Indian Constitution : किन परिस्थितियों में संविधान में नहीं हो सकता है संशोधन

हमारा संविधान (Indian Constitution) देश की आत्मा है और संविधान (Indian Constitution) की आत्मा इसकी मूल भावना है। हालांकि हमारे संविधान (Indian Constitution) में मूल भावना जैसा कोई शब्द नहीं है। फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने इसका अर्थ स्पष्ट दिया था। बीते 74 सालों में अलग अलग समय पर हालात और जरूरतों के मुताबिक संविधान में कई संशोधन हुए हैं और अब तक संविधान में कुल 105 संशोधन हो चुके हैं। यह नहीं कि अब आगे संशोधन नहीं होंगे। जब जैसी जरूरत होगी तो देश की संसद के माध्यम से हमारे जन प्रतिनिधि इसमें और भी संशोधन करेंगे। इन संशोधनों के जरिये भी संविधान की मूल भावना में कोई बदलाव नहीं किया जा सकता।

जैसा कि आप जानते हैं कि भारतीय संविधान (Indian Constitution) के कुछ प्रावधान लचीले हैं और कुछ बेहद कठोर भी हैं। यानी हमारा संविधान लचीला होते हुए भी कई जन आधारित मुद्दों पर कठोर है और यह इसकी खूबसूरती है। जहां तक संशोधन का सवाल है, तो अनुच्छेद 368 में दिए गए गए प्रावधानों और तरीकों के मुताबिक संविधान में संशोधन किए जा सकते हैं। हालांकि कुछ परिस्थिति में संविधान में संशोधन किसी भी हाल में नहीं किया जा सकता।

इसमें नियम यह है कि कोई भी संशोधन संविधान (Indian Constitution) की ‘आधारभूत संरचना’ यानी बेसिक स्ट्रक्चर (Basic Structure) का उल्लंघन न करता हो। अब ऐसा कोई शब्द तो संविधान (Indian Constitution) में है नहीं और न ही इसकी कोई व्याख्या है, तो इस आधारभूत संरचना के उल्लंघन का निर्णय देश का सर्वोच्च न्यायालय करता है। इसीलिए कई बार किसी कानून या नियम को लेकर विवाद होता है, तो सर्वोच्च न्यायालय इस पर अपना निर्णय सुनाता है। इस तरह जहां संसद को नियमों के तहत किसी भी संशोधन या कानून निर्माण का अधिकार है, उसी तरह सुप्रीम कोर्ट को उन नियमों, कानूनों, संशोधनों की संवैधानिकता तय करने का अधिकार है।

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भारत के संविधान (Indian Constitution) की ‘मूल संरचना’ का आशय संविधान में दर्ज उन प्रावधानों से है, जो संविधान और भारतीय राजनीतिक व लोकतांत्रिक आदर्शों को दर्शाते हैं। इन प्रावधानों को संविधान में संशोधन के जरिये भी नहीं हटाया जा सकता है।

इन प्रावधानों में नकारात्मक बदलाव करने पर संविधान (Indian Constitution) का सार-तत्व नकारात्मक रूप से प्रभावित होगा और यह आम नागरिकों के लिए ठीक नहीं होगा। नागरिकों के मूल अधिकारों, आदर्शों और संविधान के मूल दर्शन की रक्षा के लिए समय-समय पर न्यायपालिका हस्तक्षेप करती है।

संविधान (Indian Constitution) के आदर्शों और दर्शन को जस का तस बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने मूल संरचना सिद्धांत निर्धारित किया है। इसके अनुसार, संसद सिद्धांत की मूल संरचना को खत्म नहीं कर सकती है और न ही इसमें बदलाव ला सकती है। इस मामले में केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यही तर्क दिया था।

‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए संविधान (Indian Constitution) की मूल भावना की व्याख्या की थी। यही वो केस है, जो याद दिलाता है कि सरकारें संविधान से ऊपर नहीं हो सकती हैं। इस केस ने यह बताया कि भारत में सत्ता और सरकार का स्रोत संविधान है। संविधान ही सर्वोच्च है। संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन संविधान को संशोधित करने की संसद की शक्ति असीमित नहीं है।

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केशवानंद भारती की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में संविधान (Indian Constitution) के मूल ढांचे के सिद्धांत का प्रतिपादन किया, जो कहता है कि संविधान का मूल ढांचा नहीं बदला जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मतलब ये था कि संसद संविधान में संशोधन तो कर सकती है, लेकिन ये संशोधन तभी तक न्यायसंगत है, जब तक संविधान की मूल भावना काे नुकसान न पहुंचे।

क्या है संविधान (Indian Constitution) की मूल भावना?

हमारे संविधान निर्माताओं ने धर्मनिरपेक्षता, स्वतंत्र चुनाव, संघीय ढांचा, न्यायिक समीक्षा और संसदीय लोकतंत्र को संविधान की मूल भावना कहा है। ‘केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य’ मामले में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ही न्यायिक शास्त्र में एक सिद्धांत बन गया, जिसे ‘संविधान की मूल संरचना सिद्धांत’ कहा गया।

संविधान (Indian Constitution) की सर्वोच्चता

संविधान की सर्वोच्चता बेहद स्पष्ट है। इसका अर्थ है कि संविधान से बढ़कर कोई नहीं। भारतीय संविधान की प्रस्तावना का उद्देश्य ही एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना करना है। इसके सभी तीनों अंग कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका संविधान के अनुसार ही काम करते हैं।