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Bastar: पगलाया विकास, जल-जगंल-जमीन पर कब्जा और मारे जाते आदिवासी

• प्रेमसिंह सियाग

तीन दिन पहले सरकारी कैंप का विरोध कर रहे सिलगेर, बस्तर (Bastar) में आदिवासी लोगों की हजारों की भीड़ पर पुलिस ने फायरिंग कर दी। इसमें तीन आदिवासियों की घटना स्थल पर ही मौत हो गई और 30 आदिवासी घायल हो गए। एक युवक को थप्पड़ मारने पर डीएम को हटाने वाले अति सक्रिय सीएम ने मृतक आदिवासी लोगों के परिवार को 30-30 हजार रुपये की भारी भरकम राशि सहायतार्थ देने का एलान किया है।

साल के कैलेंडर में कोई ऐसी तारीख नहीं मिलेगी, जिस दिन आजादी से लेकर अब तक कहीं न कहीं किसी आदिवासी की हत्या न की गई हो! इसमे 99% हत्याएं सरकार द्वारा की गई हैं। कोई भी राज्य हो, किसी भी पार्टी की सरकार हो, लेकिन आदिवासियों की हत्याओं का सिलसिला अनवरत जारी है। आदिवासी क्षेत्र खनिज पदार्थों वाले हैं और सरकार विकास के लिए उनका दोहन करती है। खदान शुरू करने और प्लांट लगाने के कारण आदिवासी लोगों का विस्थापन होता है। सरकार रोजगार और पुनर्वास का दावा करती है, लेकिन उसे कभी पूरा नहीं किया जाता। इस तरह आदिवासी एकत्रित होकर विरोध को मजबूर होते हैं और सरकारी पुलिस विरोध को दबाने के लिए बंदूक का प्रयोग करती है।

बिना रोजगार और पुनर्वास के अंग्रेजों के समय से विकास और आदिवासी आमने-सामने लड़ते रहे है। 1855 में सिद्धू कान्हू के नेतृत्व में ‘हमारी माटी हमारा शासन’ नारे के तहत अंग्रेजों से पहला संगठित टकराव शुरू हुआ। 1895 में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में ‘दिसुम आबुआ राज’ यानी हमारा देश हमारा’ नारे के साथ बगावत शुरू हुई और 1911 में सीधी लड़ाई में तब्दील हो गई। उसके बाद अंग्रेजों ने कदम पीछे खींचे और दिकूओं को आगे करके लूट चालू की।

पहली जनवरी 1948 को खरसांवा गोलीकांड हुआ। इस क्षेत्र को उड़ीसा में मिलाने को लेकर स्थानीय आदिवासी लोग विरोध करने के लिए हाट बाजार में एकत्रित हुए थे। पुलिस गोलियों से लगभग 3000 आदिवासियों की हत्या कर दी गई। लाशों को कुएं में भरकर कुआं बंद कर दिया गया था। जलियांवाला कांड तो पूरे देश को पता चल गया, लेकिन तीन हजार आदिवासियों की हत्याओं को लेकर बिहार-उड़ीसा के बाहर कोलकाता से छपने वाले स्टेट्समैन अखबार ने एक छोटी सी खबर छापी, जिसमें 35 आदिवासियों की मौत का जिक्र किया। मरांग गोमके और जयपाल सिंह मुंडा की मांग लंबे संघर्ष के बाद 2000 में जाकर पूरी हुई।

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1994 में नागपुर शहर के गोवारी में 114 आदिवासी लोगों को पुलिस ने गोलियों से भून दिया था। चुपचाप आदिवासी अपनों की लाशों को लेकर निकल गए थे। बड़ी पार्टियों या बड़े शहरों ने इस हत्याकांड को लेकर खड़े होने से इनकार कर दिया था। 2006 में उड़ीसा के कलिंगनगर में ऑटो से घर जा रहे आदिवासियों की हत्या की गई। 28जून 2012 को बीजापुर के सारकेगुड़ा गांव में 17 निर्दोष आदिवासियों को नक्सली बताकर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया और जिम्मेवार पुलिस अफसर के ऊपर कार्यवाही तो छोड़िए उनको महत्वपूर्ण पदों पर प्रोमोशन दिया गया।

1967 को बंगाल के नक्सलबाड़ी गांव से कान्हू सान्याल और चारु मजूमदार के नेतृत्व में जो आंदोलन शुरू हुआ वो शुद्ध रूप से जल, जंगल और जमीन के अधिकारों को लेकर था। भू-सुधार नियमों की अनदेखी और संविधान प्रदत्त आदिवासी क्षेत्रों के अधिकारों का सरकारों द्वारा बार-बार किए उल्लंघन के मद्देनजर आगे जाकर यह आंदोलन दो धाराओं में विभक्त हो गया। एक धारा लोकतांत्रिक तरीके से आदिवासी लोगों/क्षेत्रों के सरंक्षण और विकास की मांग करते हुए शांतिपूर्वक तरीके से विरोध-प्रदर्शन करती है और दूसरी धारा अनदेखी से आजिज आकर हथियार उठा चुकी है। हथियारबंद धारा को मजबूती मिलती है बिना पुनर्वास किए सरकार द्वारा उजाड़े जाने की नीति, पुलिस बलों द्वारा प्रमोशन के लिए किए जाने वाले फर्जी एनकाउंटर से!

वर्तमान में नक्सलवाद को लेकर सरकारी दस्तावेजों और जमीनी स्तर पर चल रही कार्यवाहियों में जमीन आसमान का अंतर है। ट्राइबल एक्ट के तहत आदिवासी क्षेत्रों में ग्राम सभा सर्वोच्च है और डीएम भी बिना राज्यपाल की अनुमति के अधिकारों को लेकर कोई कार्यवाही नहीं कर सकता, वहां पुलिस बल की आदिवासियों पर रोज गोलियां चलती हैं। वास्तव में नक्सलवाद खत्म कर दिया गया तो आदिवासियों की जमीन छिनने के लिए बहाना क्या बचेगा? इसलिए हथियारबंद नक्सलवाद को खत्म करना सरकार की नीयत में भी नहीं है। विकास के नाम पर जमीन छीनी जाती है, पुनर्वास के नाम पर अधिकारी खजाना लूटते हैं और आदिवासी पुनर्वास और रोजगार की व्यवस्था के बिना जमीन छोड़ने को राजी नहीं होते हैं तो पुलिस की बंदूकें दनदना उठती हैं।

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ध्यान रहे नक्सलवादी आंदोलन 14 राज्यों में चल रहा है। जहां विभिन्न दलों की सरकारें रही हैं। केंद्र में भी आजतक विभिन्न दलों की सरकारें रह चुकी हैं, लेकिन आदिवासियों की हत्या का सिलसिला नहीं थमा। पिछली केंद्र सरकार में गृह मंत्री रहे पी चिदंबरम ने ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ चलाया था, जिससे नक्सलियों की कमर तो नहीं टूटी, लेकिन सैंकड़ों निर्दोष आदिवासी मारे गए! 2005 में कांग्रेसी नेता महेंद्र कर्मा ने गांव के मासूम आदिवासी लोगों के हाथों में हथियारबंद नक्सलियों से लड़ने के लिए हथियार थमा दिए और तत्कालीन बीजेपी सरकार के सीएम ने सलवा-जुडूम को सरकारी नीति बनाकर लागू कर दिया। जब तक 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक न लगा दी तब तक सैंकड़ों निर्दोष आदिवासी काल-कवलित हो चुके थे।

सुदूर जंगलों में अत्याचार की पराकाष्ठा झेल रहे आदिवासी लोगों के दर्द को शहरी पढ़ा-लिखा तबका उठाता है तो उसे अर्बन नक्सली कहकर गालियां दी जाती हैं और मुकदमा कायम करके जेलों में डाल दिया जाता है। जब तक देश का पढ़ा-लिखा तबका अपने देश के नागरिकों की हत्या अपनी ही सरकार के टूल द्वारा किए जाने पर एकसुर में मुखालफत नहीं करेगा तब तक पगलाया विकास इन गरीब, लाचार, बेबस आदिवासियों को निगलता रहेगा।

पुलिस द्वारा एक अमेरिकी नागरिक की हत्या पर पूरा अमेरिका जाम हो गया था और जो बाइडेन और उनकी पुलिस ने घुटनों पर बैठकर देश से माफी मांगी थी। यहां का नीच सिस्टम नागरिकों को कीड़े-मकोड़ों की तरह मार रहा है, लेकिन चर्चा तक नहीं होती। छह महीने से किसान दिल्ली बॉर्डर पर पड़े हैं, 400 किसान शहीद हो चुके हैं। बस्तर में तकरीबन 30 हजार आदिवासी तीन दिन से लाशों को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। देश की संवदेनशीलता मर जाए तो नागरिकों की मौतों पर मातम के मजमे ही लगाए जा सकते हैं।