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JADS: आप कुर्सी छोड़ दीजिए, हम ही प्रशासन चलाते हैं!

वन कटाई का विरोध: बुरहानपुर में हजारों आदिवासियों ने किया जिला प्रशासन का घेराव

JADSजागृत आदिवासी दलित संगठन (JADS) के दावे
1. आदिवासियों के सवालों पर जिला प्रशासन हुआ फेल
2. कानून और प्रक्रिया के बारे में अनजान प्रशासन
3. कहा— आप कुर्सी छोड़ दीजिए, हम ही प्रशासन चलाते हैं!
4. 7 दिन में कार्यवाही नहीं हुई तो करेंगे बड़ा आंदोलन

बुरहानपुर। जागृत आदिवासी दलित संगठन (JADS) के नेतृत्व में बुरहानपुर जिले के हजारों आदिवासियों ने कलेक्टर का घेराव किया। इस दौरान वन अधिकार अधिनियम का सही क्रियान्वयन और अवैध कटाई पर शीघ्र कार्यवाही की मांग की गई। संगठन (JADS) की ओर से इस संबं​ध में मुख्यमंत्री के नाम संबोधित एक ज्ञापन भी सौंपा गया। प्रशासन द्वारा वन कटाई और दावों के क्रियान्वयन पर शीघ्र कार्यवाही करने की मांग के साथ 7 दिन का समय दिया गया है, और 7 दिनों में कार्यवाही नहीं होने पर और भी बड़ा आंदोलन करने की चेतावनी दी गई है।

24 जनवरी को जागृत आदिवासी दलित संगठन (JADS) के नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने विशाल रैली कर शासन-प्रशासन से वन अधिकार अधिनियम और अवैध कटाई को रोकने में शासन की निष्क्रियता को आड़े हाथ लेते हुए प्रशासन के समक्ष तीखे सवाल उठाए। JADS संगठन का दावा है कि रैली में 4000 से अधिक आदिवासी शामिल हुए। इस दौरान जंगल बेचने में लिप्त वन विभाग एवं पुलिस के अमले पर जांच और कार्यवाही की मांग की गई।

जिला अस्पताल से कलेक्टर कार्यालय तक आदिवासियों ने रैली कर प्रशासन के सामने कई मुद्दे उठाए और अलग अलग गांव से आए लोगों ने आंदोलनकारियों को संबोधित किया। इस दौरान अवैध कटाई रोकने, वन अधिकार के क्रियान्वयन और शिक्षा एवं बिजली के मुद्दों पर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा गया।

ज्ञापन सौंपने के लिए आदिवासियों ने जिला कलेक्टर को बातचीत के लिए बुलाया, लेकिन कलेक्टर की ओर अपने प्रतिनिधियों के रूप में बुरहानपुर SDM एवं आदिम जाति कल्याण विभाग के सहायक आयुक्त भेजे गए। आदिवासियों ने वन अधिकार अधिनियम की प्रक्रिया और उसके उल्लंघन पर सवाल पूछे। बताया जाता है कि इनमें से किसी सवाल का जवाब प्रशासन की ओर से नहीं दिया गया। आदिवासियों ने कहा कि कानून न जानने वाला, कानून नहीं चलाने वाला और कार्यवाही करने में असक्षम प्रशासन को कुर्सी छोड़ देनी चाहिए, हम प्रशासन चलाएंगे!

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आंदोलनकारियों के अनुसार, वन अधिकार अधिनियम का सही क्रियान्वयन न होने की आड़ में वन विभाग जंगल में अवैध कटाई को बढ़ावा देते हुए जंगल बेच रहे हैं। 15 साल से लागू वन अधिकार कानून का मुख्य उद्देश्य स्थानीय लोगों की ग्राम सभा द्वारा दावों की जांच कर जंगल के प्रबंध की जिम्मेवारी ग्राम सभा को ही सौंपना है। संसद के बनाये कानून को लागू करने के बजाए, वन विभाग इसकी आड़ में जंगल बेचने और उसमे अपनी निजी कमाई करने में ही दिलचस्पी रखता दिखाई पड़ रहा है। जो दावेदार वन विभाग को पैसे देने से इंकार करते हैं, वे अतिक्रमणकारी और बाहरी कहलाए जाते हैं। आदिवासियों ने बताया कि आज भी वन अमला लोगों को अपने खेत में ट्रैक्टर चलाने, थ्रेशर मशीन चलाने के लिए पैसों की मांग करता है। लेकिन जिले में वन अधिकार अधिनियम के अंतर्गत आधे से भी कम दावों का निराकरण हुआ है। कई गांवों में दावे प्राथमिक स्तर पर ही लंबित हैं और पोर्टल बंद होने के कारण कई आदिवासी आज भी अपने दावे दर्ज करने से वंचित हैं। बताया गया कि कई गांवों में फर्जी ग्राम सभा और फर्जी सत्यापन कर अवैध रूप से दावे खारिज किए गए हैं, जिसके बारे में कई गांवों में शिकायत भी जमा की गई है।

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इस संबंध में एक विज्ञप्ति जारी करते हुए जागृत आदिवासी दलित संगठन (JADS) के अंतराम अवासे, रतन अलावे और माधुरी ने कहा है कि आदिवासियों को उनके वन अधिकार से वंचित रखने और जंगल कंपनियों को बेचने आसान करने के लिए ही कानून में बदलाव लाए जा रहे हैं। सबसे ताज़ा उदाहरण वन संरक्षण नियम में लाए गए बदलाव हैं, जहां बिना ग्राम सभा की अनुमति के ही कंपनियों को जंगल बेचा जा सकता है। वो भी ऐसे समय में, जब देश में मात्र पिछले तीन साल में एक लाख 36 हज़ार एकड़ वन भूमि कंपनियों और परियोजनाओं में नष्ट की जा चुकी है!

उन्होंने प्राकृतिक जंगल नष्ट कर प्लांटेशन का पैसा खा जाने वाले वन विभाग की पद्धतियों का भी विरोध किया और अवैध कटाई को बढ़ावा देने वाले वन कर्मियों पर निशाना साधते हुए ज़िले के सभी वन कर्मी और अधिकारियों की संपत्ति की जांच किए जाने की मांग उठाई। प्रशासन को सौंपे गए ज्ञापन में अवैध कटाई में कथित तौर पर लोगों को उकसाने वाले नाकेदारों और पुलिस कर्मियों की जांच करने की मांग भी की गई है।

शिक्षा की चरमराती व्यवस्था पर भी तीखा विरोध
विज्ञप्ति में कहा गया है कि शिक्षा अधिकार कानून के अनुसार, हर तीस बच्चे पर कम से कम एक शिक्षक, हर विषय के लिए अलग शिक्षक और पहाड़ी इलाकों में हर किलोमीटर पर एक स्कूल की व्यवस्था स्थापित करने के बजाए, “सीएम राइज़“ योजना के तहत सरकारी स्कूल बंद किए जाने और शिक्षा की निजीकरण के रास्ते खोले जा रहे हैं। मध्य प्रदेश में एक लाख से भी ज्यादा शिक्षकों के रिक्त पद होने के बावजूद रोजगार की मांग करने पर शिक्षित युवा पुलिस की लाठी खा रहे हैं! नेता और करोड़पति अपने बच्चों को विदेश भेज रहे हैं और गांव के युवाओं के लिए शिक्षक नहीं, स्कूल नहीं, हॉस्टल नहीं हैं।

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JADS संगठन ने कहा है कि किसान-मजदूरों को अपनी फसल का पूरा दाम देने, लागत पर डेढ़ गुना समर्थन मूल्य तय करने और इसे कानूनी अधिकार बनाने के लिए सरकार ने किसान आयोग की सिफ़ारिशें को नज़रअंदाज़ किया है।

बिजली लूट का विरोध
आदिवासी रैली में कहा गया कि टेम्पररी कनैक्शन के नाम पर किसानों से लाखों रुपए लिए जाने के बावजूद आवश्यकता के अनुसार बिजली सप्लाई ही नहीं होती है और किसानों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। इन सभी कारणों से किसानों को अपनी फसल का पूरा भाव नहीं मिलता एवं वे कर्ज में डूबते जा रहे हैं। देश में हर रोज 15 किसान और 115 मजदूर आत्महत्या करने मजबूर हैं। नेपा क्षेत्र में एक भी मंडी नहीं है और किसानों को 35 किलोमीटर की दूरी नाप कर अपनी फसल बुरहानपुर लाना पड़ता है प्रशासन से नेपानगर क्षेत्र में मंडी खोलने की मांग भी उठाई गई।

आदिवासियों के अनुसार, आज आदिवासी महिला-पुरुष अपने परिवार के साथ विस्थापित हो कर, मजदूरी की तलाश में अपने गाँव से उजड़ कर जाने मजबूर हैं। इसका मुख्य कारण गांव में रोजगार और विकास न उपलब्ध करवा पाने वाले शासन प्रशासन की विफलताएं ही हैं। हमारे लोग गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक तक काम के खोज में भटक रहे हैं। मात्र 15,000-20,000 रूपए का “एडवांस” ले कर सैकड़ों परिवार, अपने बच्चों सहित गन्ने के खेतों में बंधुआ मजदूर बन रहे हैं। आंदोलन में शासन-प्रशासन से सवाल उठाया गया, क्या आदिवासियों को उजड़ना और बंधुआ मजदूर बनना ही उनके लिए विकास है?

JADS संगठन ने कहा कि इंदौर में विदेशी “मेहमानों” की दो दिन की खातिरदारी पर 200 करोड़ रूपय फूंकने वाली सरकार के पास आदिवासियों के शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, पर्याप्त बिजली की व्यवस्था और गांव में विकास के लिए खर्च करने के लिए पैसे क्यों नहीं हैं।