Kartik Sharma

Kartik Sharma: संत हो चुका एक बच्चा उर्फ किताबों का जीवंत हरकारा

सचिन श्रीवास्तव

Kartik Sharmaआमतौर पर किसी करीबी के जन्मदिन पर उसके बारे में लिखना एक किस्म का पारंपरिक हवन है, जिसमें हम सब अपनी ओर से चंद खूबसूरत अल्फाजों की आहूति देते रहते हैं। मैं भी देता हूं। कम देता हूं, लेकिन यदा कदा ऐसी आहूतियां देता ही रहा हूं। आज मसला थोड़ा जुदा है।

मैं आज एक ऐसे शख्स के बारे में लिखकर आपके सामने उसकी एक भरपूर तस्वीर रखने की कोशिश कर रहा हूं, जिसे अरसे से दर्ज करना चाहता था। गैरमामूली कारणों से यह टलता रहा है और आज उसके जन्मदिन पर अच्छा—बुरा जो भी है, वह लिख देना चाहता हूं। इसलिए भी कि वक्त की आहटें इतनी तेजी से बदल रही हैं और काम के बोझ इतने हैं कि पता नहीं फिर कब मौका, वक्त और जेहन एकमेक हो पाएं।

मुझे लगता है कि इतनी भूमिका काफी है— कार्तिक के बारे में। कार्तिक उर्फ जीमेल का कार्तिक आभास उर्फ कार्तिक शर्मा उर्फ अपनी दुनिया की बात करें तो “एकलव्य” वाला कार्तिक। ई—2 वाले कार्तिक भाई से अभी कोलार वाले कार्तिक तक का सफर तय करने वाला यह शख्स मेरे दिल और दिमाग के इतने करीब है और उनके साथ गुजरे वक्त की इतनी यादें हैं कि अव्वल तो समझ नहीं आता कि कहां से शुरू किया जाए। तो पहली मुलाकात से ही शुरू करते हैं।

20वीं सदी के आखिरी सालों में जब मैं एक अधेड़ होते कस्बे अशोकनगर से महानगर बनते भोपाल की गलियों में लिखने—पढ़ने की दुनिया को देखना शुरू कर रहा था, उस वक्त कार्तिक ई—1 के “एकलव्य” वाले आफिस में पाये जाते थे। साल 2000 के अक्टूबर में माखनलाल यूनिवर्सिटी में एक छात्र आंदोलन हुआ था और उसमें पुष्य मित्र, अनुराग द्वारी, अभिषेक राजन, रवि दुबे, मनीष मनोहर, एम अखलाक, कर्नल रंजीत, अखिलेश्वर भाई समेत कई सीनियर्स के बीच कार्तिक भाई यदा कदा दिख जाते थे। तब पता चला कि वे “एकलव्य” से जुड़े हैं, लेकिन उनसे बात करने की हिम्मत कभी नहीं हुई। यह कस्बाई संकोच था या कोई और हीनताबोध पता नहीं। उस वक्त “संदर्भ”, “स्रोत” और “चकमक” के जरिये “एकलव्य” से परिचित था और जिज्ञासा जरूर थी कि यह किताबें कैसे बनती हैं, कैसे लिखी जाती हैं, कैसे हमारे हाथों में पहुंचती हैं?

सो अपने डर और संकोच पर काबू पाते हुए दो महीने बाद यूनिवर्सिटी के टीचिंग कैंपस (जो उस वक्त चार अलग अलग बिल्डिंगों में बिखरा हुआ था) से 100 कदम दूरी पर स्थित एकलव्य के ई—1 वाले आफिस पहुंचा। शायद दिसंबर का वक्त था, क्योंकि उस दिन मैंने भी शूटर (उस वक्त बुंदेलखंडी टोन बेहद हावी थी, जिसमें उपरी तन पर पहनने वाले गर्म कपड़े को शूटर अर्थात स्वेटर के अलावा भी कुछ कहते हैं, यह पता नहीं था।) पहना हुआ था। लॉन में बच्चों का जमावड़ा था। बीच में एक नाटा सा आदमी कागजों से किस्म किस्म की चीजें बनाने में मशगूल था। बच्चों का उस पर कितना ध्यान था पता नहीं, लेकिन वह हर बच्चे से अलग अलग ढंग से मुखातिब था। लंबे बाल और काली दाड़ी में वह सचमुच किसी संत, किसी सांता, किसी पीर की तरह लग रहा था। चेहरे पर मुस्कुराहट तब भी वैसी ही थीं, जैसी आजजिसे देखकर कोई भी कार्तिक से इश्क कर बैठे। यह कार्तिक से पहली मुलाकात थी।

कस्बाई डर को बखूबी छुपाते हुए मैं जब जमावड़े के करीब पहुंचा तो अपनी चिरपरिचित शैली में कार्तिक ने मुझे बच्चों के बीच कुछ करने को आमंत्रित किया। शब्द याद नहीं, क्योंकि उस समय तक अनजान लोगों से बेतकल्लुफ होने का हुनर नहीं आता था। अकबकाहट के कारण ठीक से समझा भी नहीं और दोबारा पूछने लायक हिम्मत कहां से जुटाई जाती है, यह पता नहीं था। पहले से ही डर पर काबू करने की कोशिश कर रहा मैं और ज्यादा मुश्किल में पड़ गया, क्योंकि किसी भी तरह के क्राफ्ट को दूसरों के सामने उसे करने लायक हौसला और हुनर तब तो कंपकंपी छुड़ाने की हद तक डरा देता था, और यह अब भी कायम है।

कार्तिक यह भांप गए थे। उन्होंने खड़े होकर कंधे पर हाथ रखा और करीब खींच लिया। यह बेहद आत्मीय था। उस वक्त से अब तक वह हाथ अपने कंधे पर हमेशा महसूस करता हूं। बाद में माखनलाल यूनिवर्सिटी के कई अन्य वरिष्ठ साथियों ने ठीक वैसा ही हौसले, हिम्मत का हाथ रखा। लेकिन महानगर में पहला हाथ कार्तिक का ही था। अपने डर और संकोच को यहां इसलिए थोड़ा विस्तार दिया कि आप समझ पाएं कि कैसे कार्तिक ने मेरे जैसे कई कस्बाई लड़कों के बनने, संवरने और बचने के बेहद शुरुआती औजार अपना बनाकर दिए हैं।

Kartik Sharma

पहली मुलाकात में माखनलाल के अन्य साथियों के संक्षिप्त जिक्र के बाद कार्तिक ने अपने घर, जिसे तब एक लाइब्रेरी और सामूहिक कमरा कहना ज्यादा सही होगा, का पता दिया और कभी भी, किसी भी समय आने का न्यौता भी। यह कोई औपचारिक बुलावा नहीं था। यह सचमुच एक कस्बाई युवा के साथ संवाद करने की आत्मीयता और दूर के शख्स को खींचकर पास लाने का अपना ही संगीत था, जिसे कब किस ताल पर बजाना है, यह कार्तिक को खूब आता है। पता नहीं वे सभी युवा साथियों के साथ ऐसा करते थे, या मेरी कविताओं की उलजुलूल समझ, या अशोकनगर इप्टा के साथियों से संपर्क का रौब जो भी हो, कार्तिक ने पहली मुलाकात में ही महसूस करा दिया था कि अब यहां से आगे कई मुलाकातें होनी हैं।

इस मुलाकात के तुरंत बाद ही करीब 3 या 4 दिन बाद किसी नाटक की रिहर्सल संभवत: सुदामा के चावल के सिलसिले में रवि, सुधाकर, अनुपमा, अरुणिमा और शायद संतराम साहू के अलावा बासु मित्रा, मनीष मनोहर आदि के साथ कार्तिक भाई के कमरे पर जाना हुआ। इसके बाद लगभग हर सप्ताह बल्कि सप्ताह में दो—तीन दिन भी, मिलना, जुलना होता रहा। और कार्तिक भाई का वह कमरा उसके बाद से एक अड्डे के तौर पर हमेशा लुभाता रहा। वहां किताबें थीं, खाना था, पसरने, लुढ़कने की भरपूर जगह थी और बहुत सारी बहसें। इस माहौल में करीब चार—छह महीने में ही वो कस्बाई संकोच, डर जाने कहां गायब हो गया।

माखनलाल के ज्यादतर किताबों के संपर्क में रहने वाले और नाटकों से लगाव रखने वाले साथी वहां पहुंचते थे। करीब ही राजू भाई उर्फ राजू नीरा का भी कमरा था, जहां किताबें तो भरपूर थीं, लेकिन वहां अनुशासन का पहरा भी था, क्योंकि राजू भाई और उनके साथ रूम शेयर करने वाले साथी मंतोष व्यवस्थित थे। हर चीज को करीने से रखने, रखवाने वाले। जबकि इसके उलट कार्तिक भाई के कमरे पर मौज रहती थी। व्यवस्था यहां भी थी, लेकिन उसके लिए कोई जोर जबरदस्ती नहीं थी। किसी भी किताब को कहीं से भी उठाओ, कहीं भी बैठकर पढ़ो और फिर कहीं भी छोड़ दो। कभी उंची आवाज में कोई हिदायत नहीं मिलती थी। दिलचस्प ये कि दूसरे दिन ही अगर आप पहुंचें तो वह किताब करीने से ठीक अपनी पूर्व निर्धारित जगह पर ही मिलती थी। ऐसा करीब चार—पांच हुआ कि किताब को सेल्फ में से उठा लिया और फिर उसे कमरे में कहीं भी छोड़ दिया। कभी कभी तो बाथरूम में फ्लश टैंक के उपर भी। और दूसरे दिन किताब फिर वहीं सेल्फ में पूर्व निर्धारित जगह पर। आखिरकार बिना कहे सुने और हिदायत के यह बात समझ आ गई कि हमें किताब निकालने की आजादी है, लेकिन बाद में जहां से उठाई है, वहां किताब रखनी भी है। इस बात को कार्तिक ने कभी कहा नहीं, बस अपने व्यवहार से समझा दिया। हालांकि उसके बावजूद कुछ किताबें सेल्फ से निकालकर अपने रूम तक भी ले आया और फिर लंबे समय तक वो मेरी ही लाइब्रेरी का हिस्सा बनी रहीं। कार्तिक ने भी शायद उन्हें खोई हुई की सूची में डाल दिया होगा। लौटाने जैसा मेरा कोई इरादा नहीं था, और किताबें वापस मांगना कार्तिक को आता नहीं है।

अभी पिछले दिनों बताया भी, तो खुशमिजाजी से कार्तिक बोले कि यार कोई किताब ले गया है तो उसने उसे पढ़ा होगा, उसमें कुछ बदला होगा, किताबों से उसे प्यार हुआ होगा, और उससे भी आगे वह किताब दूसरे और हाथों में पहुंची होगी, तो खिली खिली होगी, मेरी सेल्फ में रखे रखे तो वह मुरझा ही जाती न। यह संतत्व है। चीजों के इस्तेमाल और इंसानों से प्यार करने का यह हुनर कार्तिक को खूब आता है।

कार्तिक को जो लोग करीब से जानते हैं, वह यह भी जानते हैं कि वह किताबों के बीच रहता है, उन्हें ओढ़ता बिछाता है, लेकिन कार्तिक किताबी नहीं है। वह जीवन से भरपूर है। इतना कि किसी भी मुरझाये चेहरे को खिला दे। कार्तिक के पास खूब योजनाएं हैं, खूब बातें हैं, जीवन के उत्सव को रंग देने वाले कई सारे औजार भी। निजी तौर पर पिछले दो साल उनके लिए काफी मुश्किल भरे रहे हैं। हाल ही में उन्होंने अपनी मां को खोया है और उसके पहले उन्होंने मां के साथ खूब प्यारा वक्त बिताया। उस वक्त को याद करते हुए एक बच्चे की तरह कार्तिक जब अपनी आंखें नचाते हुए मां के बारे में बताते हैं, तो उसे बस सुना जा सकता है। मां को दवा पिलाने से लेकर उन्हें कहानियां सुनाने और सुनने तक को कार्तिक किसी परी की कहानी की तरह मुलायमियत से सुनाते हैं। कभी वक्त मिले तो आप भी सुनिये उस वक्त को।

कार्तिक के बारे में सोचते हुए एक रात मुझे खूब याद आती है, जिसे परिचितों के बीच कार्तिक खुद भी खूब याद करते हैं। 2002 के शुरुआत की बात है। मैं कविताओं में लगभग धंसा हुआ था। यह वह दौर था, जब हिंदी की तमात साहित्यिक पत्रिकाओं को पूरा पढ़ना और कविताओं को याद करना मेरी दिनचर्या में शामिल था। राजेश जोशी के उस वक्त के दो संग्रह नेपथ्य में हंसी और दो पंक्तियों के बीच को लगभग कंठस्थ किया हुआ था। ऐसा ही हाल कुमार अंबुज के संग्रह क्रूरता और किवाड़ का था। इसके अलावा साक्षात्कार, वसुधा, पहल, हंस, आकंठ, कथन आदि के अंक लाइब्रेरी से सबसे पहले इश्यू करवाने की जिद रहती थी। हालांकि ज्यादातर बार पत्रिकाओं पर मनीष मनोहर पहले ही हाथ मार चुके होते थे। बहरहाल, यह कविता से प्रेम के दिन थे। उन्हीं दिनों मनीष मनोहर एक कविता कोलाज आधे अंधेरे समय में पर काम कर रहे थे। यह कोलाज वरिष्ठ साथी पहले से मंचित कर चुके थे और योजना थी कि इसे भारत भवन में पुन: नए सिरे से रचा जाए। पशुपति भाई इसके लिए दिल्ली से शायद नौकरी छोड़कर भोपाल में डेरा जमा चुके थे।

आधे अंधेरे समय में बतौर अभिनेता मैं भी शामिल था। रिहर्सल के बाद मैं कार्तिक भाई के पास पहुंचा। हमने कुछ इधर उधर की बातों के साथ शाम को रंगीन किया, कुछ तरल, कुछ कुछ गरल। और कविताएं पढ़ते हुए सो गए।

सुबह मुंह अंधेरे ही मेरी नींद खुल गई और मुझे जल्दी अपने रूम पर जाकर अन्य काम करने थे। उस वक्त कार्तिक को सोते हुए देखा। उनमें वही बच्चा दिखा, जो आज भी उन्होंने अपने भीतर बचाकर, छुपाकर, चुराकर रखा हुआ है। यकीन मानिये कार्तिक को सोते से जगाना बहुत बड़ी गुस्ताखी है। उसकी दाड़ी पर हल्की हल्की रोशनी गिर रही थी और आधा शरीर फर्श पर आधा बिस्तर पर था (कमरे में पलंग था, लेकिन उस पर किताबें विराजमान होती थीं, और हम नीचे फर्श पर आड़े—टेड़े सोते थे, कभी कभी तो 10—12 जुंगजू)। मैंने काफी हिम्मत की जगाने की, क्योंकि उसके पहले कई बार दरवाजा खुला होने पर बिल्ली किचिन में घुसकर तबाही मचा चुकी थी। कमबख्त दरवाजा बाहर से अटकाने पर अधखुला रहता था, जो जरा से धक्के में पूरा खुल जाता था, यानी बिल्ली के लिए भरपूरा मौका था ही। इस मुश्किल घड़ी में मुझे कुछ नहीं सूझ रहा था और कार्तिक था कि बेसुध अपनी नींद में सपनों के घोड़े दौडाए जा रहा था।

मैंने कागज उठाया और जितेंद्र चौहान जी एक कविता की चंद लाइनें लिखकर चलता बना।

कविता कुछ यूं थी (20 साल हो गए हैं संभवत: कुछ शब्द इधर उधर हों)

सोता हुआ आदमी सम्राट होता है
अपने सपनों का
बहुत दूर तक जाते हैं विजयी अश्व उसके
सोते हुए आदमी को नहीं जगाना चाहिए
वह सपने में सोच रहा हो सकता है
अपनी जंजीरों को तोड़ने के बारे में

अपनी उलझी हुई लिखावट में यह वाक्य घसीटकर मैं चलता बना। दूसरे दिन कार्तिक भाई शाम को रिहर्सल में आए तो उनके हाथ में वह कागज भी था। बोले— शुक्रिया ये याद रहेगा हमेशा। उन्हें सचमुच वो वाकया याद है और उसके बाद से कविताएं हमारे बीच संवाद का एक सघन पुल हैं।

फिलहाल यहां इस लंबी याद को विराम देता हूं। कभी फिर मौका, वक्त और जेहन एक साथ मिले, तो शायद उन किस्सों और पलों को भी दर्ज कर पाउं जो 2008—09 में भोपाल इंदौर में रिपोर्टिंग के दौरान बने। वो होली भी जिसमें मिनाल वाले घर में सारा दिन और आधी रात तक अंधेरगर्दी हुई, प्रदीप—जावेद के बनाए पकौडों के साथ। और वो पहाड़ी वाला घर भी जहां सुबह—सुबह चाय पीने का सुकून कार्तिक ने दिया।

तो अभी के लिए जन्मदिन मुबारक भाई, यार, दोस्त। इस उम्मीद के साथ कि तुम एक दिन हमेशा अपने भीतर बच्चे को जिंदा रखने का हुनर हमें भी सिखाओगे।

मिलते हैं शाम को….

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