रक्षा समझौते से राजनीतिक हितों को साधने की कोशिश


सचिन श्रीवास्तव

एससी—एसटी एक्ट पर भारत बंद और सुप्रीम कोर्ट के समलैंगिक संबंधों पर ऐतिहासिक फैसले के बीच भारत और अमरीका के बीच आखिरकार कॉमकासा रक्षा समझौता हो गया है। आखिरकार इसलिए कि यह समझौता इससे पहले दो बार रद्द हो चुका था। दिलचस्प यह है कि समझौता रद्द होने की वजहों पर फिलहाल कोई ठोस सहमति नहीं बनी है। समझौते के प्रारूप को पूरी तरह देखने के बाद ही इस पर कुछ कहा जा सकता है, लेकिन अभी तक की सूचनाओं में खरीद की प्रक्रिया और तकनीक के विवरण पर भी कोई बहुत ज्यादा प्रकाश नहीं डाला गया है। 
इसके बावजूद आज यानी 6 सितंबर को यह समझौता महत्वपूण है। हालांकि उन वजहों से नहीं जो जाहिर तौर पर बताई जा रही हैं, बल्कि दक्षिण एशिया के मौजूदा शक्ति संतुलन और भारत के पड़ोसियों के साथ रिश्तों के लिए यह ज्यादा अहम है। 
इन समझौतों के बारे में कोई निष्कर्ष निकालने से पहले हमें इसकी ऐतिहासिक पृ​ष्ठभूमि को भी टटोलना चाहिए। Communications Compatibility and Security Agreement (COMCASA) को पहले Communication and Information on Security Memorandum of Agreement (CISMOA) कहा जाता था। इसे भारतीय जरूरतों के मुताबिक ढालकर कॉमकासा किया गया है। यह उन तीन उच्चस्तरीय समझौते में से पहला है, जो अब भारत को अमरीका के साथ करना है। यह समझौते अमरीका पहले भी अन्य देशों के साथ करता रहा है। आने वाले दिनों में इसी कड़ी में Logistics Exchange Memorandum of Agreement (LEMOA) और Basic Exchange and Cooperation Agreement (BECA) समझौते भी देर—सबेर दोनों देशों के बीच होना तय है। 
उपरी तौर पर इन समझौतों का उद्देश्य दोनों देश के बीच आपसी सैन्य सहयोग बढ़ाना है, लेकिन दरअसल इसमें अमरीका विक्रेता और भारत खरीदार की भूमिका में है। यहां यह सवाल उठना लाजिमी है कि बीते चार साल से चलाए जा रहे रक्षा क्षेत्र में देशज उत्पादन के कार्यक्रमों का क्या हुआ। दूसरी बात, एक और जाहिर उद्देश्य जो बताया जा रहा है वह है दक्षिण एशिया में चीनी हस्तक्षेप को कम करना। अमेरिकी रक्षा मंत्री जिम मैटिस और विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो की भारत की रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से हुई 2+2 बातचीत में भी यह एक अहम मसला रहा है। लेकिन यह साफ नहीं हो पाया है कि आखिर चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ते आपसी सहयोग का जवाब भारत—अमरीका का रक्षा समझौता किस तरह से है। यह किसी से छिपा नहीं है कि चीन ढांचागत सुविधाओं का लाभ देकर पाकिस्तान को अपने खेमे में ला रहा है। इसमें चीन—पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर सबसे प्रमुख है। तो क्या उसके जवाब में अमरीका अपने हथियार मुहैया कराकर हमें मजबूत कर रहा है। सवाल और चिंता की बात यह है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि चीन और पाकिस्तान के बीच मजबूत होते संबंधों का डर दिखाकर अमरीका हमें अपने हथियार बेच रहा है।
बहरहाल, यह बहुप्रतीक्षित 2+2 बातचीत पहले 2 बार रद्द हो चुकी थी। याद ​कीजिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीते साल जून की अमेरिकी यात्रा, तब दोनों पक्षों ने संवाद के इस नए प्रारूप पर सहमति जताई थी। जिसमें दो उच्चस्तरीय मंत्री रक्षा संबंधों पर बातचीत करने वाले थे। यह बातचीत रक्षा समझौते से इतर दोनों देशों के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। अमरीका की नई वीजा नीति के जरिये बाहरी कामगारों की छंटाई से भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स में उपजी कुशंकाओं और दोनों देशों के मनमुटाव चर्चा में रहे हैं। साथ ही भारत के रूस और ईरान से संबंधों पर अमरीका गाहे—बगाहे अपनी नाराजगी खुले तौर पर जाहिर करता रहा है। 
असल में, जिन मुद्दों पर कम बातचीत हुई है, वह यह हैं कि अमरीका एक तरफ भारत पर यह दबाव बना रहा है कि वह ईरान और रूस पर लगे प्रतिबंधों को लागू करे और अपने आपको पूरी तरह से अमरीकी पाले में दिखाए। दूसरे, भारत ने हाल ही में रूस के सर्फेस टू एयर मिसाइल S-400 की जो खरीद की है। उधर, अमेरिका ने रूस से पर पहले ही कई प्रतिबंध लगाए हुए हैं। इनके साथ ही रूस के रक्षा और खुफिया विभागों से किसी भी देश के अगर संबंध हैं, तो वह भी प्रतिबंधों के दायरे में आ सकता है। आने वाले दिनों में भारत और रूस के बीच अन्य रक्षा सौदे भी जमीन पर उतर सकते हैं। यह सभी मामले अमरीका के लिए चिंतित करने वाले हैं।
वहीं ईरान की बात करें तो अमेरिका दूसरे देशों को वहां से तेल न खरीदने की बात कहता रहा है। अमरीका की ओर से ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों का नया सिलसिला आगामी 4 नवंबर से फिर शुरू होने वाला है। अब दिक्कत यह है कि चीन के बाद भारत ईरान के तेल का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है। भारत की मौजूदा तेल की जरूरतों के देखते हुए यह संभव नहीं है कि भारत कहीं ओर से अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके, क्योंकि ईरान की ओर से भारत को कच्चा तेल अपेक्षाकृत कम दाम पर उपलब्ध कराया जाता है।
इस बीच हालिया बातचीत और समझौते के बाद जो हालात बनते हैं, वह आने वाले दिनों में दक्षिण एशिया के विदेशी राजनीतिक गठजोड़ और खासकर भारतीय प्रायद्वीप में सैन्य गतिविधियों के लिए जो आहट दे रहे हैं, वह अमरीका के इस इलाके में बढ़ते कदमों की बानगी हैं। पिछले दिनों अमरीका के सैन्य अफसर जनरल जेसेफ डेनफोर्ड ने कहा था कि दोनों देशों की सहभागिता और रक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने में गहरी रुचि जाहिर की थी। फिलहाल अमरीका की हिंद महासागर में दखलंदाजी सीमित है, लेकिन हालिया कॉमकासा समझौते के बाद भारत के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने की सुविधा अमरीका के पास होगी। ऐसे में वह आसानी से अपनी भूमिका को यहां बढ़ा पाएगा। बदले में भारत को अमरीकी हथियार मिलेंगे, लेकिन उसके लिए भारत को अलग से खरीद करनी होगी। जहां तक चीन के दक्षिण एशिया में रक्षा और आर्थिक समझौतों के खतरे की बात है, तो यह अभी कम नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में भारत—अमरीका की सेना के तीनों अंगों के संयुक्त सैन्य अभ्यास देखने को मिल सकते हैं। इन अभ्यासों का असर भारत के पड़ोसियों पर भी होगा और ताजा हालात में पड़ोसियों की किसी भी नाराजगी को दूर करने की रणनीति भारतीय जमीन पर दिखाई नहीं पड़ती है। 
कुल मिलाकर मौजूदा समझौता भारत—अमरीका के बीच रक्षा सहयोग के बहाने अन्य अहम मुद्दों पर बातचीत की शुरुआत भर है। इनमें अमरीकी नजरिये से ईरान और रूस से भारत के संबंध, चीन की दक्षिण एशिया में बढ़ती दादागीरी से लेकर इस प्रायद्वीप में अमरीका के लिए जरूरी सैन्य अड्डे की खोज प्रमुख हैं, तो भारत के लिए आर्थिक मदद के साथ अमरीका वीजा पॉलिसी में बदलाव और रक्षा तकनीक तक पहुंच जरूरी है। इन हालात में भारत के अपने हितों और अमरीकी मंशाओं के बीच की खींचतान में कौन कितना लाभ ले पाता है, वह आने वाले दिनों में दिखाई देगा। ऐसे में कहा जा सकता है कि कॉमकासा समझौता भारत—अमरीका संबंधों की बेहतरी की दिशा में उठा जरूरी, छोटा और अहम कदम है।
यह भी पढ़ें:  भारत-पाकिस्तान रिश्ते : सकरात्मक लड़ाई की राह में रोड़े