Marital Rape in India

Marital Rape in India: क्या कहता है संविधान और क्यों है संविधान और भारतीय दंड संहिता के बीच टकराव

सुप्रीम कोर्ट ने आज वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) के मामले से जुड़ी चार याचिकाओं को एक साथ जोड़कर सुनवाई शुरू कर दी है और इस मामले में अगली सुनवाई 21 मार्च को होनी है। अभी याचिकाओं पर फैसला दो और तीन जजों की बैंच ने लिया है, लेकिन अगली सुनवाई में यह यचिकाओं का पूरा बैच पांच जजों की संवैधानिक पीठ के समक्ष जाएगा। इस मामले में मौटे तौर पर वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India), भारतीय दंड सहिता IPC की धारा 375, न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति की रिपोर्ट मुख्य रूप से देखी जानी चाहिए। साथ ही मामले की तह तक जाने के लिए वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) के अपराधीकरण के साथ घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 भी देखा जाना चाहिए। लेकिन इन सबसे जरूरी है भारतीय समाज की संरचना को समझना।

इस पूरे मामले में बाकी सारे कानून और संविधान के विभिन्न अनुच्छेद आईपीसी की धारा 375 के अपवाद क्रमांक दो के खिलाफ खड़े हैं। लेकिन आखिर क्या वजह है कि एक धारा की महज दो पंक्तियां संविधान के चार अनुच्छेद, तीन अधिनियम और वर्मा समिति पर भारी पड़ रही है। धारा 375 का अपवाद 2 कहता है कि “किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ संभोग या यौन कृत्य, यदि पत्नी की उम्र पंद्रह वर्ष से कम नहीं है, बलात्कार नहीं है”।

क्या कहती है दुनिया
इस मामले में दुनिया भी बंटी हुई नजर आती है। दुनिया के 185 देशों में से, 77 देशों में ऐसे कानून हैं, जो स्पष्ट रूप से वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) को अपराध मानते हैं, जबकि 34 देश ऐसे हैं जो साफ तौर पर वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी से बाहर मानते हैं या कहें तो, पत्नी की सहमति के खिलाफ यौन अत्याचार करने वाले पति को संरक्षण देते हैं।

वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) पर भारतीय कानून
भारत उन 34 देशों में से एक है, जिन्होंने वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code- IPC) की धारा 375 उन कार्यों को परिभाषित करती है जो एक पुरुष द्वारा किये गए बलात्कार को परिभाषित करते हैं। यह प्रावधान दो अपवादों को भी निर्धारित करता है। वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) को अपराधमुक्त करने के अलावा यह उल्लेख करता है कि डॉक्टरी प्रक्रियाओं या हस्तक्षेप को बलात्कार नहीं माना जाएगा। धारा 375 के अपवाद 2 में कहा गया है कि “किसी पुरुष द्वारा अपनी पत्नी के साथ संभोग या यौन कृत्य, यदि पत्नी की उम्र पंद्रह वर्ष से कम नहीं है, बलात्कार नहीं है”।

क्या कहता है घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005
यह अधिनियम ‘लिव-इन’ या विवाह संबंध में किसी भी तरह के यौन शोषण को वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) मानता है। हालांकि यह केवल सामाजिक उपाय देता है। भारत में वैवाहिक बलात्कार पीड़ितों के लिए अपराधी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का कोई तरीका नहीं है।

इस बहस का इतिहास
दिल्ली उच्च न्यायालय साल 2015 से इस मामले में दलीलें सुन रहा है। जनवरी 2022 में दिल्ली उच्च न्यायालय के दो न्यायाधीशों ने छूट को चुनौती देने वाले व्यक्तियों और नागरिक समाजिक संगठनों की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई शुरू की। मई 2022 तक हाईकोर्ट एक विवादास्पद द्विपक्षीय फैसले पर पहुंचा। एक न्यायाधीश वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) को आपराधिक घोषित करने के पक्ष में थे, क्योंकि यह किसी महिला की सहमति के अधिकार का उल्लंघन करता है, जबकि दूसरे न्यायाधीश यह कहते हुए कि विवाह में “आवश्यक रूप से” सहमति होती है, इसके खिलाफ थे। फिर यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा।

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सर्वोच्च न्यायालय ने सितंबर 2022 में वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बिना महिलाओं के सुरक्षित गर्भपात के अधिकार पर फैसला सुनाया कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट के उद्देश्यों के लिए बलात्कार की परिभाषा में वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) को शामिल किया जाना चाहिए।

भारत के विधि आयोग ने यौन हिंसा पर भारत के कानूनों में सुधार के कई प्रस्तावों पर विचार करते हुए वर्ष 2000 में वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) अपवाद को हटाने की आवश्यकता को खारिज़ कर दिया था।

न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति को साल 2012 में भारत के बलात्कार कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव पेश करने का काम सौंपा गया था। इसकी कुछ सिफारिशों ने वर्ष 2013 में पारित आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम को आकार देने में मदद की, लेकिन वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) सहित कुछ अन्य सुझावों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई।

संसद में भी इस मामले को उठाया गया है। साल 2015 में एक संसद सत्र में सवाल के उत्तर में वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) को आपराधिक बनाने के विचार को इस दृष्टिकोण से खारिज़ कर दिया गया था कि “वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) को देश में लागू नहीं किया जा सकता क्योंकि विवाह को भारतीय समाज में एक संस्कार या पवित्र माना जाता है”।

क्या है सरकार का पक्ष
केंद्र सरकार ने शुरू में बलात्कार अपवाद का बचाव किया लेकिन बाद में अपना पक्ष बदल दिया और न्यायालय को बताया कि सरकार कानून की समीक्षा कर रही है, यह भी कि “इस मुद्दे पर व्यापक विचार-विमर्श की आवश्यकता है”। दिल्ली सरकार ने वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) अपवाद को बरकरार रखने के पक्ष में तर्क दिया। सरकार की दलीलें पुरुषों को पत्नियों द्वारा कानून के संभावित दुरुपयोग से बचाने से लेकर शादी की संस्थात्मक व्यवस्था की रक्षा संबंधी तत्त्वों की व्याख्या करती हैं।

क्यों वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) अपराध है
वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) को अपवाद मानना अनुच्छेद 21 (जीने और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) तथा अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) जैसे मौलिक अधिकारों में निहित व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा व लैंगिक समानता के संवैधानिक लक्ष्यों को झुठलाता है। यह महिलाओं को अपने शरीर से संबंधित निर्णय लेने से दूर करता है और उन्हें एक साधन के रूप में प्रस्तुत करता है।

न्यायिक प्रणाली की निराशाजनक स्थिति भी इसके लिए जिम्मेदार है। भारत में वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) के मामलों में अभियोजन की दर काफी कम है। इसके कारणों में कई वजहें शामिल हैं।

पहली, वजह तो यही है कि सामाजिक कारणों और कानूनी जागरूकता के अभाव के कारण वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) के मामले अदालतों तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। महिलाओं को यह पता ही नहीं है कि उनके खिलाफ यह अपराध हो रहा है। इस तरह कम अपराध दर्ज होना एक बड़ी वजह है।

दूसरे, राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के संग्रह का तरीका गलत है। न्याय की लंबी प्रक्रिया और सबूतों की कमी के कारण न्यायालय के बाहर समझौता भी ऐसे मामलों में आम बात है।

1960 और आज के समाज में अंतर
1860 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के दौरान भारत में IPC को लागू किया गया था। नियमों के पहले संस्करण के तहत वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) अपवाद 10 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाओं पर लागू था, जिसे 1940 में बढ़ाकर 15 वर्ष कर दिया गया था। 1847 का लॉर्ड मैकाले के मसौदे ने इस अपवाद के लागू होने में अहम भूमिका निभाई। IPC औपनिवेशिक युग के भारत में स्थापित पहले विधि आयोग के अध्यक्ष लॉर्ड मैकाले के 1847 के मसौदे पर आधारित है। मसौदे ने बिना किसी आयु सीमा के वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। यह प्रावधान एक सदी पुराना विचार है जिसका तात्पर्य विवाहित महिलाओं की सहमति से है और जो पति के वैवाहिक अधिकारों की रक्षा करता है।

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दूसरी तरफ विवाह में यौन संबंधों की सहमति का विचार 1736 में तत्कालीन ब्रिटिश मुख्य न्यायाधीश मैथ्यू हेल द्वारा दिये गए ‘हेल सिद्धांत’ से प्रेरित है। इसमें कहा गया है कि पति बलात्कार का दोषी नहीं हो सकता है क्योंकि “आपसी वैवाहिक सहमति और अनुबंध द्वारा पत्नी ने पति के समक्ष अपने-आप को समर्पित कर दिया है”।

पति—आश्रय का सिद्धांत
इस मामले में एक और सिद्धांत काम करता है। यह पति-आश्रय का सिद्धांत है। इसके अनुसार, शादी के बाद एक महिला की कोई व्यक्तिगत कानूनी पहचान नहीं होती है। विशेष रूप से पति-आश्रय के सिद्धांत के विषय पर सुनवाई के दौरान भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने वर्ष 2018 में व्यभिचार को अपराध घोषित कर दिया था। यह माना गया कि धारा 497, जो कि व्यभिचार को अपराध के रूप में वर्गीकृत करती है, पति-आश्रय के सिद्धांत पर आधारित है। यह सिद्धांत, संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त नहीं है जो यह मानता है कि एक महिला शादी के साथ ही अपनी पहचान और कानूनी अधिकार खो देती है, परंतु यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।

दुनिया भर में घर सबसे खतरनाक जगह
संयुक्त राष्ट्र ने देशों से कानूनों में व्याप्त खामियों को दूर करके वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) को समाप्त करने का आग्रह करते हुए कहा है कि “घर महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक जगहों में से एक है”।
वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) को अपराध मानने वाले देशों में से अमेरिका ने वर्ष 1993 में सभी 50 राज्यों में वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) को अपराध घोषित कर दिया था, लेकिन कानून अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग हैं। इसी तरह ब्रिटेन में भी वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित किया गया है और दोषी पाए जाने वालों को आजीवन कारावास की सजा हो सकती है। दक्षिण अफ्रीका में 1993 से वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape) अवैध है। कनाडा में वैवाहिक बलात्कार दंडनीय है।

घाना, भारत, इंडोनेशिया, जॉर्डन, लेसोथो, नाइजीरिया, ओमान, सिंगापुर, श्रीलंका और तंजानिया स्पष्ट रूप से किसी महिला या लड़की के साथ उसके पति द्वारा किये गए वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी से बाहर रखते हैं।

आगे की राह
भारतीय कानून में पति और पत्नी को अलग और स्वतंत्र कानूनी पहचान पर बीते चार—पांच सालों में बहस शुरू हुई है। मौजूदा समय में न्यायशास्त्र स्पष्ट रूप से समानता के सिद्धांत पर अधिक जोर देता है। इसलिये यह सही समय है कि विधायिका को इस कानूनी दुर्बलता को दूर करने के लिए निर्णय लेना चाहिए और IPC की धारा 375 (अपवाद 2) को समाप्त करके वैवाहिक बलात्कार (Marital Rape in India) को बलात्कार कानूनों के दायरे में लाना चाहिए।