Interview

Interview: दूर लाल तारे को देखने जाएगा नजानू

Interview: सारिका श्रीवास्तव की संविधान लाइव से खास बातचीत

Interviewभारतीय महिला फेडरेशन की मध्य प्रदेश इकाई की महासचिव सारिका श्रीवास्तव ने पिछले दिनों संविधान लाइव की साथी अर्चना और फरहा से लंबी बातचीत की। सारिका लंबे समय में संस्कृतिकर्म के साथ महिला और बच्चों के मुद्दों पर लगातार सक्रिय हैं। इस बातचीत के जरिये जाना जा सकता है कि एक व्यक्ति के निर्माण में उसके बचपन से लेकर आसपास के लोगों का असर किस तरह शामिल होता है। साथ ही महिलाओं की मौजूदा चुनौतियां और राजनीति के माहौल पर संक्षिप्त और सारगर्भित टिप्पणियां भी हैं। वीडियो फाॅरमेट में लिए गए इस इंटरव्यू को लिखा है साथी अर्चना ने।

फरहाः दीदी, आपका बचपन कैसे गुजरा और आप की शुरुआती पढ़ाई के बारे में कुछ बताइये?
सारिकाः
मेरे पिता जी सरकारी स्कूल में टीचर थे और हम पांच भाई-बहन हैं। एक मध्यमवर्गीय परिवार के बच्चों का जीवन जैसे गुजरता है, हमारा बचपन भी वैसे ही गुजरा है। मध्य प्रदेश का दमोह मेरा गृह नगर है। दमोह से मैंने इतिहास में एमए किया और इंदौर में आने के बाद दर्शनशास्त्र में एमए किया।

अर्चनाः आप महिलाओं के साथ कब से काम कर रही हैं और आपने महिलाओं के साथ ही काम करना क्यों चुना?
सारिकाः मैं 2004-05 में इंदौर आई। उसके बाद मैंने लगभग चार छः महीने प्राइवेट इंस्टीट्यूट में नौकरी की। इस दौरान मेरी मुलाकात जया मेहता जी से हुई, जो इंदौर में ही रहती हैं। उन्होंने मुझे बताया कि एक महिलाओं का संगठन है- भारतीय महिला फेडरेशन और इससे तुम्हें जुड़ना चाहिए। यह संगठन महिलाओं के साथ काम करता है। इसके बाद मैं महिला फेडरेशन से जुड़ी और उसके बाद इस सगठन को समझते हुए मैंने काम करना शुरू किया।

इस इंटरव्यू को वीडियो फॉरमेट में भी देखा जा सकता है

फरहाः आप महिलाओं के साथ इतना काम करती हैं तो क्या कभी उनके घरवालों की ओर से कोई परेशानी आती है?
सारिकाः कई बार किसी महिला को परेशान किया जाता है, तो वह अकेली पड़ जाती है और उसका पूरा परिवार और समाज एक तरफ हो जाता है। तब बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ता है। महिला को सुरक्षित रखना है, उसका सम्मान भी बचाके रखना है, उसके रहने खाने का बंदोबस्त भी करना है और साथ ही जो लोग सामने हैं उनसे निपटना भी है। कई बार हम पुलिस की सहायता लेते है। कई बार कानूनी सहायता लेते हैं। कई बार समाज के विभिन्न तबके हैं उनका भी सहयोग लेते हैं।

फरहाः ऐसा होता है कि अगर हम किसी का साथ देते हैं, तो पूरा समाज तो उसके खिलाफ है ही, तो हमें भी बहुत सारी परेशानी आती हैं। तो उस तरह की परेशानी आप के साथ कभी आई?
सारिकाः ऐसा नहीं होता कि पूरा समाज ही एक तरफ हो जाए। जब किसी व्यक्ति पर परेशानी आती है, तो उसके साथ भी बहुत सारे लोग खड़े रहते हैं। ऐसा कई बार हुआ है कि हम अकेले पड़े हैं लेकिन हम इतने भी अकेले नहीं पड़े। बहुत सारे लोग हमारे साथ भी आते हैं। इस तरह मिलकर वो सारी परेशानियां भी हल हो जाती हैं।

अर्चनाः आपने ऐसा कोई काम किया है, या आपके सामने ऐसा कोई काम हुआ महिलाओं के लिए जिससे आपको खुशी मिली हो?
सारिकाः एक काम नहीं कह सकते हैं। जैसे हमें जब पंचायती चुनाव में 33 प्रतिशत आरक्षण का अधिकार मिला तो मुझे बहुत अच्छा लगा। कि अब महिलाओं को चुनाव लड़ने के लिए थोड़ी और सीट मिलेंगी। सुरक्षा के लिए घरेलू हिंसा कानून बना तब मुझे बहुत अच्छा लगा क्योंकि पहले क्या होता था कि महिला के घर जब लड़ाई होती थी उनके साथ मार पीट होती थी, तब उनके लिए कोई अच्छा कानून नहीं बना था। जब ये कानून बना तो मुझे बहुत खुशी हुई। बिल्कुल ऐसे ही जब निर्भया केस हुआ उसके बाद जब कानून बनके आया तब मुझे बहुत अच्छा लगा कि कम से कम लोगों के साथ यौन उत्पीड़न हो रहा है उसके खिलाफ एक कानून तो बना और बिल्कुल उसी तरह जो कामकाजी महिलाएं हैं, उनके साथ जब काम करने वाली जगहों पर यौन उत्पीड़न होता था उसके खिलाफ कानून बना तब भी मुझे उतनी ही खुशी हुई। ऐसे ही अन्य कानून बने, जैसे सूचना के अधिकार का कानून मिला या मनरेगा में काम का अधिकार मिला, और भी दूसरे कानून बने तो खुशी हुई। ये सब कानून बने तो लगता है कि हां ये सारे कानून बनाने में भारतीय महिला फेडरेशन का भी योगदान रहा है। और भी बहुत सारे संगठनों का भी योगदान रहा है। तो इस तरह जब भी हमको कुछ थोड़ा सा भी हासिल होता है तो बहुत खुशी होती है।

फरहाः आप महिलाओं के साथ जो काम करती हो उसमें आपके परिवार या दोस्तों की ओर आपको कैसा सहयोग मिलता हैं?
सारिकाः परिवार की तरफ से तो मुझे पूरा सहयोग मिलता है। मेरे मम्मी, पापा, भाई, बहन और तमाम भतीजा, भतीजी जो भी लोग हैं, सभी लोगों का मुझे पूरा सहयोग प्राप्त है। इस बारे में यह बताना चाहूंगी कि कि जब मैं बहुत छोटी थी और मेरे पिता जी जो एक साधारण टीचर थे। एक बार मेरे लिए एक लकड़ी का हेलीकॉप्टर लेकर आये। उन्होंने मुझे नहीं बताया और मेरी आँख बंद की। पिताजी मुझे नजानू कहते थे नजानू सोवियत रूस का एक कार्टून कैरेक्टर है। पिताजी ने मुझे बताया नहीं और उस पर जाकर बैठा दिया, आंख बंद करके। मैंने आंख खोली तो बोलते है- नजानू खुश हुआ कि नहीं। मैंने कहा- हां। तो बोलते हैं- नजानू कहां जायेगा तो मैंने उनकी तरफ देखा और बोला- कहां जायेगा? तो बोलते हैं- वो देखो दूर लाल तारा दिख रहा है, नजानू उस लाल तारे को देखने जाएगा।
तो मुझे परिवार का सहयोग पहले से था। फिर दोस्तों की बात करें तो दोस्तों का भी मुझे बहुत सपोर्ट रहा है। दोस्त भी बोल सकते हैं या गुरु भी बोल सकते हैं। जैसे अभी मैंने बोला था कि जया मेहता जी मुझे महिला फेडरेशन में लेकर आईं। ऐसे ही विनीत तिवारी ने मुझे पूरे संगठन और विचारधारा के बारे में बताया। इसमें कॉमरेड जया मेहता ने, विनीत तिवारी ने, कल्पना मेहता ने, अशोक दुबे जी ने, ऐसे तमाम सारे लोगों ने मुझे आगे बढ़ने में सहायता की। ये सभी साथी सहयोग देते हैं और मुझे आगे बढ़ने में मेरी विचारधारा को मजबूत करते हैं। लेकिन इसके साथ में कुछ दोस्त ऐसे भी हैं जो बहुत अच्छे मित्र हुआ करते थे। लेकिन जब मैं इस राजनैतिक विचार के साथ आगे बढ़ी तो उन्हें इस बात से सख्त ऐतराज हुआ और उन्होंने मेरी दोस्ती को छोड़ दिया। मैं जिस रास्ते पर जा रही हूँ ये रास्ता उनको ठीक नहीं लगता। जैसे मैं मजदूरों के साथ खड़ी होकर काम करती हूं, किसानों के हक की बात करती हूँ, उन्हें ये ठीक नहीं लगता है कि जो शोषित तबके के लोग हैं, उनकी आवाज को बुलंद कर रही हूँ और इसीलिए मेरा साथ उन्होंने छोड़ दिया।

फरहाः ये साथ पहले छोड़ा, या कुछ सालों बाद अभी अभी?
सारिकाः धीरे- धीरे छोड़ा। कभी किसी ने कभी किसी ने छोड़ा।

फरहाः लेकिन अब आप प्रदेश के स्तर पर इतना काम कर रही हैं, तो इस वक्त आपको देखते हैं तो उनको क्या लगता है?
सारिकाः नहीं, क्योंकि मैं जिस विचारधारा के बारे में अच्छे विचार रखती हूं वे उस राजनैतिक विचारधारा को सही नहीं मानते हैं। वे सोचते हैं कि जो बड़े बडे कॉरपरेट हैं वो ही सही कर रहे हैं। वही ठीक हो रहा है। इसलिये वो मेरे साथ में नहीं हैं।

अर्चनाः महिलाओं के साथ जो हिंसा होती है, जैसे बाहर, या घर या आॅफिस में, तो इस हिंसा को आप कैसे देखती हो, या कैसे उनकी सहायता करती हो?
सारिकाः महिलाएं घर में होती हैं तो उनके साथ अलग तरह का व्यवहार होता है। उन्हें अलग तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऑफिस में, कार्य स्थल पर अलग तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वो जब अपने घर से बाहर निकलती हैं तो उस जगह पर अलग परेशानियों का सामना करना पड़ता है। समाज में महिलाओं को मुकम्मल स्थान हासिल नहीं है इसलिए उन्हें हर तरह की परेशानियों का सामना हर जगह करना पड़ता है। ये शोषण, ये ज्यादती तब तक हमारे साथ रहेगी जब तक हमें इस समाज में बराबरी का अधिकार नहीं मिलेगा। समाज मे बराबरी का अधिकार तभी मिलेगा, जब हमारे काम को आर्थिक रूप से आंका जायेगा। देश में हमारे काम का लेख जोखा भी आर्थिक आंकड़ों में शामिल किया जायेगा। हमें आर्थिक रूप से बराबरी का दर्जा हासिल होगा तब हम राजनैतिक रूप से सबल होंगे। समाज हमें अधिकार देगा, समाज हमें बराबरी से हक देगा, तो हमारे साथ जो दिक्कतें हैं, जहां भी आ रही हैं, तो धीरे-धीरे स्वतः ही खत्म होती जायंेगी।

फरहाः आप ने अभी आर्थिक बराबरी की बात की, तो वो कैसे आएगी, आप उसे कैसे देखती है?
सारिकाः हर एक देश का अपना आर्थिक ढाँचा होता है। उसमंे दूसरे देशों को ये दिखाने की कोशिश की जाती है कि हम आर्थिक रूप से कितने मजबूत हैं, कितने सबल हैं और ये दिखाने के लिए हमें बताना पड़ता है कि हमारी इतनी आमदनी है, इतने लोग इतना पैसा कमा रहे हैं, इतना खर्च हो रहा है। यदि इसमें सरकार ये दिखाना चाहे कि इतने सारे लोग हैं जो काम तो करते हैं लेकिन उनको कोई पैसा नहीं मिल रहा है। तो जब महिलाओं के इस काम को जोड़ दिया जाएगा और उसमें कोई पूँजी नहीं रहेगी तो आर्थिक आंकड़े धड़ाम से नीचे गिर जाएंगे। आपके घर में भी जो महिलाये हैं अम्मी, अप्पी, आप के घर पर भी मम्मी दीदी हैं। जो काम करते हैं उसको सरकारी रूप से माना जाता है कि कोई कार्य हो रहा है, बल्कि घर में ये पूछा जायेगा कि घर पर आप क्या करती हो तो वो बोलेंगे हम कुछ नहीं करते जब कि वो घर का काम करती हैं। जब वो
घर का काम करती हैं तभी उस घर के लोग काम करने के लिए तैयार हो पाते हैं। वो चिंता से मुक्त होकर काम करते हैं। लेकिन महिला के उस काम को कही आंका नहीं जाता। जब हमारे काम का, जो भी हम काम करते हैं उसका सही आकलन होगा, जब उस काम को आंका जायेगा तो हम ऑफिस में जाकर जो काम करते हैं, उस काम का भी सही आकलन मिलेगा।

मनरेगा की बात करें तो मनरेगा में जो काम मिलता हैं। उसमें यदि कोई एक महिला काम कर रही हो और एक पुरूष काम कर रहा हो एक गढ्डा खोदता है तो उसे पूरा पैसा मिलेगा। यदि एक महिला खोदती है तो उसे आधा पैसा मिलता है। वहाँ बोला जाता है कि तुम तो महिला हो तुम तो इतना काम कर ही नहीं सकतीं, तुमने काम सही तरीके से नहीं किया। उसका आधा पैसा दिया जाता है। क्योंकि शुरुआत ही ऐसे होती है कि हम महिलाओं के काम को काम माना ही नहीं जाता है।

फरहाः भारतीय महिला फेडरेशन कैसे काम करता है? इस संगठन की आगे की क्या योजना है?
सारिकाः भारतीय महिला फेडरेशन एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है। हमारे संगठन का उद्देश्य है कि जितनी भी महिलाएं हैं देश की महिलाएं हो या देश की बाहर की महिलाएं हो, सारी महिलाएं राजनैतिक रूप से मजबूत हों। उनका पता हो कि हमारे देश में क्या चल रहा है। देश के बाहर क्या हो रहा है। उनको सभी गतिविधियों की जानकारी रहे और वो इसलिए भी जरूरी है कि जब महिला मजबूत होगी, तो परिवार मजबूत होगा, और इससे समाज मजबूत होगा। मजबूती का मतलब है एक समझ के साथ, एक विचार के साथ, एक राजनैतिक समझ के साथ हम महिलाओं के बीच में जाकर उनको हमारे देश में जो भी गतिविधियां चल रही हैं जो भी कानून आ रहे हैं या आने वाले हैं और किस तरह से महंगाई बढ़ रही है। अभी किसान आंदोलन क्या है। अभी श्रम कानून में बदलाव हुआ है। उससे किस के ऊपर क्या असर पड़ने वाला है। ऐसी तमाम जानकारी हम महिलाओं को देते हैं। हमारा यही उद्देश्य है कि हम सारी महिलाओं को सबल बना सकें।