टिम कुक: अमरीका में टैक्स रिफॉर्म की लड़ाई को दिया नया मोड़

23 अगस्त 2016 को राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित

सचिन श्रीवास्तवटिम कुक ने अपने ताजा बयान से अमरीका में टैक्स रिफॉर्म की बहस को नया मोड़ दे दिया है। अमरीका में टैक्स रिफॉर्म के पैरोकार रहे टिम कुक ने कहा है कि वे एपल का विदेशों में कमाया गया पैसा तब तक अमरीका नहीं लाएंगे, जब तक कि देश में टैक्स प्रक्रिया ठीक नहीं हो जाती है। 

करीब दो साल पहले टिम कुक ने अपने आदर्श वाक्य के बारे में एक इंटरव्यू में कहा था कि वे मार्टिन लूथर किंग जूनियर के कथन, जिंदगी का सबसे बड़ा और जरूरी सवाल यह है कि, आप दूसरों के लिए क्या कर रहे हैं? को अपने जीवन का ध्येय वाक्य मानते हैं। अमरीका में टैक्स रिफॉर्म की अपनी लड़ाई को तेज करते हुए टिम ने इसे सिद्ध कर दिया है। उनके बयान से वारेन बफेट जैसे दिग्गजों की नींद उड़ गई है, तो अमरीकी राजनीति में भी भूचाल आ गया है। कुक के बयान का असर इतना ज्यादा था कि अमरीकी राष्ट्रपति पद के दावेदार डोनाल्ड ट्रंप और हिलेरी क्लिंटन ने अपने ताजा भाषण में सत्ता में आने पर टैक्स रिफॉर्म को प्राथमिकता में शुमार करने की बात कही। ट्रंप ने सभी तरह के व्यापार पर 15 प्रतिशत टैक्स की वकालत की है, जो फिलहाल 35 प्रतिशत है। हिलेरी 30 प्रतिशत टैक्स के पक्ष में हैं, लेकिन साथ ही वे कंपनी हितैषी नीतियों की भी पैरोकार हैं।

यह भी पढ़ें:  रोजगार के हालात: क्षमता से कम काम की मजबूरी

ज्यादा व्यावहारिक है टिम का नजरिया
एपल का कुल कारोबार 200 बिलियन डॉलर (करीब 13 हजार 400 अरब रुपए) का है, जिसका 90 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से होने वाली कमाई से आता है। फिलहाल एपल अमरीकी सरकार को 40 प्रतिशत टैक्स देती है, जिसमें से 35 प्रतिशत फेडरल टैक्स यानी केंद्रीय कर है, जबकि बाकी 5 प्रतिशत स्टेट टैक्स है। यानी एपल अपना पैसा विदेशी बैंकों में रखता है, तो अमरीका को करीब 80 बिलियन डॉलर (5 हजार 300 अरब रुपए) के टैक्स का घाटा होगा। कुक चाहते हैं कि यह पैसा जिन देशों में कमाया गया है, वहीं रहे और कंपनी की बेहतरी के लिए खर्च हो।

चार दशक पुरानी लड़ाई
अमरीका में टैक्स रिफॉर्म की लड़ाई करीब चार दशक पुरानी है। 80 के दशक की शुरुआत में ग्लोबलाइजेशन की धमक के बाद अमरीका समेत पूरी दुनिया में टैक्स रिफॉर्म पर बहस शुरू हुई। 2008 की आर्थिक मंदी के बाद टैक्स को लेकर दो अलग-अलग विचार साफ हो गए।
बफेट बनाम कुक
एक तरफ वारेन बफेट और हांगकांग के सबसे अमीर व्यक्ति ली का-शिंग जैसे दिग्गज हैं, जो मानते हैं कि अमीरों को ज्यादा से ज्यादा टैक्स चुकाकर वेलफेयर की राह आसान करनी चाहिए। वहीं दूसरा पक्ष, जिसमें टिम कुक भी हैं, मानता है कि टैक्स प्रक्रिया आसान और सबके लिए समान होनी चाहिए, ताकि प्रतिस्पर्धा बरकरार रहे।

यह देशभक्त होने या न होने का मामला नहीं है। ज्यादा टैक्स देने का अर्थ, बड़ा देशभक्त होना नहीं है। हम तब तक अपना पैसा विदेशों से अमरीका नहीं लाएंगे, जब तक एक ईमानदार टैक्स प्रक्रिया सुनिश्चित नहीं की जाती। -टिम कुक, सीईओ, एपल

यह है मुश्किल
सरकारी प्रेक्षक मानते हैं कि एपल की ज्यादातर कमाई आईफोन से है, जिसका रिसर्च और विकास कार्य अमरीका में हुआ है। इसलिए एपल को यहां ज्यादा टैक्स देना चाहिए।

यह भी पढ़ें:  वर्चुअल वर्ल्ड में बहस तेज: नेट न्यूट्रेलिटी में बराबरी क्यों नहीं?

बतौर एपल सीईओ पांच साल
कुक ने स्टीव जॉब्स की विरासत को पांच साल पहले अगस्त 2011 में संभाला था। इस तरह बतौर एपल सीईओ उन्होंने पांच साल पूरे कर लिए हैं।