जल संकट: पानी पर कब्जे की लड़ाई

12 सितंबर 2016 को राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित
सचिन श्रीवास्तव 
धरती के 71 प्रतिशत हिस्से पर पानी है, इसके बावजूद अगर पूरी दुनिया में पानी को लेकर हाहाकार मचा है, तो यह थोड़ा अजीब लगता है। समुद्रों में मौजूद अथाह खारे पानी का डिसेलिनेशन कर इस संकट को आसानी से हल किया जा सकता है। यह तकनीक महंगी है, लेकिन इंसानी जान से ज्यादा तो नहीं? पानी की इस लड़ाई में फिलहाल, ताकतवर मुल्कों और धनी उद्योगों की जीत तय मानी जा रही है। क्योंकि धरती पर मौजूद पानी का जो 1 प्रतिशत हिस्सा इंसान के लिए उपयोगी है, उसके 70 प्रतिशत हिस्से पर इसी समूह का कब्जा है। ऐसे में पानी की कमी या जिसे आम भाषा में जल संकट कहा जाता है, वह कई मायनों में इंसान का जानबूझकर निर्मित किया गया संकट है। दिक्कत यह है कि जिन लोगों ने इस संकट को बढ़ाया है, वे इससे सीधे प्रभावित नहीं होते हैं। बल्कि संकट बढ़ाने वाला अक्सर किल्लत से दूर रहता है। पानी की वैश्विक राजनीति में पहले संकट पैदा करना, फिर हल को अपने तक सीमित रखना वर्चस्व का जरूरी हिस्सा है।
हर तरफ पानी के लिए मारामारी
पूरी दुनिया में पानी के मुद्दे पर टकराव बढ़ रहे हैं। पानी पर विवाद की तीन परतें हैं। वैश्विक बंटवारा, राज्यों के विवाद और घरेलू उपयोग।
1. वैश्विक बंटवारे में चीन और हमारे बीच ब्रह्म पुत्र नदी के पानी के बंटवारे का मुद्दा अब तक हल नहीं हुआ है। अरुणाचल पर चीन की पैनी नजर की एक वजह यहां के प्रचुर जल संसाधन हैं। कश्मीर पर पाकिस्तान की नजर के राजनीतिक कारणों के अलावा एक मसला राज्य से बहनेवाली नदियों पर वर्चस्व स्थापित करना भी है। बांग्लादेश के साथ तीस्ता के पानी के बंटवारे का विवाद सुलझ नहीं सका है। नेपाल भी अपने बांधों से पानी छोड़ता है, जो बिहार की बाढ़ के कई कारणों में से बड़ी तात्कालिक वजह है। इस्लामिक स्टेट टिगरिस और यूफरेटिस नदियों पर कब्जे के प्रयास में है। ये नदियां इराक की जीवनधारा हैं। पूरे अफ्रीका में कई देशों के बीच जल संकट के लिए मद्देनजर युद्ध जैसे हालात हैं। लातिन अमरीका में भी देशों के बीच जल विवाद आम हैं। 60 के दशक में इस्राइल ने जॉर्डन नदी पर अधिकार जमाने के लिए 6 दिन का युद्ध छेड़ा था। मैडागास्कर के राष्ट्रपति को दक्षिण कोरिया में जल संकट की वजह से अपना पद त्यागना पड़ा था। नील नदी के पानी पर मिस्र और इथोपिया का विवाद पश्चिम एशिया में एक और युद्ध का संकेत है।
2. राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच कावेरी जल विवाद एक बार फिर चर्चा में है। सड़कें जाम हैं, माहौल में भारीपन है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नजरें। कुछ ही महीने पहले दिल्ली-हरियाणा जल विवाद सुर्खियों में रहा। इधर, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के बीच महानदी जल बंटवारे पर विवाद है। पंजाब-हरियाणा, पंजाब-राजस्थान, गुजरात-मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र-तेलंगाना आदि विवाद भी कभी ठंडे नहीं पड़ते हैं।
3. घरेलु उपयोग के विवादों में इंडस्ट्री, सिंचाई और रोजमर्रा के उपयोग से उपजने वाले विवाद शामिल हैं। इन घटनाओं में से कुछ विवाद अदालतों तक पहुंचे हैं, तो कई बार खूनी संघर्ष भी हुए हैं।
1.36 लाख किमी हिस्से पर पानी
धरती पर कुल उपलब्ध पानी लगभग 1 अरब 36 करोड़ 60 लाख घन किमी है। हालांकि इसमें से 96.5 प्रतिशत समुद्री खारा पानी है। यह समुद्री जीवों, वनस्पतियों के अलावा इंसान, जमीनी वनस्पति तथा जीवों के लिए अनुपयोगी है। बाकी बचा 3.5 प्रतिशत पानी मीठा है, लेकिन इसका 24 लाख किमी हिस्सा 600 मीटर की गहराई में धरती के भीतर मौजूद है। लगभग 5 लाख किलोमीटर पानी गंदा और प्रदूषित हो चुका है। इस तरह धरती पर उपस्थित कुल पानी का मात्र 1 प्रतिशत ही उपयोगी है। दुनिया में उपलब्ध पानी का 2.5 प्रतिशत हिस्सा इंसान के लिए लिए उपयोगी है। इसमें भी 1 प्रतिशत बर्फ के रूम में और 0.5 प्रतिशत नमी के रूप में है। जाहिर है महज 1 प्रतिशत पानी ही सीधे तौर पर उपयोगी है। इसी 1 प्रतिशत पानी से दुनिया की पूरी आबादी अपनी दैनिक जरूरतें पूरी करती है।
लाभ और नुकसान का गणित
पानी के बंटवारे में एक देश को लाभ और दूसरे का नुकसान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक उदाहरण से इसे समझते हैं। मान लीजिए दो देश या राज्य किसी नदी के 50-50 प्रतिशत जल बंटवारे पर राजी होते हैं। पहला देश जहां से नदी बहती है, बराज बना देता है। इस बराज में तलछट जमेगी। इसकी ऊपरी सतह से पानी निकाल कर पहला देश अपनी जरूरत के लिए नहर के जरिये दूसरी नदी में पहुंचा देगा। नीचे बैठी तलछट को फ्लश कर आगे बहा दिया जाएगा। इससे पानी का बंटवारा तो आधा-आधा होता है, लेकिन अनुमानित 90 प्रतिशत तलछट ही दूसरे देश जाती है। अधिक मात्रा में तलछट पहुंचने से दूसरे देश की नदी का पाट ऊंचा होता जाएगा, जिससे बाढ़ का प्रकोप बढ़ जाएगा। इसके अलावा पहला देश अगर बांध बनाता है, और अचानक पानी छोड़ता है, तब भी बाढ़ का खतरा रहता है।
पानी से पैसा कमाने की साजिश
जनसंख्या बढ़ोत्तरी और जल प्रदूषण के कारण पानी की मांग तेजी से बढ़ रही है। पानी उद्योग के लिए यह संभावना का बाजार है। हालिया आकलन के मुताबिक, दुनिया का पानी बाजार करीब 1000 अरब रुपए का है। भारत में बोतल बंद पानी का कारोबार 60 अरब रुपए से ज्यादा का है, जो तेजी से बढ़ रहा है।
उपलब्धता बढ़ाना और किफायती इस्तेमाल
वैश्विक जल संकट का बड़ा हिस्सा मानव निर्मित है। यह दोरफा है। एक तो हम पानी का उपयोग किफायत से नहीं कर रहे हैं। दूसरे जल स्रोतों के बढ़ाने की ओर भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। समुद्री खारे पानी को मीठे जल में बदलकर आसानी से जल संकट से छुटकारा पाया जा सकता है।
भारत में हालात
दुनियाभर में भारत में पानी का इस्तेमाल सबसे ज्यादा 13 प्रतिशत होता है। भारत के बाद चीन 12 प्रतिशत तथा अमेरिका 9 प्रतिशत का स्थान है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में पानी का भविष्य चिंताजनक और नाजुक है। मांग और आपूर्ति में असंतुलन बढ़ रहा है। राष्ट्रीय आयोग का अनुमान है कि सन 2050 तक यह अंतर 50 प्रतिशत तक बढ़ सकता है। फिलहाल 7 खरब घनमीटर पानी की मांग है यह बढ़कर 14 खरब 44 अरब घनमीटर होने का अनुमान है।
डिसेलिनेशन है जल संकट का हल
समुद्री खारे पानी को मीठे पानी में बदलने की प्रक्रिया डिसेलिनेशन कहलाती है। फिलहाल यह तकनीक काफी महंगी है। इसके लिए ज्यादा ऊर्जा और विशेष बुनियादी सुविधाओं की जरूरत होती है। इससे इसकी लागत नदियों या जमीन से हासिल ताजा पानी की तुलना में बेहद ज्यादा होती है। दुनिया का सबसे बड़ा डिसेलिनेशन प्लांट संयुक्त अरब अमीरात का जेबेल अली संयंत्र है। यह हर साल 300 मिलियन घन मीटर पानी उत्पादन में सक्षम है। अमरीका का टेम्पा बे प्लांट दिसम्बर 2007 में शुरू हुआ और यह हर साल 50 मिलियन घन मीटर डिसेलिनेशन करता है। फिलहाल यह अपनी क्षमता का महज 12 त्न उत्पादन पर ही कर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, दुनिया भर में 13,080 डिसेलिनेशन संयंत्र हर रोज 15 बिलियन गैलन से अधिक पानी का उत्पादन करते हैं।
18 प्रतिशत आबादी को दुनिया में स्वच्छ पेयजल नहीं मिल पा रहा है।
1.6 अरब से ज्यादा लोग पानी के संकट से जूझ रहे हैं
2025 तक दुनिया की दो-तिहाई आबादी जल संकट की जद में होगी।
70 करोड़ लोग 2030 तक पानी के लिए होंगे विस्थापित, संयुक्त राष्ट्र का अनुमान।
50 लीटर पानी मिलना चाहिए संयुक्त राष्ट्र के मानकों के मुताबिक हर व्यक्ति को रोज।
100 लीटर पानी हर माह भी उपलब्ध नहीं है दुनिया के कई हिस्सों में
2.5 करोड़ से ज्यादा लोगों की हर साल मौत होती है प्रदूषित जल पीने से
6 प्रतिशत हिस्सा ही उपलब्ध होगा 2050 तक हर व्यक्ति को अभी उपलब्ध पाानी का
4000 अरब क्यूबिक मीटर पानी बरसता है, भारत में हर साल, इसमें से महज 1000 अरब क्यूबिक ही भूमिगत जल का हिस्सा बन पाता है।
प्रति व्यक्ति मीठा पानी
1994 में 6000 घन मीटर
2000 में 2300 घन मीटर
2014 में 1900 घन मीटर
2025 तक 1600 घन मीटर (अनुमान)
भारत में पानी की मांग (बिलियन क्यूबिक मीटर)
क्षेत्र वर्ष 2000 2025 2050
घरेलू उपयोग 42 73 102
सिंचाई 541 910 1072
उद्योग 08 22 63
ऊर्जा 02 15 130
अन्य 41 72 80
कुल 634 1092 1447
स्रोत: सेंट्रल वाटर कमीशन बेसिन प्लानिंग डारेक्टोरेट, भारत सरकार 1999
6.6 गैलन पानी दूषित हो जाता है और यह पीने योग्य नहीं रहता तेल की एक बूंद से
यह भी पढ़ें:  ब्रह्मदाग बुगती: विद्रोही बलूच नेता चाहते हैं भारत से मदद