पत्रकारिता दिवस पर खास : भारतीय पत्रकारिता का शुरुआती चेहरा

सचिन श्रीवास्तव
आज जब पत्रकारिता पर कई तरह के सवाल हैं और निष्पक्षता जब खबरिया हलकों में बहुत स्वीकार्य शब्द नहीं रह गया है, तब एक फिर उस इतिहास पर नजर डालना जरूरी है, जहां भारतीय पत्रकारिता की जड़ें हैं, जो आज भी हमें चेता रही हैं। 

“भारत में पत्रकारिता का इतिहास गहरे तौर पर आजादी के आंदोलन से जुड़ा हुआ है। 1910 में स्वदेश अभिमानी के रामकृष्ण पिल्लई को देशनिकाला, 30 के दशक में केसरी की शुरुआत, 1938 में मलयालम मनोरमा की संपत्तियों की जब्ती, 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन को समर्थन देने के कारण मातृभूमि के संपादक की गिरफ्तारी जैसी घटनाएं भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष और पत्रकारिता के इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएं हैं।
प्रणब मुखर्जी, राष्ट्रपति (2013 में एक कार्यक्रम के दौरान)

मीडिया खासतौर पर प्रिंट मीडिया दुनिया भर के लगभग सभी जन आंदोलनों की कामयाबी के पीछे एक बड़ी ताकत रहा है। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन भी इसका अपवाद नहीं रहा।
1766 में एक ब्रिटिश संपादक विलियम बोल्ट्स ने कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में अंग्रेजी भाषियों के लिए अखबार की शुरुआत की। उन्होंने सत्ताधारी ईस्ट इंडिया कंपनी की आलोचना की थी। हालांकि यह अखबार ज्यादा दिन नहीं चला और बोल्ट्स को वापस इंग्लैंड भेज दिया गया। 1780 में जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने बंगाल गजट और जनरल कलकत्ता एडवाइजर का प्रकाशन शुरू किया। हिक्की का यह चार पेज का अखबार भी ब्रिटिश शासन का मुखर आलोचक था। वे कंपनी सरकार और उसके कर्मचारियों की आंतरिक खबरें प्रकाशित करते थे। इस अखबार ने ब्रिटिश शासन को इतना परेशान किया कि आखिरकार नवंबर 1781 में सरकार ने इंडिया गजट के नाम से अपना समर्थक अखबार शुरू कराया। 
1857 के आंदोलन के वक्त अखबारों से हलकान ब्रिटिश सरकार ने वर्नाकुलर एक्ट लगाया। इसके तहत अखबारों में विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध आयद किए गए। एक उदाहरण अकाल के वक्त का है। सन् 1896 में भारी अकाल पड़ा। इसमें हजारों लोगों की मौत हुई। मुंबई (तत्कालीन बंबई) में इसी समय प्लेग की महामारी फैली। अंग्रेज सरकार ने स्थिति संभालने के लिए सेना बुलाई। सेना ने घर-घर की तलाशी लेना शुरू कर दिया। इससे जनता में गुस्सा पैदा हो गया। बाल गंगाधर तिलक ने इस मनमाने व्यवहार और लापरवाही से क्षुब्ध होकर केसरी के माध्यम से सरकार की कड़ी आलोचना की। केसरी में उनके लिखे लेख के कारण उन्हें 18 महीने कारावास की सजा दी गई। 
पहला प्रेस कानून
18वीं सदी के आखिरी सालों तक लगभग 20-25 अंग्रेजी अखबारों का प्रकाशन हो चुका था। इनमें प्रमुख थे बॉम्बे हेराल्ड, बॉम्बे कॅरियर, बंगाल हरकारू, कलकत्ता कॅरियर, मॉर्निंग पोस्ट, ओरिएंट स्टार, इंडिया गजट तथा एशियाटिक मिरर आदि। पत्र-पत्रिकाओं की संख्या भी खासी बढ़ गई थी। 1799 में लार्ड वेलसली ने अखबारों पर लगाम कसने के लिए प्रेस संबंधी पहला कानून बनाया। 
इसकी शर्तें थीं-
-अखबार के अंत में मुद्रक का नाम और पता स्पष्ट रूप से छापा जाए।
-अखबार मालिक एवं संपादक का नाम पता एवं आवास का पूर्ण विवरण सरकारी सेक्रेटरी को दिया जाए।
-सेक्रेटरी के देखे बिना कोई पाठ्य सामग्री छापी नहीं जाए और
-प्रकाशन रविवार को बंद रखा जाए।
इस दौर में ज्यादातर अखबार अंग्रेजी में प्रकाशित हो रहे थे। इनके संपादक भी अंग्रेज थे। विरोध की स्थिति में निर्वासित करना ही पर्याप्त दंड माना जाता था। बाद में सरकार के किसी काम पर टीका-टिप्पणी करना प्रतिबंधित कर दिया गया। 
कुछ अन्य नियम
-सरकारी आचरण पर आक्षेप लगानेवाला समाचार नहीं छापा जाए।
-भारतीयों के मन में शंका पैदा करनेवाला समाचार न छापा जाए।
-धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न किया जाए।
-ब्रिटिश सरकार की के खिलाफ समाचार नहीं छापा जाए।
-व्यक्तिगत दुराचार की कोई चर्चा न की जाए।
स्वाधीनता संघर्ष के दौरान दिग्गज नेता और उनके अखबार
दादा भाई नौरोजी: राष्ट्रीय गुफ्तार 
बाल गंगाधर तिलक: केसरी और मराठा
मदन मोहन मालवीय: हिंदुस्तान
लाला लाजपत राय: पंजाबी, बंदेमातरम् और द पीपुल
महात्मा गांधी: यंग इंडिया, नवजीवन और हरिजन
सुरेंद्रनाथ बनर्जी: बंगाली 
अजीमुल्ला खां: पयामे आजादी
दयाल सिंह मजीठिया: दैनिक ट्रिब्यून 
सच्चिदानंद सिन्हा: हिन्दुस्तान रिव्यू 
पंडित मोतीलाल नेहरू: इंडीपेंडेंट 
हमारा दृढ़ निश्चय है कि हम हर विषय पर निष्पक्ष ढंग से तथा हमारे दृष्टिकोण से जो सत्य होगा उसका विवेचन करेंगे। नि:संदेह आज भारत में ब्रिटिश शान में चाटुकारिता की प्रवृति बढ़ रही है। सभी ईमानदार लोग यह स्वीकार करेंगे कि यह प्रवृति अवांछनीय तथा जनता के हितों के विरुद्ध है। इस प्रस्तावित समाचारपत्र (केसरी) में जो लेख छपेंगे वे इनके नाम के ही अनुरूप होंगे।
(तिलक और उनके साथियों की प्रकाशन उद्घोषणा)
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