंडिया) के महासचिव संदीप पाण्‍डेय और अध्यापिका माधुरी प्रवीण का यह लेख। –संविधान लाइव)

रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia Ukraine conflict) के दो पक्ष सुनने को मिल रहे हैं। एक तो रूस को अक्रांता मानकर तुरंत उससे युद्ध रोकने को कह रहा है। दूसरा, अमेरीका की विदेश नीति को इस युद्ध का कारण मानता है 1991 में ‘शीत-युद्ध’ समाप्ति के बाद सोवियत संघ के विघटन से निकले कई देशों को अमेरीका ने ‘उत्तर अटलांटिक संधि संगठन’ (नाटो) में शामिल कर रूस को उकसाया। यूक्रेन के ‘नाटो’ में शामिल होने की सम्भावना से रूस असुरक्षित महसूस कर रहा था जो वर्तमान युद्ध (Russia Ukraine conflict) का कारण बना। यह रोचक तथ्य है कि सोवियत संघ के विघटन के समय उसके पास जो 35,000 नाभिकीय शस्त्र थे, वे चार देशों के हिस्से में आए – रूस, यूक्रेन, कजाकस्तान व बेलारूस। इनमें से रूस को छोड़कर शेष ने कह दिया कि उन्हें नाभिकीय शस्त्रों की जरूरत नहीं है और उन्होंने अपने शस्त्र रूस को सौंप दिए। यूक्रेन ने जरूर इसके बदले में अपनी सुरक्षा की गारंटी मांगी और अमरीका व इंग्लैण्ड की मध्यस्थता से रूस व यूक्रेन में एक समझौता हुआ। अमेरीका ने यूक्रेन के नाभिकीय शस्त्र खत्म करने में भी मदद की। अमरीका व रूस ने खुद संधियों के तहत अपने नाभिकीय शस्त्रों की संख्या घटाई।

यह उस समय के माहौल को दर्शाता है। ‘शीत युद्ध’ की समाप्ति पर सोवियत संघ से निकले राष्ट्रों को नहीं लग रहा था कि निकट भविष्य में उन्हें कोई युद्ध करना पड़ेगा और इसलिए वे अपने शस्त्र त्यागने को तैयार थे। यूक्रेन को लगा कि शस्त्र त्यागने के बदले उसे अपनी सुरक्षा की गारंटी मिलेगी।

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अमेरीका व रूस अभी भी 5-6000 नाभिकीय शस्त्र रखे हुए हैं, जो कुल मिलाकर दुनिया के 90 प्रतिशत नाभिकीय शस्त्र हैं, जबकि ‘शीत युद्ध’ की समाप्ति पर इतने शस्त्र रखने का औचित्य नहीं है। इसकी वजह से स्थाई शांति की सम्भावना नहीं बची है। ‘संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद’ के पांच स्थाई सदस्य, जिनके पास नाभिकीय शस्त्र हैं और जिन्होंने अपने शस्त्र समाप्त नहीं किए हैं, अन्य राष्ट्रों से अपेक्षा करते हैं कि वे ‘व्यापक परीक्षण निषेध संधि’ व ‘परमाणु अप्रसार संधि’ पर हस्ताक्षर कर नाभिकीय शस्त्र बनाने का अपना अधिकार त्याग दें। इजराइल, भारत, पाकिस्तान, दक्षिण-कोरिया व ईरान ने इसके विरोध में नाभिकीय शस्त्र बना लिए हैं अथवा बनाने की क्षमता रखते हैं।

दुनिया की एकमात्र महाशक्ति बने रहने की अमेरिका की महत्वाकांक्षा व ‘सुरक्षा परिषद’ के स्थाई सदस्यों द्वारा अपने नाभिकीय शस्त्र व महाविनाश के अन्य शस्त्र न त्यागने के निर्णय की वजह से समय-समय पर दुनिया में कहीं-न-कहीं युद्ध होते रहना अपरिहार्य है, ताकि अमेरीका का हथियार उद्योग, जो उसकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, पोषित होता रहे।

राजीव गांधी भारत के आखिरी प्रधानमंत्री थे जिन्होंने ‘संयुक्त राष्ट्र महासभा’ में ‘सुरक्षा परिषद’ के स्थाई सदस्यों को अपने-अपने नाभिकीय शस्त्र, एक समय-सीमा में समाप्त करने की अपील की थी, किंतु यह विश्वास हो जाने के बाद कि दुनिया की महाशक्तियां इस बारे में गम्भीर नहीं हैं, भारत सरकार ने अपने नाभिकीय शस्त्र बनाने का फैसला लिया। इंदिरा गांधी दो दशक पहले ही नाभिकीय शस्त्रों का परीक्षण कर चुकी थीं।

नव-उदारवादी आर्थिक नीतियां लागू हो जाने के बाद से भारत धीरे-धीरे ‘गुट निरपेक्ष आंदोलन’ से दूर होता गया और अमेरीका के करीब आता गया। यदि आज भारत ‘गुट निरपेक्ष आंदोलन’ में एक महतवपूर्ण भूमिका में होता तो उसे इस दुविधा का सामना न करना पड़ता, जिसमें वह एक तरफ रूस की आलोचना करने से बच रहा है तो दूसरी तरफ यूक्रेन का साथ न देने पर अमरीका को नाराज करने का खतरा उठा रहा है।

पारम्परिक रूप से भारत ने किसी भी संघर्ष में हमेशा कमजोर का साथ दिया है। महात्मा गांधी ने अरब भूमि पर जबरदस्ती इजराइल देश बनाए जाने व दक्षिण-अफ्रीका में ‘रंग भेद नीति’ का विरोध किया था। भारत ने दलाई लामा को शरण दी, तिब्बतियों को भारत में अपनी निर्वासित सरकार बनाने की छूट दी तथा पाकिस्तान में बंगाली राष्ट्रवाद का साथ दिया।

आज दुनिया में कोई नैतिक आवाज नहीं बची है। ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ को पहले अमरीका, इंग्लैण्ड व चीन और अब रूस ने अपनी वीटो शक्ति, जो सिर्फ ‘सुरक्षा परिषद’ के स्थाई सदस्यों के पास है, के जरिए अप्रासंगिक बना दिया है। ये महाशक्तियां दुनिया के अन्य राष्ट्रों की सामूहिक राय के बारे में कोई चिंता नहीं करतीं। यदि ‘संयुक्त राष्ट्र,’ खासकर ‘सुरक्षा परिषद’ का लोकतांत्रिकीकरण नहीं हुआ तो दुनिया के देशों की सामूहिक राय युद्धों को समाप्त कराने के लिए दबाव बना पाने में कारगर नहीं होगी।

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यदि भारत महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत को मानता, जिसकी पूरी दुनिया में कद्र होती है और जो दुनिया के शोषित लोगों के लिए प्रेरणा स्रोत है, तो आज ऐसी स्थिति नहीं आती कि हम वर्तमान युद्ध में अक्रांता रूस के पक्ष में खड़े दिखाई पड़ रहे हैं। यदि हमने ‘गुट निर्पेक्ष आंदोलन’ को मजबूत बनाए रखा होता और दुनिया के बहुसंख्यक देशों का ऐसा समूह होता जो महाशक्तियों पर दबाव बनाने की स्थिति में होता तो आज दुनिया गुणात्मक रूप से भिन्न होती। इसके बजाए भारत अपना अहित करने वाले रास्ते पर चलकर ‘सुरक्षा परिषद’ का स्थाई सदस्य बनना चाहता है और यह समझ में आने पर कि वह ‘जी 8’ जैसे समूह में शामिल नहीं हो सकता, उसने ‘ब्रिक्स’ व ‘क्वाड’ जैसे समूहों का हिस्सा बनना तय किया है, ताकि उसकी गिनती यदि दुनिया के पहले नहीं तो दूसरे नम्बर के देशों में हो।

हमें यूक्रेन में फंसे सिर्फ भारतीय छात्रों की ही चिंता नहीं होनी चाहिए, जिन पर इस समय हमारा सारा ध्यान केंद्रित है। यूक्रेन में ऐसे लोग भी हैं जिन्हें वहां से भागने का विकल्प नहीं है। उनकी जिंदगी तबाह हो गई है और उनका भविष्य अनिश्चित है। कड़ाके की ठण्ड में अचानक बिना घर के हो जाना बड़ी पीड़ादायक स्थिति है। धीरे-धीरे खाने-पीने की सामग्री भी समाप्त हो रही है। वहां फंसी हुई जनता में छोटे बच्चे व बूढ़े लोग भी हैं।

यह एक मानवीय संकट है। हमें यूक्रेन के साथ मजबूती से खड़ा होना होगा और रूस पर दबाव बनाना होगा कि वह युद्ध तुरंत समाप्त करे। युद्ध का परिणाम सिर्फ हिंसा व लाचारी ही होता है। इसे किसी भी नाम पर जायज नहीं ठहराया जा सकता। दुनिया की महाशक्तियों की नकल करने के बजाए बेहतर होगा यदि हम एक स्वतंत्र रास्ता चुनें व एक शस्त्र-मुक्त दुनिया की कल्पना को साकार करें। सिर्फ एक शस्त्र व सेना मुक्त दुनिया में ही स्थाई शांति व राष्ट्रों के बीच मित्रता सम्भव है।

(सर्वोदय प्रेस सर्विस से साभार)