एक देश, एक किताब, एक साल: हर देश के बारे में पढ़ी एक किताब

9 सितंबर 2016 को राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित

सचिन श्रीवास्तव 
अमूमन लक्ष्य तो हर इंसान बनाता है, लेकिन उसे पूरा करने के रास्ते में आने वाली तकलीफों को दरकिनार कर आगे बढऩे वाले ही सफल हो पाते हैं। अपने लक्ष्य को  पाने वाले ऐसे ही विरले लोगों में शुमार हुई हैं एन मॉर्गन। उन्होंने एक साल के भीतर दुनिया के हर देश के बारे में एक किताब पढऩे का लक्ष्य तय किया। एन ने इसे पूरा किया और अपने अनुभव पर एक किताब भी लिखी। बीते दो दिन से वे सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रही हैं और दुनिया भर के लोगों के लिए प्रेरणा भी बन गई हैं।

एन मॉर्गन
“द वर्ल्ड बटवीन टू कवर्स: रीडिंग द ग्लोब” की लेखक। अच्छी वक्ता। कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएशन। यूएई से क्रिएटिव राइटिंग में मास्टर डिग्री। लंदन कॉलेज ऑफ कम्यूनिकेशन से पत्रकारिता में डिप्लोमा। 

196 किताबें पढ़कर लिखी किताब
किताबें पढऩे के दौरान ही एन नोट्स लेती रहती थीं और इस बीच करीब 196 देशों की किताबें पढऩे के बाद उन्होंने अपने अनुभवों पर आधारित एक किताब लिखी। जो बेस्टसेलर में शुमार है और कुछ भाषाओं में अनूदित भी की जा रही है।

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कैसे हुई शुरुआत
बात करीब तीन साल पहले की है। एन अपनी बुक सेल्फ को देखकर काफी उदास थीं। उनकी लाइब्रेरी में ज्यादातर किताबें ब्रिटिश या उत्तर अमरीकी लेखकों की थीं। ब्रिटेन में हर साल महज 4.5 प्रतिशत अनुवाद ही अन्य भाषाओं की किताबों के होते हैं। इस निराशा से निकलने के लिए एन ने एक फैसला लिया और खुद ही “वैश्विक अध्ययन का एक गहन कोर्स” करने की बात सोची। यह एक अनूठा चैलेंज था, जिसे एन ने पूरा किया।

इंटरनेट ने की मदद
एन ने अच्छी किताबें ढूंढऩे के लिए इंटरनेट की मदद ली। उन्होंने  सोशल फोरम पर अपील की और दुनिया भर से लोगों ने किताबों की सूची भेजी। बाद में एना ने अपनी रीडिंग को इंटरनेट पर एक इंटरेक्टिव नक्शे के साथ डाला। इस नक्शे में हर देश के साथ उससे संबंधित कहानी, कविता, लघुकथा, उपन्यास जो भी एन ने पढ़ा है, उसका जिक्र है।

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भारतीय किताब में कालम् पढ़ी
एन ने भारत से एम टी वासुदेवन नायर की कालम् पढ़ी। इस किताब के लिए नायर को 1970 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था। यह किताब सेतु माधवन नामक किरदार की जीवन यात्रा है।

दोस्तों ने इंटरनेट पर किया पुर्तगाली से अनुवाद
एन अंग्रेजी में ही पढ़ती हैं। इस कारण से उन्हें किताबों के अच्छे अनुवाद ढूंढऩे में काफी मुश्किलें आईं। खासकर पुर्तगाली और अफ्रीकी भाषाओं के अनुवाद मिलना खासा मुश्किल हुआ। इसके लिए उन्होंने अपने इंटरनेट दोस्तों की मदद ली। पुर्तगाल के लोगों ने साओ टॉम का अनुवाद इंटरनेट पर ही किया और एन को मुहैया कराया।