मुख्यमंत्री जी, आपकी 181 सीएम हेल्पलाइन को जरूरत है हेल्प की!

मुख्यमंत्री जी, आपकी 181 सीएम हेल्पलाइन को जरूरत है हेल्प की!

सायरा खान

यह घटना कोलार की है। 25 साल का एक युवक अपने परिवार के साथ हंसी-खुशी रह रहा था। उसके परिवार में दो बहनें, दो भाई और माता-पिता हैं। पिता की उम्र 45 वर्ष है। मां ग्रहणी हैं। दोनों भाई भी जो काम मिल जाता है वह कर लेते हैं। बहन घर पर रहती हैं।

अचानक एक दिन उनके पिता की तबीयत खराब हो गई। उन्होंने पास के अस्पताल में दिखाया तो डॉक्टर ने कहा कि कोरोना की जांच करा लें। मुझे शक है कि इनको कोरोना हुआ है। परिवार यह सुनते ही सदमे में आ गया और परिवार के सदस्य पिता को हमीदिया अस्पताल लेकर गए। वहां पर कोरोना की जांच कराने के लिए घंटों खड़ा रहना पड़ा। बड़ी मुश्किल से उनकी कोरोना की जांच हुई, उनसे कहा गया कि रिपोर्ट एक सप्ताह बाद आएगी आकर ले लेना। यहां प्रतिदिन पिता की हालत बिगड़ती जा रही थी। जिस डॉक्टर को दिखाया था उसने इलाज इसलिए नहीं किया क्योंकि रिपोर्ट नहीं आई थी।

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बेटा हमीदिया के चक्कर लगा रहा था कि पिता की रिपोर्ट जल्दी से मिल जाए, जिससे उनका इलाज समय पर हो जाए, लेकिन रिपोर्ट उसे 15 दिनों बाद मिली तब तक पिता की हालत बहुत खराब हो चुकी थी। उन्हें सांस लेने में तकलीफ हो रही थी। मरीज को भर्ती कराने के लिए हमीदिया ले गए, लेकिन वहां पर डॉक्टरों ने मना कर दिया कि हमारे पास ऑक्सीजन बेड नहीं है, तुम और कहीं ले जाओ। बेटा पूरे भोपाल के अस्पतालों में दो दिन तक चक्कर लगाता रहा, लेकिन उसे कहीं पर बेड नहीं मिला।

किसी ने उसे हेल्पलाइन नंबर के बारे में बताया कि वहां से बेड की जानकारी मिल जाती है। तब उसने सभी हेल्पलाइन नंबरों पर कॉल किया, लेकिन किसी ने कॉल रिसीव नहीं किया। फिर उसे पता चला कि 181 सीएम हेल्पलाइन नंबर है, जहां पर कॉल करने पर तुरंत मदद मिलती है। उसने फौरन सीएम हेल्पलाइन नंबर पर कॉल किया, लेकिन अन्य हेल्पलाइन नंबरों की तरह यहां भी किसी ने उसका फोन नहीं उठाया। हताश होकर वह घर वापस चला गया। जब वह घर पहुंचा तो पता चला कि पिता की मौत हो गई है।

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पिता की लाश देखकर उसे सकता सा हो गया। उसने उन्हें बचाने की हर संभव कोशिश की, लेकिन सरकार की लचर व्यवस्था और लापरवाही ने उससे उसके पिता को छीन लिया। उसका कहना है कि ऐसा हेल्पलाइन नंबर किस काम का, जो मौके पर मदद न पहुंचाए। यह किसी नेता के परिवार वालों के साथ हुआ होता तो डॉक्टर, दवाइयों, सुविधाओं की लाइन लग जाती। मैं गरीब हूं मेरी कौन सुनेगा। मेरी किसी ने मदद नहीं की।

हालात ऐसे ही हैं। आज गरीब तबके के लोग स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ अन्य सुविधाओं से भी वंचित हैं, क्योंकि प्रशासन उनकी सुध ही नहीं लेता।