सेलिब्रेशन आॅफ जर्नलिज्म: 6 साल मेडिकल शोध के निष्कर्षों की पड़ताल, अगले 6 साल में अंजाम तक पहुंचाया मामला

1 सितंबर 2016 के राजस्थान ​पत्रिका में प्रकाशित

सचिन श्रीवास्तव 
एमएमआर टीकाकरण का मामला  
किसी प्रतिष्ठित जर्नल में शोध या खबर प्रकाशित होने के बाद अक्सर अखबारों में उसके निष्कर्ष प्रकाशित होते हैं। वह भी बिना किसी तहकीकात के। यह चलन भारत से यूरोप और अमरीका तक समान रूप से है। ऐसे में किसी शोध के खिलाफ तथ्यों के साथ, 6 साल बाद रिपोर्टिंग अनूठी बात है। इतना ही नहीं शोध के निष्कर्षों की खामियों को सामने लाकर मसले को एक अंजाम तक पहुंचाने की जिद पत्रकारिता के नायाब उदाहरणों में से एक है। आज जानते हैं ऐसा करने वाले खोजी पत्रकार ब्रायर डियर और एमएमआर टीकाकरण विवाद की पूरी कहानी….

गलत शोध: 1998 में मेडिकल जर्नल द लान्सेट में एंड्रयू वाकफील्ड की एक संकल्पना प्रकाशित हुई। इसमें कहा गया कि एमएमआर टीके के कारण कोलाइटिस और ऑटिज्म के मामले बढ़ रहे हैं। इसका अखबारों और टेलीविजन में जोर शोर से प्रचार हुआ।
नतीजा: शोध के प्रचार के कारण कई देशों में मां-बाप ने बच्चों को एमएमआर टीके, जो खसरे, कंठमाला और रूबेला से बचाव के लिए दिया जाता है, देने बंद कर दिए। इस बदलाव के बाद कोलाइटिस और ऑटिज्म के मामले तो कम नहीं हुए लेकिन खसरे के मामलों में इजाफा होने लगा। खुद ब्रिटेन में एमएमआर के खिलाफ आमधारणा के कारण खसरे के मामले तेजी से बढ़े, जबकि 1995 में खसरा ब्रिटेन से लगभग लुप्तप्राय था।
रिपोर्टिंग: द संडे टाइम्स के खोजी पत्रकार ब्रायन डियर ने 6 साल की अथक मेहनत के बाद आखिर फरवरी 2004 में एंड्रयू के शोध को बेनकाब किया। उन्होंने साबित किया कि ऑटिज्म या कोलाइटिस में एमएमआर की भूमिका के पक्ष में कोई वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं। इसके बाद द लान्सेट ने एंड्रयू के शोध को आंशिक रूप से और 2010 में पूरी तरह से झुठला दिया।
फॉलोअप: ब्रायन ने 2009 में रिपोर्ट में बताया कि वेकफील्ड ने रोगियों की संख्या में हेरफेर किया और गलत परिणाम दिखाए।
कार्रवाई: जनरल मेडिकल काउंसिल ने 2010 में वेकफील्ड को पेशेवर गैरजिम्मेदारी का दोषी पाया और उन्हें मेडिकल रजिस्टर से उनका नाम हटा दिया। इसका अर्थ था कि वे ब्रिटेन में बतौर डॉक्टर काम नहीं कर सकते।
नया शोध : ब्रायन ने मेडिकल कम्यूनिटी पर इस बारे में अन्य शोध करने का दबाव बनाया। जनवरी 2010 में इस पर नया शोध हुआ। इसमें पाया गया कि खसरा, कंठमाला और रूबेला जैसे रोग के लिए टीकाकरण ऑटिस्टिक को बढ़ावा नहीं देता। बल्कि जिन मरीजों ने टीका लगवा लिया था उनमें ऑटिस्टिक विकार पैदा होने का खतरा थोड़ा कम था।

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ब्रायन डियर
यूनिवर्सिटी ऑफ वारविक से दर्शनशास्त्र में ग्रेजुएशन। परमाणु निरस्त्रीकरण अभियान के प्रेस ऑफिसर रहे। पहले टाइम्स और फिर द संडे टाइम्स में नौकरी। बिजनेस न्यूज सब एडीटर, स्टॉफ रिपोर्टर और फीचर लेखक की भूमिका निभाईं। 80 के दशक में ब्रिटेन के पहले सामाजिक मामलों के संवाददाता बनने का गौरव मिला। 1990 से 92 के बीच अमरीका में रिपोर्टिंग।

खोजी रिपोर्टिंग के लिए मशहूर
1986 में डियर ने ब्रिटिश साइंटिस्ट प्रो माइकल ब्रिग्स की रिसर्च को बेनकाब किया। डियर की रिपोट्र्स ने बताया कि ब्रिग्स की गर्भनिरोधक दवाओं संबंधी रिसर्च एक जर्मन ड्रग कंपनी द्वारा प्रायोजित थी।
1994 में वेलकम ट्रस्ट के खिलाफ खोजी खबरें प्रकाशित कीं। आखिर ट्रस्ट को एंटीबायोटिक, सेप्ट्रिन आदि दवाएं बाजार से वापस लेनी पड़ीं।
2005 में पेनकिलर विओक्स के खिलाफ डियर ने रिपोर्टिंग की।  दवा पर रोक लगी।
2006 में टीजीएन1412 की पड़ताल करती डॉक्यूमेंट्री द ड्रग ट्रायल देट वेंट रॉन्ग बनाई। इसे रॉयल टेलीविजन सोसाइटी जर्नलिज्म अवार्ड मिला।
2008 में मशहूर साइक्रेटिस्ट राज प्रसाद के मेडिकल प्रैक्टिस सस्पेंसन के पीछे डियर की खोजी पत्रकारिता थी।