शराबियों के पक्ष में

सचिन श्रीवास्तव

आप इस पोस्ट को पढ़ें इसके पहले ही मैं यह साफ कर दूं कि यह व्यंग्य नहीं है। शराबियों पर चुटकुले बाजी और उन्हें कोसने के अलावा सचमुच कभी कोई गंभीर बात नहीं की गई। डॉक्टर, इंजीनियर से खिलाड़ी, अभिनेता और अब तो बिरियानी खाने वालों से लेकर बेवजह दौड़ने वालों तक के पक्ष में तमाम दलीलें हैं। लेकिन सिगरेट और शराब को ऐसा बुरा मान लिया है कि इनके पक्ष में बोलना ही गुनाह हो गया।

अजीब है आखिर कोई दिल दिमाग से साफ आदमी ये बोल दे कि दुनिया कि इस समस्या के लिए शराबी जिम्मेदार है। ले देकर घरेलू हिंसा की तोहमत शराबियों पे लगती है, लेकिन असल में शराबियों से ज्यादा घरेलू हिंसा शराब विरोधी कथित सभ्य करते हैं, ये भी किसी से छुपा नहीं है।

बहरहाल,

दिलचस्प है कि देश में जब कभी कहीं कोई अशांति की जरा सी आहट होती है, शराबियों के मौलिक अधिकार पर पाबंदी सबसे पहले लगाई जाती है। होली, दीवाली से लेकर 15 अगस्त और 26 जनवरी और बापू के जन्मदिन तक को ऐसे बताया जाता है कि शराबी रंग में भंग डाल देंगे। और अभी तो हद हो गई। अब अदालतें अपने फैसले से पहले शराबियों को शक की निगाह से देख रही हैं। अरे भाई समाज में मुस्लिम हिन्दू ठीक से नहीं रह पाए। लड़ पड़े। जमीन का झगड़ा हुआ। अदालत को फैसला करना था। करेगी ही। अशांति की आशंका भी थी। तो दिल पे हाथ रखके मीलार्ड या आप ही बता दीजिये इसमें शराबी का क्या लेना देना?

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अरे बेचारे ये शराबी तो वैसे ही हिन्दू मुस्लिम, राजनीति समाज, अदालत जैसे मसलों से कोसों दूर रहते हैं। आप इस झगड़े में भी शराबियों को घसीट रहे हो।

कवि बच्चन कह ही गए हैं कि मधुशाला में ये सब झगड़े कहीं नहीं हैं।

सच्ची बात तो ये है कि गड़बड़ी फैलाने वाले प्रशासन को पहले ही पता होते हैं, लेकिन दिक्कत ये है कि उनसे तो प्रशासन अपनी दैनिक संध्याकालीन चंदा वसूली करता है। राजनीतिक, व्यापारी, धन्ना सेठ और गुंडा तत्व उनमें प्रमुख हैं। उनपे जोर चलता नहीं तो सीधी साधी कौम शराबियों पर पिल पड़ते हो।

आप कहेंगे कैसे सीधे साधे। अरे भाई शराब पीकर अपना शरीर ही खराब कर रहा है न बंदा। आपकी तरह देश को तो खोखला नहीं कर रहा। अपने परिवार और करीबियों के पैसे से ही पी रहा है न। देश की खुली लूट में तो शामिल नहीं है न।

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असल में इसमें गलती शराबियों की भी है। सरकार ने लगातार जांच की है कि शराबी कितना विरोध कर सकता है। कभी शराब के दाम बढ़ाये, कभी दुकान का समय निर्धारित किया, कभी पूरे प्रदेश में ही बंदी लगा दी। पहले 1-2 दिन, अब तो पूरे पूरे सप्ताह और महीनों से है। कभी किसी ब्रांड को बाहर कर दिया। इस दौरान शराबियों ने कोई विरोध नहीं किया। शराबी चुप रहे। आज हालात ये है कि सरकार जब चाहे जैसे चाहे नचा रही है।

तो दोस्तो, अब वक्त आ गया है कि देश की शराब नीति शुद्ध शराबी तय करें न कि शराब के व्यापारी।

जब तक व्यापारी नीति तय करेंगे, तब तक मासूम (शराबी) जनता इसी तरह ज्यादती का शिकार होगी।

(नोट: अगर आप शराब नहीं पीते, तो जो भी पीते है उस नजरिये से देखें, चुप्पी तो आपकी भी मशहूर है जनाब)