Indian Constitution: भारतीय संविधान का इतिहास, अनुच्छेद, अनुसूचियां और मूल विशेषताएं

भारत का संविधान (Indian Constitution) हमारे देश का वह सर्वोच्च विधान है, जिसे संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को पारित किया और यह 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। इसीलिए 26 नवंबर को भारत में संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है और 26 जनवरी का दिन गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत के संविधान (Indian Constitution) का मूल आधार भारत सरकार अधिनियम 1935 को माना जाता है। हमारा संविधान (Indian Constitution) दुनिया के किसी भी अन्य लोकतांत्रिक गणतांत्रिक देश के संविधान से बड़ा और सबसे लंबा लिखित संविधान है। यह सभी बातें आमतौर पर हर साल कुछ खास मौकों से लेकर संविधान के बारे में शुरुआती बातचीत करते हुए कहीं भी दोहराई जाती हैं, लेकिन क्या यही हमारे संविधान की खासियत है, या वह कुछ और भी है? क्या कुछ तारीखें, कुछ अनुच्छेद और कुछ नियम कायदे ही संविधान हैं? आखिर संविधान है क्या और यह हम यानी नागरिकों के लिए क्यों जरूरी है? क्या संविधान में कोई खामी नहीं है? क्या हमारे बुजुर्गों ने जो संविधान हमें सौंपा था वह आज भी वैसा ही है? आइये जानते हैं संविधान से जुड़े कुछ ऐसे ही सवालों के जवाब..

संविधान को जानने की प्रक्रिया की यह पहली कड़ी, जिसमें हम बात करेंगे संविधान बनने की प्र​क्रिया और इसके मूल ढांचे, अनुच्छेदों, अनुसूची और खासियतों पर..

संविधान सभा और संविधान (Indian Constitution) का संक्षिप्त इतिहास

Indian Constitution
तारीख:26 नवम्बर 1949। स्थान: संविधान सभा। संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद को भारतीय संविधान सौंपते हुए डॉ बीआर अंबेडकर।

आपने शायद एक तस्वीर देखी होगी, जिसमें डॉ भीमराव अंबेडकर अपने हाथों में संविधान की एक प्रति लिए हुए हैं और वह डॉ राजेन्द्र प्रसाद को सौंप रहे हैं। यह तस्वीर 26 नवंबर 1949 की है। उस वक्त डॉ राजेंद्र प्रसाद भारत की संविधान सभा के अध्यक्ष थे और डॉ अंबेडकर संविधान सभा की मसौदा लेखन समिति के अध्यक्ष। इसीलिए कहा जाता है कि डॉ अंबेडकर ने हमारा संविधान (Indian Constitution) बनाया। हालांकि बनाया तो संविधान सभा के सभी सदस्यों ने, लेकिन उसे लिखने और सभी तर्कों के बाद मानी गई बातों को सिलसिलेवार ढंग से लिखने का काम डॉ अंबेडकर ने किया। एक तरह से कहा जाए कि उन करीब तीन सालों में जब संविधान (Indian Constitution) का निर्माण हो रहा था, डॉ अंबेडकर सिर्फ यही एक काम कर रहे थे। संविधान सभा के बाकी सदस्य जहां समितियों और सभा की बैठकों में राय मशविरा करते थे अन्य कामों में जुट जाते थे, लेकिन डॉ अंबेडकर सिर्फ और सिर्फ संविधान पर ही काम कर रहे थे। देश और दुनिया के अन्य संविधानों, नियमों, प्रावधानों का अध्ययन और संविधान सभा की दलीलों को पढ़—समझकर वे एक एक बारीकी पर नजर रखे हुए थे।

बहरहाल, इसके पहले हम भारतीय संविधान सभा के बारे में कुछ जरूरी बातें जान लेते हैं। संविधान सभा के चुनाव जुलाई 1946 में हुए थे और इसकी पहली बैठक दिसंबर 1946 में हुई थी। इसके तुरंत बाद ही देश दो हिस्सों यानी भारत और पाकिस्तान में बंट गया। इसी के साथ संविधान सभा भी दो हिस्सो में बंट गई। एक भारत की संविधान सभा और दूसरी पाकिस्तान की संविधान सभा। इस बंटवारे और संविधान सभा की और जानकारियों को आप इस लिंक पर जाकर देख पढ़ सकते हैं। भारतीय संविधान को लिखने वाली जो संविधान सभा थी उसमें 299 सदस्य थे। इसके अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे। संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को अपना काम पूरा कर लिया और 26 जनवरी 1950 को हमारा संविधान लागू हुआ। इसी दिन की याद में हम हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाते हैं।

हालांकि संविधान (Indian Constitution) बनने की बातचीत दूसरे विश्वयुद्ध के खत्म होते ही शुरू हो गई थी। जुलाई 1945 में ब्रिटेन ने भारत संबंधी अपनी नई नीति की घोषणा की और भारत की संविधान सभा के निर्माण के लिए एक कैबिनेट मिशन भारत भेजा। इसमें 3 मंत्री थे। इसी कैबिनेट मिशन के समक्ष पहली बार ​मोहम्मद अली जिन्हा और कांग्रेस खासकर जवाहर लाल नेहरू के बीच की तल्खी बढ़ती चली गई, जो आखिरकार देश के बंटवारे के रूप से सामने आई। 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी के बाद संविधान सभा की घोषणा हुई। हालांकि इस संविधान सभा ने अपना कामकाज 9 दिसंबर 1947 से शुरू किया। संविधान सभा के सदस्य भारत के उस वक्त के विभिन्न राज्यों की सभाओं के निर्वाचित सदस्यों की ओर से चुने गए थे। जवाहरलाल नेहरू, डॉ भीमराव अंबेडकर, डॉ राजेंद्र प्रसाद, सरदार वल्लभ भाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आजाद आदि इस सभा के प्रमुख सदस्य थे। संविधान सभा ने 2 साल, 11 महीने, 18 दिन में कुल 114 दिन चर्चा की और कुल 12 अधिवेशन किए। अंतिम दिन 184 सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर किए और संविधान बनने में 166 दिन बैठक की गई। इसकी बैठकों में प्रेस और जनता को भाग लेने की आजादी थी।

भारत के संविधान (Indian Constitution) के निर्माण में संविधान सभा के सभी 389 सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि इनमें से 90 सदस्य बंटवारे के बाद पाकिस्तान की संविधान सभा में चले गए थे। इस संविधान पर सर्वाधिक प्रभाव भारत शासन अधिनियम 1935 का है। हमारे संविधान (Indian Constitution) के लगभग 250 अनुच्छेद इस अधिनियम से लिए गए हैं।

भारतीय संविधान (Indian Constitution) का ढांचा

मौजूदा समय में भारतीय संविधान के पांच प्रमुख हिस्से हैं। इसमें एक उद्देशिका, 25 भागों में कुल 470 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियां, 5 अनुलग्नक यानी appendices और 105 संशोधन शामिल हैं। हालांकि अब तक 127 संविधान संशोधन विधेयक संसद में लाये गये हैं। इनमें से 105 विधेयक पारित होकर संविधान संशोधन अधिनियम का रूप ले चुके हैं।

भारतीय संविधान (Indian Constitution) में मूल रूप से 395 अनुच्छेद हैं, लेकिन इनके उपबंधों को मिलाएं तो अनुच्छेदों की संख्या 470 है। यह 25 भागों में है। निर्माण के समय यानी 26 नवंबर 1949 को मूल संविधान में सिर्फ 8 अनुसूचियां थीं, जो अब 12 हो गई हैं।

हमारे संविधान (Indian Constitution) में सरकार के संसदीय स्‍वरूप की सोच अपनाई गई है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो यह संघीय व्यवस्था है। केंद्रीय कार्यपालिका यानी केंद्र का संवैधानिक प्रमुख राष्‍ट्रपति होता है और संविधान (Indian Constitution) के अनुच्छेद 79 के अनुसार, केंद्रीय संसद में राष्‍ट्रपति और दो सदन हैं। इन्हें राज्‍यों का प्रतिनिधित्व होता है। दोनों सदनों से चुनकर मंत्रिपरिषद बनती है। इस मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार राष्ट्रपति अपने कार्य करते हैं। इस तरह वास्‍तविक कार्यकारी शक्ति मंत्रिपरिषद में निहित है, जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री है। मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से निचले सदन (लोक सभा) के प्रति उत्तरदायी है।

इसी तरह हर राज्‍य में एक विधानसभा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में एक ऊपरी सदन भी है, इसे विधानपरिषद कहते हैं। हर राज्य का प्रमुख राज्यपाल होता है। राज्‍य की कार्यकारी शक्ति उसी में निहित है। राज्यों की मंत्रिपरिषद का प्रमुख मुख्‍यमंत्री होता है। यह मंत्रिपरिषद ही राज्‍यपाल को उसके काम में सलाह देती है। राज्‍य की मंत्रिपरिषद उस राज्य की विधान सभा के प्रति उत्तरदायी होती है।

संविधान के 25 भाग और उनके अनुच्छेद

जैसा कि आप जानते हैं कि भारतीय संविधान (Indian Constitution) 25 भागों में बंटा हुआ है और इसमें 395 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियां हैं। इन 25 भागों में अलग अलग विषयों पर संवैधानिक प्रावधान दिए गए हैं। ये इस तरह से हैं:—

भाग 1: इस हिस्से में “संघ और उसके क्षेत्र” के बारे में बताया गया है। यहां संघ का अर्थ भारतीय गणराज्य या हमारा देश है। इस भाग में अनुच्छेद 1 से 4 के प्रावधान हैं।

भाग 2: इस हिस्से में “नागरिकता” के बारे में बताया गया है। कौन देश का नागरिक होगा, अन्य देशों को कैसे नागरिकता दी जाएगी? इसकी मूल भावना क्या होगी? इस पर अनुच्छेद 5 से 11 तक प्रावधानों में बताया गया है।

भाग 3: यह हिस्सा “मूलभूत अधिकार” से संबंधित है। संविधान (Indian Constitution) के तीसरे भाग में अनुच्छेद 12 से 35 तक ​विभिन्न प्रावधान दिए गए हैं। इसमें समता, स्वतंत्रता, शोषण, धार्मिक स्वतंत्रता, संस्कृति, शिक्षा, संवैधानिक उपचार आदि के बारे में प्रावधान दिए गए हैं।

भाग 4: संविधान (Indian Constitution) का भाग चार “राज्य के नीति निदेशक तत्त्व” से संबंधित है और इसके अंतर्गत अनुच्छेद 36 से 51 तक के प्रावधान हैं। एक तरह से देश की सरकार को क्या करना चाहिए, क्यों करना चाहिए, सरकार के कार्यों का मूल तत्व क्या होगा, इसकी व्याख्या की गई है।

भाग 4A: संविधान (Indian Constitution) का यह हिस्सा नागरिकों के “मूल कर्तव्य” के बारे में बताता है। इसमें महज एक अनुच्छेद 51A है।

भाग 5: संविधान (Indian Constitution) का पांचवां हिस्सा केंद्र सरकार यानी “संघ” से संबंधित है। पांचवें भाग को पांच अध्यायों में बांटा गया है। इसमें पहला अध्याय कार्यपालिका से जुड़ा है, जिसमें अनुच्छेद 52 से 78 तक के प्रावधान हैं। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मंत्रीमंडल, अटॉर्नी जनरल और सरकारी कार्य के संचालन से संबंधित हैं। इसी तरह दूसरे अध्याय (अनुच्छेद 79-122) में संसद, तीसरे अध्याय (अनुच्छेद 123) में राष्ट्रपति की शक्तियों, चौथे अध्याय (अनुच्छेद 124-147) में देश की अदालतों यानी सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और पांचवें अध्याय (अनुच्छेद 148-151) में नियंत्रक महालेखापरीक्षक यानी सीएजी के बारे में प्रावधान दिए गए हैं।

भाग 6: संविधान (Indian Constitution) के छठवें भाग में “राज्य” के बारे में बताया गया है। इसमें छह ​अध्याय हैं। इसके पहले अध्याय (अनुच्छेद 152) में राज्य की परिभाषा दी गई है। दूसरे अध्याय (अनुच्छेद 153-167) में राज्यपाल, मंत्रिपरिषद, राज्य के महाधिवक्ता और सरकारी कार्य के संचालन से जुड़े प्रावधान हैं। इसी तरह तीसरे अध्याय (अनुच्छेद 168-212) में विधानमंडलों के गठन, उनके अधिकारियों, कार्य संचालन, सदस्यों चयन, हटने की विधि, विधान सभाओं की शक्तियों, विशेषाधिकारों, विधायी प्र​क्रियाओं, वित्त यानी फाइनैंस से जुड़ी प्रक्रियाओं, साधारण बैठकों आदि के बारे में प्रावधान दिए गए हैं। चौथे अध्याय (अनुच्छेद 213) में राज्यपाल की शक्तियों के बारे में बताया गया है। पांचवें अध्याय (अनुच्छेद 214-232) में राज्यों के उच्च न्यायालयों के गठन, शक्ति, न्यायधीशों के वेतन, बैठकों, संविधानिक वैधताओं आदि का वर्णन है। छठवें अध्याय (अनुच्छेद 233-237) में अन्य न्यायालायों जैसे जिला न्यायालय आदि के विषय में प्रावधान दिए गए हैं।

भाग 7: संविधान (Indian Constitution) के सातवें भाग को 1956 में किए गए सातवें संशोधन के माध्यम से लोप किया गया है यानी हटा दिए गया है। यह भाग (अनुच्छेद 238) पहली अनुसूची के भाग बी में राज्यों के प्रावधानों के आवेदन से संबंधित है। भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के संबंध में राज्य पुनर्गठन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के लिए भारतीय संविधान (Indian Constitution) में इस संशोधन की जरूरत थी। इस अनुच्छेद ने ए, बी, सी और डी श्रेणियों में राज्यों के वर्गीकरण को खत्म किया और केंद्र शासित प्रदेशों की शुरुआत की।

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भाग 8: यह भाग “संघ राज्य क्षेत्र” से संबंधित है। इसके तहत केंद्र और राज्यों में प्रशासन, राज्यों और संघ शासित क्षेत्रों में से कुछ में​ विधानमंडलों और मंत्रिपरिषदों के गठन, राज्यों के कानून बनने में राष्ट्रपति की शक्ति आदि का वर्णन अनुच्छेद 239 से 242 तक किया गया है।

भाग 9: भाग नौ “पंचायत” के कार्यों आदि के प्रावधान बताता है। इसके तहत अनुच्छेद 243 और 243क से 243ण तक के प्रावधान है। इसके तहत ग्राम सभा, पंचायत आदि के गठन, निर्वाचन, न्यायालयों के हस्तक्षेप आदि का विस्तार से वर्णन किया गया है।

भाग 9A: इस भाग में “नगरपालिकाओं” से संबंधित प्रावधान हैं। इन्हें अनुच्छेद 243त से 243यछ तक वर्णित किया गया है। इसके तहत नगरपालिया, वार्ड समिति आदि के गठन, सदस्यों आदि के कार्य, शक्तियां, वित्त आयोग, पैसे से जुड़ी समी​क्षाओं आदि का वर्णन है। नगरपालिका का नियम कहां लागू होगा, कहां नहीं होगा, कब नगरपालिका नगरनिगम बन जाएगी और कहां महानगर की योजना होगी, इस बारे में भी भाग 9ए में विस्तार से बताया गया है।

भाग 9B: यह हिस्सा सहकारी सोसाइटी से संबंधित है। इसमें सहकारी सोसायटी के ​गठन, बोर्ड के सदस्य, निर्वाचन से लेकर उनके निस्तारण, अपराध, सूचनाओं आदि तक का वर्णन है। इसे अनुच्छेद 243यज से 243यन तक वर्णित किया गया है।

भाग 10: संविधान (Indian Constitution) का भाग 10 “अनुसूचित और जनजाति क्षेत्र” के प्रशासन और प्रावधानों से जुड़ा है। इसके अनुच्छेद 244 और 244A में अनूसूचित क्षेत्र और जनजाति क्षेत्र के प्रशासन और साथ ही असम के कुछ जनजाति क्षेत्रों को जोड़कर एक अलग राज्य बनाने और उसकी विधानसभा और मंत्रिमंडल के गठन की प्र​क्रिया दी गई है।

भाग 11: यह भाग “संघ और राज्यों के बीच संबंध” को साफ करता है। इसमें तीन अध्याय हैं। पहले अध्याय (अनुच्छेद 245-255) में केंद्र और राज्य यानी संसद और विधानसभा के बीच संबंधों और शक्तियों का वर्णन किया गया है। इसमें करों के बारे में भी विशेष उपबंध हैं। दूसरे अध्याय (अनुच्छेद 256-262) में प्रशासनिक संबंधों को बताया गया है। इसमें कब केंद्र अपने राज्यों पर नियंत्रण कर सकता है और सशस्त्र बलों आदि पर प्रावधान हैं। इसके अलावा सार्वजनिक कार्य, दस्तावेज, न्यायिक कार्यवाहियों और जल, नदी विवादों के बारे में इसमें प्रावधान हैं। इसी तरह तीसरे अध्याय (अनुच्छेद 263) में अंतरराज्यीय परिषदों के बारे में जहां दो या दो से अधिक राज्यों की भूमिका होगी, पर प्रावधान दिए गए हैं।

भाग 12: इस भाग में “वित्त, संपत्ति, संविदाएं और वाद” संबंधी प्रावधान हैं। इन्हें अनुच्छेद 264 से 300A त​क बताया गया है। इसके चार अध्याय हैं। पहले अ​ध्याय “वित्त” (अनुच्छेद 264-291) में निर्वाचन, करों के लागू करने, राज्यों को अनुदान, विभिन्न व्यापारों, जूट उत्पादन, करों संबंधी विधेयकों पर राष्ट्रपति की सिफारिश, वित्त आयोग, वित्त आयोग की सिफारिशों के बारे में बताया गया है। इसी तरह दूसरे अध्याय “उधार” (अनुच्छेद 292-293) में केंद्र सरकार और राज्यों की सरकार के उधार लेने संबंधी प्रावधान हैं। तीसरे अध्याय “संपत्ति, संविदाएं, अधिकार, दायित्व, बाध्यताएं और वाद” (अनुच्छेद 294-300) में उत्तराधिकार, संपत्ति के राजसात करने, समुद्री क्षेत्र की मूल्यवान वस्तुओं, व्यापार, विवाद और कार्रवाइयों के बारे में बताया गया है। चौथे अध्याय “संपत्ति के अधिकार” (अनुच्छेद 300) में कानूनी कार्रवाई के बिना किसी व्यक्ति को संपत्ति से वंचित न करने का प्रावधान है।

भाग 13: यह भाग “भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर व्यापार, वाणिज्य और समागम” से संबंधित है। अनुच्छेद 301 से 307 के बीच देश में कहीं भी व्यापार करने की स्वतंत्रता, संसद को इसके लिए नियम बनाने की ताकत, केंद्र और राज्य सरकार के व्यापार संबंधित नियम बनाने के उपाय, राज्यों के बीच व्यापार, जैसे कई विषयों पर प्रावधान किए गए हैं।

भाग 14: इस हिस्से में “संघ और राज्यों के अधीन सेवाएँ” का वर्णन है। अनुच्छेद 308 से 323 को दो अध्यायों “सेवाएं” (अनुच्छेद 308-314) और “लोक सेवा आयोग” (अनुच्छेद 315-323) में बांटा गया है। इन दोनों अध्याय में चुनावों, केंद्र और राज्यों के कर्मचारियों, अधिकारियों की भर्ती, सेवा की शर्तों, उनका सेवाकाल रिटायरमेंट, पद से हटाने, लोकसेवा आयोग के गठन, इसके सदस्यों के कार्यकाल, उन्हें हटाने और आयोग के कार्यों आदि से संबंधित प्रावधान किए गए हैं।

भाग 14A: यह भाग “अधिकरण” (अनुच्छेद 323A – 323B) कहलाता है और इसमें विभिनन प्रशासनिक अधिकरणों और अन्य विषयों के अधिकरणों के लिए प्रावधान किए गए हैं।

भाग 15: भाग 15 में “निर्वाचन” संबंधी प्रावधान है। इसके लिए अनुच्छेद 324 से 329A तक चुनावों की प्रक्रिया, वोटर लिस्ट बनने, वयस्क मताधिकार, लोकसभा और राज्यों के चुनाव की प्रक्रिया, न्यायालय के हस्तक्षेप आदि के बारे में वर्णन किया गया है।

भाग 16: इस हिस्से में “कुछ वर्गों के लिए विशेष उपबंध संबंध” को अनुच्छेद 330 से 342 तक बताया गया है। इसके तहत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा और विधानसभा में आरक्षण, एंग्लो—इंडियन समुदाय के लिए लोकसभा और विधानसभाओं में प्रतिनिधित्व, स्थानों और विशेष प्रतिनिधित्व 70 वर्ष के बाद न करना, विभिन्न नौकरियों में आरक्षण, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति, जनजाति आयोग के गठन, सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग के बारे में प्रावधान किए गए हैं।

भाग 17: यह हिस्सा “राजभाषा” (अनुच्छेद 343- 351) से संबंधित है। इसके पहले अध्याय “संघ की भाषा” (अनुच्छेद 343-344) में केंद्र सरकार की भाषा और राजभाषा संबंधी आयोग और समितियों के​ लिए प्रावधान हैं। दूसरे अध्याय “प्रादेशिक भाषाएं” (अनुच्छेद 344-347) में राज्य और दूसरे राज्य के बीच संपर्क की भाषा, विशेष हिस्से में बोली जाने वाली भाषा आदि पर प्रावधान किए गए हैं। तीसरे अध्याय “उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों आदि की भाषा” (अनुच्छेद 348-349) में अदालतों की भाषा के प्रावधान हैं। इसी तरह चौथे अध्याय “विशेष निर्देश” (अनुच्छेद 350-351) में मातृभाषा के लिए सुविधाएं, भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकार, हिंदी भाषा के विकास के लिए निर्देश दिए गए हैं।

भाग 18: इस हिस्से को “आपात उपबंध” के नाम से जाना जाता है। इसके तहत (अनुच्छेद 352 से 360) में आपातकाल की घोषणा, उसके प्रभाव, आपातकाल में राजस्व के वितरण यानी करों से हासिल पैसे के बांटने के ​प्रावधान, बाहरी आक्रमण और घरेलू अशांति में केंद्र सरकार के दायित्व, राज्यों में संवैधानिक संकट आने पर केंद्र की भूमिका, आपातकाल में अनुच्छेद 19 यानी स्वतंत्रता के अधिकार को सीमित करने आदि से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं।

भाग 19: संविधान (Indian Constitution) के 19वें भाग को “प्रकीर्ण” या अपवाद कहते हैं। इसके तहत अनुच्छेद 361 से 367 तक राष्ट्रपति और राज्यपालों को विशेषाधिकार दिए गए हैं। इसी तरह संसद और विधानसभा कार्यवाहियों के प्रकाशन, लाभ के पदों पर उपबंध, स्वतंत्रता के समय राजा महाराजाओं के अधिकारों को सीमित करने, कुछ संधियों आदि पर विवाद में न्यायालय के हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देने, विमान क्षेत्र में कुछ नियम लागू न होने आदि से संबंधित प्रावधान दिए गए हैं। साथ ही ​इस हिस्से में विभिन्न परिभाषाएं दी गई हैं।

भाग 20: भाग 20 में “संविधान के संशोधन” (अनुच्छेद 368) से जुड़े प्रावधान दिए गए हैं। इसमें संसद को दी गई शक्ति का विस्तार से वर्णन है। साथ ही कब संशोधन को राष्ट्रपति के पास भेजने से पहले राज्यों की अनुमति आवश्यक होगी और कब न्यायालय में संशोधन को चुनौति नहीं दी जा सकेगी, इसके प्रावधान किए गए हैं।

भाग 21: संविधान (Indian Constitution) के 21वें भाग में “अस्थाई संक्रमणकालीन और विशेष उपबंध”(अनुच्छेद 369-392) दिए गए हैं। इसके तहत राज्यों की सूची के कुछ विषयों पर संसद को कानून बनाने की छूट दी गई है। साथ ही जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र, गुजरात, नागालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा, कर्नाटक आदि को इसके तहत विशेष दर्जा दिया गया है। इसके अलावा राष्ट्रपति का कानूनों को खत्म करने, न्यायालयों में लंबित कार्यवाहियों के बारे में, लोक सेवा आयोगों, राष्ट्रपति की ओर से विशेष निर्देश देने आदि के बारे में प्रावधान किए गए हैं।

भाग 22: मूल संविधान के आखिरी हिस्से में “संक्षिप्त नाम, प्रारंभ, हिन्दी में प्राधिकृत पाठ और निरसन” (अनुच्छेद 393-395) पर प्रावधान किए गए हैं। इसी के तहत संविधान (Indian Constitution) का कुछ हिस्सा 26 जनवरी के पहले लागू हो गया था। इसमें अनुच्छेद 5 से 9, 60, 324, 366, 367, 379, 380, 388, 391, 392 और 393 शामिल हैं, जो 26 नवंबर 1949 से ही प्रभावी हो गए थे। साथ ही पूर्व में लागू भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 को गैर प्रभावी कर दिया गया था।

भारतीय संविधान (Indian Constitution) की अनुसूचियां

जैसा कि पहले बताया गया है कि भारत के मूल संविधान में मूलतः आठ अनुसूचियां थीं। बाद में अलग अलग समय पर अन्य अनु​सूचियां जुड़ती गईं और अब भारतीय संविधान में बारह अनुसूचियां हैं। संविधान में नौवीं अनुसूची पहले संविधान संशोधन के साथ 1951 में, 10वीं अनुसूची 52वें संविधान संशोधन से 1985 में, 11वीं अनुसूची 73वें संविधान संशोधन से 1992 में और 12वीं अनुसूची 74वें संविधान संशोधन से 1992 में संविधान में शामिल की गई।

पहली अनुसूची: यह अनुच्छेद 1 और 4 से संबंधित है। इसमें राज्य और केंद्र शासित क्षेत्रों के सीमा क्षेत्र का वर्णन आता है। जो नए राज्य और केंद्र शासित प्रदेश बनते हैं, उन्हें इस अनुसूची में जोड़ा जाता है और वह प्रदेश या केंद्र शासित प्रदेश किस अधिनियम से बना, यह दर्ज किया जाता है।जैसे हाल ही में जम्मू और कश्मीर राज्य को तोड़कर दो केंद्र शासित प्रदेश जम्मू—कश्मीर और लद्दाख बने, तो इस अनुसूची में बदलाव किया गया।

दूसरी अनुसूची: यह अनुच्छेद 59(3), 65(3), 75(6), 97, 125, 148(3), 158(3), 164(5), 186 और 221 से संबंधित है। इसके तहत विभिन्न संवैधानिक पदों के और अन्य मुख्य पदाधिकारियों के वेतन-भत्ते तय किए जाते हैं। इसमें चार हिस्से हैं। भाग-क में राष्ट्रपति और राज्यपाल के वेतन-भत्ते, भाग-ख में लोकसभा तथा विधानसभा के अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष, राज्यसभा तथा विधान परिषद् के सभापति तथा उपसभापति के वेतन-भत्ते, भाग-ग में उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन-भत्ते और भाग-घ में भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक यानी सीएजी के वेतन-भत्ते से संबंधित प्रावधान हैं।

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तीसरी अनुसूची: यह अनुच्छेद 75(4), 99, 124(6), 148(2), 164(3), 188 और 219 से संबंधित है। इसमें विधायिका के सदस्य यानी सांसद और विधायक, केंद्र और राज्यों के मंत्री, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, न्यायाधीशों आदि के शपथ लेने के दौरान बोले जाने वाले शब्दों का प्रारूप दिया गया है।

चौथी अनुसूची: यह अनुच्छेद 4(1) और 80(2) से जुड़ी है। इसमें राज्यसभा में अलग अलग राज्यों का कितना प्रतिनिधित्व होगा यानी राज्यसभा की कितनी सीटें किन राज्यों से भरी जाएंगी, इसको लेकर प्रावधान किया गया है।

पांचवी अनुसूची: यह अनुच्छेद 244(1) से जुड़ी है। इसमें अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जन-जातियों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित निर्देश दिए गए हैं।

छठी अनुसूची: अनुच्छेद 244(2) और 275(1) से जुड़ी इस अनुसूची में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजाति क्षेत्रों के प्रशासन के विषय में प्रावधान किए गए हैं।

सातवीं अनुसूची: अनुच्छेद 246 से संबंधित इस अनुसूची में राज्य और केंद्र के बीच विषयों के बंटवारे को साफ किया गया है। इसमें तीन सूची हैं। पहली सूची में केंद्र सरकार के कार्य के विषय, दूसरी सूची में राज्य सरकार के विषय और तीसरी सूची समवर्ती सूची है, जो केंद्र और राज्य दोनों के कार्य विषयों को बताती है।

आठवीं अनुसूची: अनुच्छेद 344(1) और 351 से संबंधित यह अनुसूची देश की भाषाओं से संबंधित है। इस सूची में फिलहाल 22 भाषाएं हैं।

नवीं अनुसूची: अनुच्छेद 31 ख से जुड़ी यह सूची कुछ भूमि सुधार संबंधी अधिनियमों को कानूनी दर्जा देती है। यह पहले संविधान संशोधन (1951) के जरिये मूल संविधान में जोड़ी गई।

दसवीं अनुसूची: अनुच्छेद 102(2) और 191(2) से जुड़ी यह सूची राजनीतिकों के दल से निष्काषित होने, उनके दल बदल, दलों के विलय आदि के प्रावधान बताती है। इसे 52वें संविधान संशोधन (1985) से संविधान में जोड़ा गया।

ग्यारहवीं अनुसूची: अनुच्छेद 243 छ से जुड़ी इस अनुसूची में पंचायती राज/ जिला पंचायत संबंधी प्रावधान हैं। यह अनुसूची संविधान में 73वें संवैधानिक संशोधन (1992) के जरिये शामिल की गई।

बारहवीं अनुसूची: इसमें नगरपालिका का वर्णन किया गया है। यह अनुसूची संविधान में 74वें संवैधानिक संशोधन (1993) के जरिये जोड़ी गई।

भारतीय संविधान की आधारभूत विशेषताएं

संविधान प्रारूप समिति और सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान को संघात्मक संविधान माना है। हालांकि विशेषज्ञों में इसे लेकर विवाद है। संविधान के कई जानकार इसे ‘छद्म-संघात्मक-संविधान’ यानी ऐसा संविधान जो संघात्मक नहीं है, लेकिन ऐसा दिखता है कि यह संघात्मक है, बताते हैं। ऐसा कहने वालों अमेरिका या अमेरिकी दर्शन को मानने वाले विशेषज्ञ ज्यादा है। दूसरे धड़े का मानना है कि संविधान का संघात्मक होना उसमें निहित लक्षणों पर निर्भर करता है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इसे पूरी तरह संघात्मक माना है।

हमारे संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत एक संप्रभुतासंपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है। इन शब्दों के जरिये हम देखते हैं कि संविधान की विशेषताएं क्या हैं।

संप्रभुता: इस शब्द का अर्थ है सर्वोच्च या स्वतंत्र होना। भारत किसी भी विदेशी और आंतरिक शक्ति के नियंत्रण से पूर्णतः मुक्त संप्रभुतासंपन्न राष्ट्र है। यह सीधे लोकतंत्र के जरिये नागरिकों द्वारा चुनी गई एक मुक्त सरकार से शासित है तथा यही सरकार कानून बनाकर विधि का शासन स्थापित करती है। यानी नागरिकों के लिए बेहतर जीवन देती है।

समाजवादी: समाजवादी शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन के जरिये प्रस्तावना में जोड़ा गया। इसके जरिये हमारा संविधान अपने सभी नागरिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक समानता सुनिश्चित करता है। जाति, रंग, नस्ल, लिंग, धर्म या भाषा के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना सभी को बराबरी का दर्जा और अवसर सुनिश्चित करता है। सरकार केवल कुछ लोगों के हाथों में धन जमा होने से रोकेगी और सभी नागरिकों को एक अच्छा जीवन देने की कोशिश करेगी।

भारत ने आर्थिक तौर पर एक मिश्रित मॉडल को अपनाया है, लेकिन सरकार ने समाजवाद के लक्ष्य को हासिल करने के लिए कई कानूनों जैसे अस्पृश्यता उन्मूलन, जमींदारी अधिनियम, समान वेतन अधिनियम, बाल श्रम निषेध अधिनियम, मनरेगा, सूचना का अधिकार आदि बनाए हैं, जो इसके समाजवादी मॉडल को मजबूत करते हैं।

पंथनिरपेक्ष: पंथनिरपेक्ष शब्द संविधान के 1976 में हुए 42वें संशोधन अधिनियम के जरिये प्रस्तावना में जोड़ा गया। यह सभी धर्मों की समानता और धार्मिक सहिष्णुता सुनिश्चित करता है। संविधान कहता है कि भारत का कोई आधिकारिक धर्म नहीं है। संविधान के तहत ना तो किसी धर्म को बढ़ावा दिया जाएगा और न ही धर्म के आधार पर किसी से भेदभाव किया जाएगा। यह सभी पंथों का सम्मान और एक समान व्यवहार सुनिश्चित करता है। हर व्यक्ति को अपनी पसंद के किसी भी धर्म की उपासना, पालन और प्रचार का अधिकार है। सभी नागरिक, चाहे उनकी धार्मिक मान्यता कुछ भी हो, कानून की दृष्टि में बराबर होते हैं। सरकारी या सरकारी अनुदान प्राप्त स्कूलों में कोई धार्मिक अनुदेश लागू नहीं होता है।

लोकतांत्रिक: भारत एक स्वतंत्र देश होने के साथ लोकतांत्रिक देश भी है। इसमें समाज के सभी वर्गों की हिस्सेदारी सुनिश्चित करने के लिए मताधिकार के साथ कमजोर वर्गों को आरक्षण और सबसे कमजोर आवाजों को सुना जाने का भी स्थान है। स्थानीय निकाय चुनाव में महिला उम्मीदवारों के लिए एक निश्चित अनुपात में सीटें आरक्षित की जाती हैं। सभी चुनावों में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटें आरक्षित करने का एक विधेयक लंबित है, जिस पर लंबे समय से बहस चल रही है। इसके अलावा भारत का निर्वाचन आयोग एक स्वतंत्र संस्था है और यह स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन करने के लिए प्रतिबद्ध रहता है।

आजादी के पहले हमारे देश में भी कुछ जगहों पर राजशाही थी। इसमें वंशानुगत आधार पर राज्य के प्रमुख जीवनभर या पद छोड़ने तक शासन करते हैं, नियुक्त किया जाता है। इसके विपरीत एक गणतांत्रिक देश का प्रमुख एक निश्चित अवधि के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जनता निर्वाचित करती है। भारत के राष्ट्रपति पांच साल के लिए तो सांसद, विधायक आदि भी पांच साल के लिए ही चुने जाते हैं।

शक्ति विभाजन: यह भारतीय संविधान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण लक्षण है। राज्य की शक्तियां केंद्रीय तथा राज्य सरकारों में विभाजित होती हैं। दोनों सत्ताए एक-दूसरे के अधीन नहीं होती हैं। वे संविधान से संचालित और नियंत्रित होती हैं।

संविधान की सर्वोच्चता: संविधान के विभिन्न अनुच्छेद केंद्र और राज्य सरकारों पर समान रूप से बाध्यकारी होते हैं। केंद्र और राज्य की शक्ति विभाजित करने वाले अनुच्छेदों में अनुच्छेद 54, 55, 73, 162 और 241 शामिल हैं। भाग -5 में सर्वोच्च न्यायालय, उच्च न्यायालय, राज्य और केंद्र के बीच संबंध बताए गए हैं। इसी तरह अनुच्छेद 7 की कोई भी सूची इस शक्ति को निर्धारित करती है। राज्यों का संसद में प्रतिनिधित्व भी इस शक्ति के बंटवारे को रेखांकित करता है। इसी तरह संविधान में संशोधन की शक्ति सिर्फ संसद के पास नहीं है, उसे राज्यों की सहमति भी चाहिए।

लिखित संविधान: हमारा संविधान अनिवार्य रूप से लिखित रूप में होगा क्योंकि उसमें शक्ति विभाजन का स्पष्ट वर्णन आवश्यक है। अतः संघ में लिखित संविधान जरूरी है।

संविधान की कठोरता: इसका अर्थ है कि संविधान संशोधन में राज्य और केंद्र दोनों हिस्सेदारी करेंगे।

न्यायालयों की अधिकारिता: केंद्र और राज्य जो कानून बनाएंगे। उनकी संवैधानिक व्याख्या के लिए एक निष्पक्ष तथा स्वतंत्र लोकतांत्रिक शक्ति न्यायालय के रूप में हमारे संविधान को अधिक व्यापक बनाती है।

विधि द्वारा स्थापित: न्यायालय ही केंद्र और राज्य की शक्तियों के विभाजन पर होने वाले विवाद को सुलझाएंगे। न्यायालय संविधान के अंतिम व्याख्याकर्ता होंगे। भारत में यह सत्ता सर्वोच्च न्यायालय के पास है।

कुछ विभेदकारी विशेषताएं

1. यह केंद्र और राज्यों के परस्पर समझौते से नहीं बना है
2. राज्य अपना अलग संविधान नहीं रख सकते हैं। केवल एक ही संविधान केंद्र और राज्य दोनों पर लागू होता है
3. भारत में दोहरी नागरिकता नहीं है। केवल भारतीय नागरिकता है
4. भारतीय संविधान में आपातकाल लागू करने का प्रावधान है। अनुच्छेद 352 लागू होने पर राज्य और केन्द्र का शक्ति पृथक्करण खत्म हो जाएगा और वह एकात्मक संविधान बन जायेगा। इस स्थिति में केंद्र का राज्यों पर पूरा नियंत्रण होगा।
5. राज्यों का नाम, क्षेत्र तथा सीमा केंद्र कभी भी बदल सकता है। ऐसा बिना राज्यों की सहमति से भी किया जा सकता है। अत: राज्य भारतीय संघ के अनिवार्य घटक नहीं हैं। केंद्र सरकार संघ को पुर्ननिर्मित कर सकती है।
6. संविधान की 7वीं अनुसूची में तीन सूचियां हैं। केंद्रीय, राज्य सूची और समवर्ती सूची। इनके विषयों का वितरण केंद्र के पक्ष में है। संघीय सूची में सबसे महत्वपूर्ण विषय हैं। इस सूची पर केवल संसद का अधिकार है। राज्य सूची के विषय कम महत्वपूर्ण हैं। विशेष हालात में राज्य की सूची के विषय पर संसद कानून बना सकती है। लेकिन किसी एक भी हाल में राज्य, केंद्र के लिए कानून नहीं बना सकते हैं।
7. अनुच्छेद 155 के जरिये राज्यपालों की नियुक्ति पूर्णत: केंद्र की इच्छा से होती है। इस प्रकार केंद्र राज्यों पर नियंत्रण रख सकता है।
8. अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल की दशा में राज्यों के वित्त पर भी केंद्र का नियंत्रण हो जाता है। इस दशा में केंद्र राज्यों को धन व्यय करने हेतु निर्देश दे सकता है।
9. अनुच्छेद 256-257 में प्रशासनिक निर्देश का प्रावधान है, जिसके तहत केंद्र राज्यों को राज्यों की संचार व्यवस्था किस प्रकार लागू की जाए इसके बारे में निर्देश दे सकता है। ये निर्देश किसी भी समय दिये जा सकते हैं। राज्यों को इनका पालन करना ही होगा। यदि राज्य इन निर्देशों का पालन न करें तो राज्य में संवैधानिक तंत्र असफल होने का अनुमान लगाया जा सकता है।
10. अनुच्छेद 312 में अखिल भारतीय सेवाओं का प्रावधान है। ये नौकरशाह नियुक्ति, प्रशिक्षण, अनुशासनात्मक क्षेत्रों में पूर्णतः केंद्र के अधीन हैं, जबकि ये सेवा राज्यों में देते हैं। राज्य सरकारों का इन पर कोई नियंत्रण नहीं है।
11. एकीकृत न्यायपालिका
12. राज्यों की कार्यपालिक शक्तियां संघीय कार्यपालिक शक्तियों पर प्रभावी नहीं हो सकती हैं।