Lock-down 2021

Lock-down 2021: बीमारी से नहीं, भुखमरी, कर्ज़ और सरकार से लगता है ज़्यादा डर

6 दिन के लॉकडाउन ने बढ़ाईं जनता की मुसीबतें

Lock-down 2021(लॉकडाउन और आज के हालात पर संविधान लाइव के लिए अमरीन ने कई परिवारों से बात की। उनके हालात जानने समझने की कोशिश की। महिलाओं और बच्चों के साथ जमीनी काम करने वाली अमरीन खुद भी मुश्किल हालात से निकलकर आज दूसरों को सलाह देने और उनके ​दुख में हिस्सेदारी बनने की विनम्र कोशिश करती हैं। बहुत कम बोलने और सुबह से देर रात तक बस्ती की महिलाओं के बीच काम करने वाली अमरीन बताती हैं कि अलग अलग आर्थिक स्थिति और अलग अलग जगहों पर रहने वाले इन परिवार में कहीं लोगों की संख्या ज्यादा है, तो किसी की ठीक ठाक। ज़्यादातर परिवारों से बात करने पर पता चला कि सभी को पता है कि हालात अभी और बिगडेंगे। अभी लोग अपने घर परिवार की टेंशनों से घिरे हुए हैं। लॉकडाउन पर अमरीन की यह विशेष रिपोर्ट… — संविधान लाइव.)

भोपाल। लॉकडाउन लगने से सबसे ज्यादा परेशानी का सामना उन लोगों को करना पड़ रहा है, जो रोज़ कमाते हैं, तब जाकर शाम को उन्हें दो रोटी नसीब हो पाती है। लॉकडाउन की सबसे ज्यादा मार इसी तबके पर पड़ी है, लेकिन अजीब है कि सरकार की प्राथमिकता में यह तबका सबसे नीचे है। अगर ऐसा नहीं होता, तो लॉकडाउन के पहले कम से कम इनकी रोजी रोटी की कुछ व्यवस्था जरूर सरकार करती।

भोपाल के ऐशबाग जनता क्वार्टर में रहने वाले 25 वर्षीय राजा बताते हैं कि उनके परिवार में उनकी बहन, भाई और माता—पिता हैं। राजा घर में सबसे बड़े हैं। उन्हीं पर घर की सारी ज़िम्मेदारियां हैं।

राजा कहते हैं कि वैसे ही तो एक साल से काम बंद है। पहले के जितने भी पैसे जुड़े रखे था वो भी खर्चा हो गए थे। एक साल से कोरोना लॉकडाउन में फंसे रहे। बड़ी मुश्किल से तो रूटीन बनी थी। काम भी ठीक से नहीं मिल रहा था। ज़्यादातर तो मज़दूरी करते थे। लॉकडाउन के बाद से वो भी मिलना मुश्किल हो गया।

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उन्होंने बताया कि जैसे तैसे काम मिलता था तो दस लोग आकर लड़ाइयां करते थे। क्योंकि काम की और पैसों की सभी को ज़रूरत थी। उस्ताद भी लॉकडाउन का फायदा उठाकर रोज़ की दिहाड़ी के हिसाब से नहीं बल्कि उससे कम पैसों में काम करवाते थे। इतना ही इस दौरान कम पैसे में ज़्यादा काम भी करवाया जाता था। मजबूरी में कम पैसों में काम करना पड़ता था।

राजा आगे बताते हैं कि हमारे हालात तो वैसे भी खराब थे। यह 6 दिन के लॉकडाउन से और भी खराब हो जाएंगे। पैसे और राशन के साथ—साथ अब तो घर के किराये की भी चिंता होने लगी है। क्योंकि मकान मालिक भी अब पहले से आकर टोकने लगते हैं। ये लॉकडाउन लगने से फिर से किराया पैसा खाने की चिंता होने लगी है। किराया चुकाने के लिए हमको पहले से इंतज़ाम करना पड़ता है। अब तो सरकार ने इंतज़ाम के भी कोई साधन नहीं छोड़े। गरीबों की दिन पर दिन हालात खराब होती जा रही है।

अकेली मां और तीन बच्चे
लॉकडाउन और कोरोना में ऐशबाग की अहमद अली बस्ती मे रहने वाली 35 वर्षीय रेहाना की हालत किसी भी सामान्य परिवार के मुकाबले बेहद खराब है। उनके घर में उनकी बेटी और दो लड़के हैं। पति का किसी बीमारी से इंतक़ाल हो गया है। बच्चे छोटे हैं। इसीलिए घर चलाने और कमाने की जिम्मेदारी सिर्फ रेहाना की ही है। रेहाना घर घर जाकर काम करती हैं। साथ ही घर चलाने के लिए बेल टांकने का भी काम करती हैं।

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रेहाना ने बताया कि 6 दिन के इस लॉकडाउन से काम तो गया ही साथ में रमज़ान में जो थोड़ी बहुत किसी से मदद मिलती थी वो भी नहीं मिल पाई। खर्चा बढ़ता जा रहा है। घर के हालात इतने खराब हैं कि अब तक कोई भी काम मिल जाय तो बिना सोचे समझे कर लेंगे। क्योंकि इस माहौल में काम की और पैसों की सख्त जरूरत है।

हर तरफ खराब, यहां और भी खराब
कुछ युवाओं से भी लॉकडाउन के मुद्दे पर चर्चा की। उनकी राय भी जानी। युवाओं का कहना हैं कि पूरा दिन बस सरकार की खबरें देख कर और देश के हालात देख कर तो लोग डरे हुए हैं। सब अपने घर और अपने हालात ठीक करने में ही लगे हैं। और अब बाहर निकलना भी मुश्किल हो गया है। अगर बाहर दोस्तों के साथ खड़े भी रहो या कुछ काम से भी जाओ तो पुलिस मारपीट करती है।

युवा बताते हैं कि इस बात का भी डर रहता है कि थाने में बंद न कर दें या कोई केस न लगा दें। क्योंकि ऐसा कई लोगों के साथ किया गया है। इस बात का भी डर रहता हैं। परेशान तो सभी थे पहले से अब और भी ज़्यादा परेशान हो रहे हैं।

लोग कहने लगे हैं कि अब बीमारी से तो कम पर भुखमरी, कर्ज़ और सरकार से ज़्यादा डर लगने लगा है। क्योंकि सरकार कभी भी बिना किसी का सोचे समझे जनता को अपना फैसला सुना देती है। नहीं मानने पर जनता पर ही हिंसा करती है। पता नहीं कब तक ये सब माहौल चलेगा और कितना हम गरीबों को बेमौत मरना पड़ेगा।